हिंदी शोध संसार

शनिवार, 28 जनवरी 2012

स्क्राइब फायर ऊबंटू के लिए उत्तम ब्लॉग एडिटर

 
पिछले कई दिनों से ऊबंटू ऑपरेटिंग सिस्टम के लिए एक उत्तम ब्लॉग एडिटर की खोज कर रहा था। ब्लॉगिलो जैसे कई ब्लॉग एडिटरों को आजमाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन सफल नहीं हुआ। अंत में मुझे स्क्राइब फायर मिला। स्क्राइबफायर कई मायनों में विंडो लाइव राइटर की तरह है।

यह एक बेहतर एडिटर है। जिसे आप अपने वेब ब्राऊजर में जोड़कर सीधे वहां से लेख प्रकाशित कर सकते है।

यह 'भारतीय' नहीं होता तो पाकिस्तान में तड़प कर मर जाते हजारों!


साभार- भास्कर.कॉम

पाकिस्तान में ये शख्स लाखों लोगों की उम्मीद है। बेसहारा को सहारा, महरूम की मदद में मशरूफ होकर पीड़ितों के घाव पर मरहम लगाना ही इनका मिशन है। इंसानी खिदमत ही इनका धर्म है।

मानवता का स्कूल, बेसहारा बच्चों के मां-बाप, अस्पताल और भी बहुत कुछ हैं 83 बरस के ये करूणा के देवदूत। मानवता की खिदमत को ही अपना धर्म बना चुके इस शख्स के दंगाग्रस्त इलाके में दस्तक देने मात्र से ही लड़ाइयां रूक जाती हैं। डाकूओं का दिल पिघल जाता है। मानवाता के लिए इनके प्रयास को देखकर आपका दिल भी इनके जज्बे को सलाम करेगा। अपनी सेवा के बदौलत ही ये 16 बार नोबल प्राइज के लिए नामांकित किए जा चुके हैं।

पाकिस्तान के 'फादर टेरेसा'....

अब्दुल सत्तार इदी..पाकिस्तान के 'फादर टेरेसा'....लाखों लोगों की जिन्दगियां इस नाम के साए में महफूज हैं। पाकिस्तान में इनकी प्रतिष्ठा का आलम ये है कि इदी फाउंडेशन की गाड़ियां पहुंचते ही गोलीबारी थम जाती है। कर्फ्यू में इनकी गाड़ियों को कोई खतरा नहीं रहता। दंगा थम जाता है। इनके साए में अमन चैन महफूज रहता है।

कराची, पेशावर हो चाहे ब्लूचिस्तान हर जगह इनको हर धर्म, जाति के लोग इज्जत बख्शते हैं। पर्दा में सदैव रहने वाली औरतें भी जब इनको देखती हैं तो हाथ मिलाकर इनके हाथों को चूम लेती हैं। वह ऐसा महसूस करती हैं कि इनसे मिलना जैसे अल्लाह का फजल हो। इनकी सादा तबियत और बेनियाजी लोगों को काफी प्रभावित करती है।

पाकिस्तान में दूसरे गांधी के नाम से मशहूर

कोई भी धर्म मानवता से बड़ा नहीं होता। यही संदेश देते हैं पाकिस्तान में दूसरे गांधी के नाम से मशहूर, अब्दुल सत्तार इदी। पाकिस्तान में कहीं भी, कभी भी, कोई भी हादसा हो, इदी का मेडिकल एंबुलेंस सबसे पहले पहुंचता है। यह महज संयोग कहें या मिट्टी का असर, पाकिस्तान के इस गांधी का जन्म स्थान भी गुजरात ही है। गुजरात के बंतावा गांव में इदी का जन्म 1928 में हुआ था।

सन् 1947 में भारत विभाजन के बाद उनका परिवार भारत से पाकिस्तान गया और कराची में बस गया। 1951 में आपने अपनी जमा पूंजी से एक छोटी सी दुकान ख़रीदी और उसी दुकान में इन्होंने एक डाक्टर की मदद से छोटी सी डिस्पेंसरी खोली। इसी जमांपूजी से जो भी कमाते खुद सड़क किनारे अपना बसर कर लेते लेकिन बचे हुए पैसों से गरीबों की मदद किया करते थे।

एक बार करांची में फ्लू की महामारी फैली इदी साहेब ने टेंट लगाया और मरीजों को मुफ्त दवाएं बांटी। इतना ही नहीं मरीजों की इतनी सेवा की कि लोगों ने इनके सेवा भाव को देखते हुए इनको बहुत पैसा दिया। इसके बाद अब्दुल सत्तर इदी ने इदी फाउण्डेशन बनाया। आज इदी फाउन्डेशन पाकिस्तान और दुनिया के करीब 13 देशों में कार्यरत है। गिनीज विश्व कीर्तिमान के अनुसार इदी फाउन्डेशन के पास संसार की सबसे बड़ी निजी एम्बुलेंस सेवा हैं।

इस फाउंडेशन के पास 1800 एंबुलेंस, 3 एयरोप्लेन और एक हेलीकॉप्टर है। पूरे देश में करीब 450 केंद्र हैं। इनकी संस्था अभावग्रस्त को सहारा, अनाथों के लिए अनाथालय, मुफ्त अस्पताल, पुनर्वास करना, विकलांग लोगों के लिए बैसाखी, व्ह्लील चेयर उपलब्ध कराना, प्राकृतिक आपदा से ग्रसित लोगों के लिए हर मदद उपलब्ध कराती हैं। इनकी संस्था लंदन और अमेरिका सहित दुनिया के 13 देशों में समाजहित में कार्य करती हैं।

इस संस्था ने करीब 40 हजार नर्सों को ट्रेनिंग दी है। पाकिस्तान में लोग करुणा का देवदूत और पाक का फ़ादर टेरेसा कहते हैं। इन्होंने लाखों अनजान लोगों का दाह संस्कार किया है। उनकी पत्नी बेगम बिलकिस इदी, बिलकिस इदी फाउन्डेशन की अध्यक्षा हैं। पति-पत्नी को सम्मिलित रूप से सन् 1986 का रमन मैगसेसे पुरस्कार समाज-सेवा के लिये प्रदान किया गया था। इन्हें गांधी शांति पुरस्कार 2007 में भारत सरकार ने दिया था। उन्हे लेनिन शान्ति पुरस्कार और बलजन पुरस्कार भी मिले हैं।

करांची की प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक प्राध्यापिका किरण बशीर अहमद के मुताबिक, पाकिस्तान में अब्दुल सत्तार इदी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। सादा तबियत और बेनियाजी के धनी इदी को इंसानी खिदमत ने काफी शोहरत दी है।

इदी सड़कों के किनारे पड़े हजारों शव का दाह-संस्कार करने के साथ मानवता के हर घाव पर मरहम लगाते हैं। इदी अनाथों की देखभाल सहित उनकी शादी तक का जिम्मा उठाते हैं। मानवता का यह देवदुत केवल पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि दुनिया में कहीं भी प्राकृतिक आपदा आए सेवा में हाजिर रहता है। थोड़े शर्मीले इदी, चकाचौंध से दूर ही रहना पसंद करते हैं। पाकिस्तान के लोग शांति के नोबल प्राइज के लिए योग्य व्यक्ति मानते हैं।

आज इदी खानदान के पास जो कुछ भी है वह दुखी इन्सानों पर लुटाने के लिए ही है। इनकी झूला स्कीम.. ने हजारों मासूम बच्चों की जान बचा ली है। बेसहारा लड़कियों की शादी करते वक्त अब्दुल सत्तार इदी की पत्नी बिलकिस खुद छानबीन करती हैं। जब खुद उनको भरोसा हो जाता है तब अपने संस्था में रह रही अनाथ बच्चियों की शादी करती हैं। शादी के रस्मों रिवाज का खास ख्याल रखा जाता है।

शादी में शरीक होने पर ऐसा लगता है कि इनकी अपनी बेटी की ही शादी हो। सभी बच्चों को खुद अपने बच्चों जैसा प्रेम और भाव रखते हैं। एक बार अब्दुल सत्तार इदी के बेटे फैसल ने साइकिल मांगी। इदी साहब ने मना कर दिया। इसके बाद अपने बेटे को समझाते हुए कहा'' मैं सायकिल तभी दूंगा, जब सभी बच्चों को दे पाउं।''




सोमवार, 23 जनवरी 2012

परंपरागत ज्ञान का भंडार- अब पहुंच रहा है सबके द्वार


प्रकाश के महत्व का अहसास तब होता है तब हम अंधेरे में होते हैं। हमारे लिए हल्दी, नीम, धनिया, पुदीना, अश्वगंधा, कालमेघ, ब्राह्मी, वासा, अशोक, भृंगराज, जायफल, दालचीनी, अश्वगंधा, मेथी, प्याज, कमल, तरबूजे, घृतकुंवारी, जीरा, अदरक, लहसून, बबूल, कढी पत्ता, दूधिया, तुलसी, तेजपत्र, तिल, दही, दूब, अरबा चावल का महत्व भले ही ना हों(क्योंकि हमें पश्चिमी ब्रांड लुभाता है, ललचाता है, हम किसी अच्छे ब्रांड की खोज कर नहीं सकते), अगर महत्व भी है तो थोड़ा बहुत। क्योंकि दादी- मां-बुआ-दीदी जाने-अनजाने सब्जी, सांभर, दाल, सलाद, ठंडई, लस्सी, लड्डू, चूरमा आदि में डालकर हम तक पहुंचा देती हैं। मगर, इतनी गुणवत्ता, अच्छाई, औषधीय गुण, इनकी निरापदता, इनकी प्राकृतिक उपलब्धता दुनियाभर के लोगों को आश्चर्य में डाल रही हैं, सिर्फ इसलिए वो इनके गुणों की खोज में दिनरात एक किए हुए हैं, इनके औषधीय गुणों की खोज के लिए अरबों खरबों डॉलर शोध कार्यों पर खर्च कर रहे हैं। स्वाभाविक है कि जब वो इतना खर्च करते हैं, इनपर इतनी मेहनत करते हैं तो इसका व्यावसायिक फायदा भी उठाना चाहेंगे।

हम जीवन में खुशहाली भरने वाले इन घरेलू उपयोग की औषधियों से अंजान हैं और इस हमारे इस अनजानेपन का फायदा विदेशी कंपनियां उठा रही हैं। वो इन औषधियों को पेटेंट कराकर अरबों-खरबों कमा रही हैं। हम पर हुकूमत कर रही हैं। करे भी तो क्यों नहीं, वो उस लायक हैं। उन्होंने खुद को इस लायक बनाया है। और एक हम हैं कि इन स्वदेशी चीजों, स्वदेशी सूत्रों, स्वदेशी मूल्यों को पहचान नहीं रहे हैं।

जब हम स्वदेशी की बात करते हैं तो कई लोगों की त्योरियां चढ़ जाती है। वो हमें कूप मंडूक समझने लगते हैं। स्वदेशी का मतलब सिर्फ इस बात से है कि जो चीज हम नहीं बना सकते हैं, अगर उनका कोई विक्लप हमारे पास मौजूद नहीं हो तो हम उनका आयात करें, काफी पैसा खर्च करके भी। मगर, जो चीजें, जो तकनीक हमारे पास है हम उसका आयात क्यों करें। क्यों नहीं हम अपनी तकनीक, अपने ज्ञान को बढ़ावा दें, नई तकनीक की खोज करें, शोध कार्यों पर खूब खर्च करें। हम अपने को आईटी हब घोषित करने पर कितना ही गर्व क्यों न करें। मगर सच्चाई है कि चीन के मुकाबले आईटी के क्षेत्र में हमारा शोध कार्य दसवां हिस्सा भी नहीं है। अगर चीन विश्वशक्ति होने की बात करता है तो ये उस अभिमान नहीं है, मगर हम विश्वशक्ति या सुपर पावर बनने की बात करें तो हमारा दंभ है।

विषयांतर होने के लिए क्षमा करेंगे। तो हम बात कर रहे थे, स्वदेशी औषधियों की, जिसे विदेशी कंपनियां पेटेंट कराने में जुटी हैं। इन औषघियों में छिपे औषधीय गुणों की खोज में वो लगातार जुटी हुई हैं और हम इसकी महत्ता स्वीकारने तक के लिए तैयार नहीं हैं। जब तक हम इसके महत्व को नहीं समझेंगे हम इसपर शोध कर ही नहीं सकते। छोड़िए शोध की बात। हम कहां फंसते जा रहे हैं। सदियों की गुलामी ने हमें मानसिक स्तर पर गुलाम बना दिया है। हम पूरी तरह नकली हो गए हैं। मगर शोध, अध्ययन, खोज, नवीनता की बात सोच भी नहीं सकते। अपने मूल्यों, अपनी परंपराओं, अपनी मान्यताओं पर स्वाभिमान के बजाय हमें इनपर शर्म आती है। शोध करने के लिए ना हमारे पर समय है और ना ही संसाधन। इसकी मानसिकता और इसके लिए धैर्य की परंपरा तो हम कब का खो चुके हैं।

मगर, देश में अब भी कुछ लोग हैं जिन्हें अपने परंपरागत ग्यान पर गर्व है। वो न सिर्फ इसे बचाना चाहते हैं, बल्कि इसे बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लंबी लड़ाई लड़ने से भी बाज नहीं आते। ऐसे ही कुछ लोगों के प्रयास से हमारा परंपरागत ग्यान विदेशी कंपनियों के व्यावसायिक चंगुल से बच सका।

डॉ रघुनाथ अनंत माशेलकर जिन्होंने, हल्दी (अमेरिकी पेटेंट संख्या-USP 5,401,5041)और बासमती चावल (USP 5,663,484) को अमेरिकी पेटेंट के चंगुल से मुक्त कराने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी और इसे मुक्त भी कराया, ने परंपरागत ग्यान को औद्योगिक ग्यान के समतुल्य माना।

डॉ माशेलकर ने जब हल्दी को अमेरिकी पटेंट मिलने की बात सुनी तो उनकी प्रतिक्रिया आम भारतीयों जैसी नहीं थी। उन्होंने अपने बचपन के दिनों को याद किया। जब उनकी मां ने एक घायल पक्षी को हल्दी का लेप लगाकर उड़ा दिया। डॉ माशेलकर ने सोचा अगर हल्दी में घाव को ठीक करने का औषधीय गुण नहीं होता तो घायल पक्षी ठीक होकर कैसे उड़ जाती। इसी बात ने उस अमेरिकी पटेंट के प्रति उनकी सोच को एक लंबी लड़ाई में बदल दी।

ये लड़ाई इतनी आसान नहीं थी। आप किसी बड़ी अमेरिकी कंपनी से खिलाफ अमेरिका के ही पेटेंट कार्यालय में लडेंगे, इसकी हिम्मत भी जुटा पाना अपने आप में एक बड़ी बात है। फिर इस बात को साबित करना कि हल्दी में औषधीय गुण है और इसे आप सदियों से जानते हैं और इसका प्रमाण प्रस्तुत कर उस अमेरिकी कंपनी को मात देना सूई से छेद से हाथी गुजरने जैसा है। मगर, हिम्मत--मर्द, मदद--खुदा। यानी ईश्वर उसी की मदद करता है जो अपनी मदद खुद करता है। डॉ माशेलकर की टीम ने ये लड़ाई सालों तक लड़ी और हल्दी और बासमती को अमेरिकी पेटेंट से मुक्त कराया।

उस समय एक-एक पेटेंट को मुक्त कराने के लिए औसतन सात से आठ सालों तक लड़ाई लड़नी पड़ती थी। ऐसे में में जरूरत थी- उपलब्ध प्रामाणिक सामग्रियों के एक समग्र दस्तावेजीकरण की। इस दिशा में प्रयास शुरू हुई और विकसित हुई-टीकेडीएल यानी ट्रैडिशनल नॉलेज डिजीटल लाइब्रेरी यानी परंपरागत ग्यान डिजीटल पुस्तकालय।

जैसा कि नाम से ही अस्पष्ट है। यह पुस्तकालय हमारे परंपरागत ग्यान का पुस्तकालय है। हमारे ग्यान की परंपरा हजारों साल पुरानी है। जब दुनिया के ज्यादातर देश में सभ्यता की नींव भी नहीं पड़ी थी, वहां के लोग अग्यान के अंधकार में भटक रहे थे। उस समय भारत में ग्यान की परंपरा अपने स्वर्ण काल में थी। ग्यान की वो परंपरा चर्मोत्कर्ष पर थी। हमारे यहां भगवान धन्वंतरी, आचार्य चरक, सुश्रुत, वरामिहिर, आचार्य जीवक, चाणक्य, बह्मगुप्त, नागार्जुन, आर्यभट्ट जैसे आचार्यों की एक महान परंपरा रही है। दुर्भाग्यवश, कुछ सौ सालों के विदेशी शासन ने हमें एकबार के लिए अंधकारयुग में धकेल दिया और इस समय पश्चिमी दुनिया के देशों ने औद्योगिक क्रांति देखी और हम पर उन्होंने बढ़त बना ली।

आजादी के बाद एक मौका था, उस अंधकारयुग से निकलने का। लेकिन दुर्भाग्यवश हम नवोदित पश्चिमी विकास परंपरा को विकास और ग्यान का अंतिम आधार मान लिया। हमने परंपरागत ग्यान को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। हमने ग्यान की उस महान परंपरागत को न समझने की कोशिश की और ना उसे आगे बढ़ाने। नतीजा विकास और ग्यान का नये मानदंड गढ़ने वालों ने हमारी उस महान परंपरा को एक एक कर अपने नाम पटेंट कराना शुरू कर दिया। नीम, बासमती, गोमूत्र, हल्दी, लहसून, गुलाब, दालचीनी.. एक के बाद एक पटेंटे कराए जाने लगे। जो चीज हमारी थी, पर उस दूसरे लोगों ने कब्जा करना शुरू कर दिया।

ऐसे संक्रमणकाल में डॉ माशेलकर जैसे विभूतियों ने ग्यान के उस अद्भुत भंडार को बचाने का बीड़ा उठाया। डॉ माशेलकर ने परंपरागत ग्यान को औद्योगिक ग्यान का समानांतर और उसी के बराबर बताया।

टीकेडीएल- यानी परंपरागत ग्यान डिजीटल लाइब्रेरी के जरिए उस महान ग्यान परंपरा के एक अंश को सुरक्षित करने की कोशिश हुई। यह लाइब्रेरी- पांच भाषाओं(दुर्भाग्यवश- इनमें हिंदी शामिल नहीं है) यथा- अंग्रेजी, डच, जापानी, फ्रेंच भाषा में उपलब्ध है। यह लाइब्रेरी करीब साढ़े तीन करोड़ पृष्ठों का है। इसमें भारतीय औधषीय प्रणाली आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध चिकित्सा प्रणाली में प्रयुक्त औषधीय पौधों और योगों का कोष तैयार किया। डीकेडील की शुरुआत २००१ में वैग्यानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद यानी सीएसआईआर और आयुष(आयुर्वेद, योग, प्राकृत, युनानी, सिद्ध और होम्योपैथी विभाग) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वाधान में हुई। इस कोष का उद्देश्य परंपराग ग्यान को बायो-पाइरेसी और अनैतिक पेटेंट से बचाना है। साथ ही, ग्यान को इलेक्ट्रॉनिक रूप से दस्तावेजीकरण और वर्गीकरण है। ये लाइब्रेरी आधुनिक शोध के लिए भी उपयोगी है।

वर्ष २०१० तक इसमें १४८ किताबों को इलेक्टॉनिक रूप से अंग्रेजी, स्पेनिश, जापानी, फ्रेंच, जर्मन में दस्तावेजीकृत किया जा चुका है। इसमें अस्सी हजार आयुर्वेदिक, दस लाख यूनानी, बारह हजार सिद्ध योगों को शामिल किया जा चुका है। साथ ही, इसने यूरोपीय पेटेंट ऑफिस, ब्रिटानी ट्रेडमार्क एवं पेटेंट ऑफिस, अमेरिकी पेटेंट ऑफिस से समझौता कर रखा है कि वो बायो-पाइरेसी से बचाने के लिए पेटेंट देने से पहले डाटा बेस की जांच कर लें। २००६ में पेटेंट इन ऑफिसों को इस शर्त पर टीकेडीएल की पहुंच दी गई, कि वो इस जानकारी को किसी के सामने उद्घाटित नहीं करेंगे और परंपरागत ग्यान को अवैध तरीके से पटेंट कराए जाने से रोका जा सकेगा।

एक अन्य प्रयास के तहत योग के १५०० आसनों का इलेक्ट्रॉनिक डाटाबेस बनाने की परियोजना २००८ में शुरू हुई। वो इन आसनों के अवैध पटेंट कराए जाने के लिए प्रत्युत्तर में। २००७ करीब १३१ आसनों के पेटेंट अकेले अमेरिका में कराए जा चुके थे। इस पर संसद में हंगामे के बाद भारत ने ये मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाया। योग शिक्षकों, अधिकारियों और वैग्यानिकों की मदद से सीएसआईआर ने करीब पैंतीस ग्रंथों के आधार पर २००९ में १५०० आसनों का डाटाबेस तैयार किया।

इतने वृहत कार्य को करने में मात्र सात करोड़ रुपये खर्च हुए। ये महज एक शुरुआत थी। आगे क्या करना है, इसपर भी नीति-निर्माताओं को सोचने की जरूरत है।



जनरल वीके सिंह उम्र विवाद


थलसेना प्रमुख जनरल वीके सिंह का जन्म 1950 में नहीं बल्कि 1951 में हुआ। हालांकि सरकार जनरल का जन्म 1950 में होने का दुष्प्रचार कर रही है। जो दस्तावेज सामने आए हैं। वो साबित करते हैं कि राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) में मौजूद दस्तावेजों में यही तारीख दर्ज है

यूपीए सरकार चाहती है कि जनता इस पर विश्वास करे कि जनरल सिंह अपने जन्म का वर्ष 'बदलवाना' चाहते हैं, क्योंकि वह अपना कार्यकाल एक साल बढ़वाना चाहते हैं। जबकि सच इसके उलट है। एनडीए में अपने शुरुआती दौर में जनरल सिंह ने कैडेट के तौर पर अपनी कहानी लिखी थी। इसका पहला वाक्य है, 'मैं 10 मई 1951 को पैदा हुआ।'

सरकार ने उनकी जन्म तिथि 10 मई 1950 मानी है। वहीं, सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर अपनी जन्मतिथि 10 मई 1951 होने का दावा किया है। इससे पहले जनरल सिंह के तत्कालीन अंग्रेजी शिक्षक बीएस भटनागर ने भी कहा था कि उनकी गलती से एनडीए का आवेदन भरते समय सिंह की जन्म तारीख 1950 दर्ज हो गई थी। भटनागर ने ही यह फार्म भरा था।

क्या कहता है रिकॉर्ड
-
जनरल सिंह के पिता मेजर जगत सिंह की बटालियन 14 राजपूत रेजिमेंट्स ने तीन अगस्त 1965 को प्रमाणित किया है कि सेना प्रमुख का जन्म 10 मई 1951 को हुआ था। सेना की आधिकारिक रिकॉर्ड कीपर एडजुटेंट जनरल ने भी इसी तारीख का उल्लेख किया है।

- राजस्थान सेकंडरी बोर्ड के स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट में भी जन्म तारीख 10 मई 1951 है।

- एयरफोर्स सिलेक्शन बोर्ड में जनरल सिंह ने 1965 में जब पहली बार आवेदन किया था उसके दस्तावेज में भी जन्म की तारीख 10 मई 1951 है।

-जनरल सिंह के स्कूल के स्कॉलर रजिस्टर में भी जन्म की तारीख 1951 बताई गई है।

  • कानून मंत्रालय में रक्षा मामलों के कानूनी सलाहकार ने साफ कहा है कि स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट उम्र को साबित करने का मजबूत साक्ष्य है।

  • आखिर सरकार एक राष्ट्रभक्त जनरल को जालसाझ साबित करने में क्यों जुटी है.. ये समझना जरा भी मुश्किल नहीं है। क्योंकि ये भ्रष्टचार एक भी ईमानदार व्यक्ति को किसी भी पद पर देख नहीं सकती। क्योंकि एक-एक ईमानदार व्यक्ति उसकी नींद हराम करने के लिए काफी है।

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

अंदर का आदमी, बाहर का आदमी- संदर्भ गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति

बात ज्यादा पुरानी नहीं है। बसपा से निष्कासित भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे बाबू सिंह कुशवाहा को भाजपा ने बड़ी ही बेशर्मी से पार्टी में शामिल कर लिया। वही, भाजपा-
  • जिसके एक मुख्यमंत्री ने उत्तराखंड में एक ऐसा लोकायुक्त कानून बनाया जिसकी प्रशंसा टीम अन्ना तक ने की।
  • जिसके एक मुख्यमंत्री को भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल की हवा खानी पड़ी।
  • जिसके अध्यक्ष ने टीम अन्ना को लोकपाल के मुद्दे पर समर्थन देने की चिट्ठी दे डाली। उसी भाजपा ने ऐसी बेशर्मी कर दी। बाबू सिंह कुशवाहा को पार्टी में शामिल कर लिया। पार्टी आलाकमान के इस फैसले के विरोध में पार्टी के कई बड़े छोटे नेताओं ने विरोध का झंडा थाम लिया। गोरखपुर सांसद आदित्यनाथ और उमा भारती ने तो उत्तरप्रदेश में पार्टी के लिए चुनाव प्रचार नहीं करने का ऐलान कर दिया। तो वहीं, मेनका गांधी सहित कई नेता ने आलाकमान के फैसले की आलोचना शुरू कर दी। इस विरोध के चलते आलाकमान को अपना फैसला वापस लेना पड़ा और पार्टी में कुशवाहा की सदस्यता स्थगित करनी पड़ी। आखिर भाजपा आलाकमान ने ऐसा फैसला क्यों लिया, जिसके लिए उसे अपनी पार्टी के अंदर ही विरोध झेलना पड़ा हो। ऐसा नहीं है कि भाजपा आलाकमान ने बिना-सोचे समझे इतना बड़ा फैसला ले लिया हो।
  • युद्ध का नाम भले ही धर्मयुद्ध हो, मगर युद्ध धर्मयुद्ध नहीं होता। युद्ध में जीत ही एकमात्र लक्ष्य होता हो, चाहे उसके लिए कितना ही पाप क्यों ना करना पड़े। जहां एक ओर, अल्पसंख्यकों को लुभाने के लिए अल्पसंख्यक आरक्षण का ब्रह्मास्र हो तो दूसरी ओर वाला दामन में थोड़ा दाग लगाने से गूरेज कोई कैसे करेगा।
    सो भाजपा ने एक बड़ा वोट बैंक अपने हिस्से में करने के लोभ से कुशवाहा को अपनी पार्टी का हिस्सा बना लिया। मगर, सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस में कोई एक नेता सोनिया और राहुल का विरोध कर सकता है। क्या किसी में ऐसा करने की हिम्मत है। शायद नहीं। कांग्रेस के अंदर क्या, कांग्रेस के बाहर भी बहुत कम लोगों में सोनिया और राहुल का विरोध करने की हिम्मत है।
  • बीसी खंडूरी जैसे कितने लोग हैं जो रेलखंड का उद्घाटन सोनिया से कराने के विरोध में राष्ट्रपति से शिकायत कर सकते हैं।
  • किसे सीबीआई का डंडा सहने की शक्ति है- ना तो लालू में ना रामविलास में, ना मायावती में और ना ही मुलायम में।
  • अकेली ममता बनर्जी ने केंद्र सरकार के चार अहम फैसले के खिलाफ खड़ा होने की हिम्मत दिखा दी, शायद इसलिए कि ममता को सीबीआई का डर नहीं है और पश्चिम बंगाल में उनको कांग्रेस का डर भी नहीं है।
  • लेख के मुख्य विषय पर तो अभी आए भी नहीं, भूमिका बहुत बड़ी हो गयी। मगर इस बड़ी भूमिका का संबंध गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति से है।
  • एक केंद्र सरकार है जिसे लोकपाल बनाने में बाहरी(शायद विदेशी?) लोगों का हस्तक्षेप नहीं चाहिए। चार-पांच तेज, तर्रार शातिर टाइप के मंत्री मिलकर एक डिब्बा टाइप अपंग लोकपाल बनाकर उसे संवैधानिक का दर्जा दिला देगी(जनता से कह देगी कि भ्रष्टाचार से केवल वही लड़ सकती है- राहुल करेंगे- लोकपाल को संवैधानिक दर्जा दिलाना राहुल का नहीं, इस देश के हर युवा का सपना है)
  • राहुल ने ये कैसे सोच लिया, कि देश के युवा का सपना इतना अपंग, इतना निर्बल, इतना कमजोर है- जो ऊपर बैठे कुछ लोगों के हाथों की कठपुतली हो।
  • देश के युवाओं का सपना मंत्रियों नेताओं, अफसरों को भ्रष्टाचार करने की खुली छूट देता हो और कमजोर, असहाय और न्याय के लिए लड़ने वालों की नींद हराम करता हो।
  • केंद्र को अपने ऊपर नजर रखने वाले कानून बनाने के लिए बाहरी आदमी का हस्तक्षेप नहीं चाहिए-- लेकिन राज्यों एक बाहरी आदमी(राज्यपाल- यानी केंद्र का एजेंट) हरवक्त राज्य सरकारों की नींद उड़ाने के लिए चाहिए जो राज्य सरकारों के अधिकारों में हस्तक्षेप करे।
  • वैसे लंबे समय से राज्यों में राज्यपालों की भूमिका केंद्र के एजेंट की रही है, जो विरोधी पार्टी की सरकारों को अस्थिर करने में जुटी रहते हैं। मगर, गुजरात में लोकायुक्त की नियुक्ति जिस तरह से हुई है, उसने राज्यपाल की भूमिका पर कई सवाल खड़े किए हैं।
  • गुजरात हाईकोर्ट ने भले ही लोकायुक्त की नियुक्ति को वैध करार दिए हों, लेकिन कई राज्यों के राज्यपालों ने(इनमें कर्नाटक के राज्यपाल, पूर्व कानून मंत्री और सोनिया गांधी के भक्त एच आर भारद्वाज यानी हंसराज भारद्वाज भी शामिल हैं) जिन्होंने साफ साफ कहा है कि राज्यपालों की शक्ति सीमित है क्योंकि वह मुख्यमंत्रियों की तरह चुना हुआ प्रतिनिधि नहीं होता है, इसलिए लोकायुक्त की नियुक्ति जैसे अहम मुद्दे पर उसे मुख्यमंत्री से जरूर राय-मशविरा लेना चाहिए। मगर, गुजरात की राज्यपाल ने ऐसा नहीं किया।
  • सुप्रीमकोर्ट के कई वकीलों ने भी कहा है कि संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, राज्यपाल को ऐसे अहम मामलों में मुख्यमंत्री से रायमशविरा करना चाहिए।
  • फिलहाल मामला सुप्रीमकोर्ट पहुंच गया है। गुजरात हाईकोर्ट ने मामले को सुप्रीमकोर्ट में चुनौती दी है।

रविवार, 15 जनवरी 2012

जन आंदोलनों और जन जागरुकता का साल

इस लेख को पढ़ने के लिए डीवीटीटी योगेश फॉंट की आवश्यकता हो सकती है जिसे यहां से डॉऊनलोड किया जा सकता है।


ºÉÉ±É 2011 PÉÉä]õɱÉÉäÆ Eäò ¦ÉÆb÷É¡òÉäc÷ +Éè®ú VÉxÉ +ÉÆnùÉä±ÉxÉÉäÆ EòÉ ºÉÉ±É ®ú½þÉ* §É¹]õÉSÉÉ®ú Eäò ÊJɱÉÉ¡ò ´ÉÊ®ú¹`ö ºÉɨÉÉÊVÉEò EòɪÉÇEòiÉÉÇ +zÉÉ ½þVÉÉ®äú xÉä näù¶É´ÉÉʺɪÉÉäÆ EòÉä BEòVÉÖ]õ ÊEòªÉÉ +Éè®ú ¨ÉVɤÉÚiÉ ±ÉÉäEò{ÉÉ±É Eäò ʱÉB ±Éc÷É<Ç ±Éc÷Ò* <ºÉ ±Éc÷É<Ç xÉä näù¶É EòÒ ºÉƺÉnù EòÉä VÉxÉiÉÉ EòÒ +É´ÉÉVÉ ºÉÖxÉxÉä Eäò ʱÉB ¨ÉVɤÉÚ®ú ÊEòªÉÉ*


ºÉÉ±É 2010 EòÒ iÉ®ú½þ ºÉÉ±É 2011 EòÉä ¦ÉÒ PÉÉä]õɱÉÉäÆ Eäò ºÉÉ±É Eäò °ü{É ¨ÉäÆ ªÉÉnù ÊEòªÉÉ VÉÉBMÉÉ* ´É½þÒÆ, <ºÉ ºÉÉ±É EòÉä BEò +Éè®ú ¤ÉÉiÉ Eäò ʱÉB ªÉÉnù ÊEòªÉÉ VÉÉBMÉÉ +Éè®ú ´ÉÉä ½èþ "VÉxÉ VÉÉMɯûEòiÉÉ"* §É¹]õÉSÉÉ®ú EòÉä +{ÉxÉä VÉÒ´ÉxÉ EòÉ +ʦÉzÉ Ê½þººÉÉ ¨ÉÉxÉ SÉÖEòÒ +É¨É VÉxÉiÉÉ xÉä <ºÉEäò ÊJɱÉÉ¡ò +É´ÉÉVÉ ¤Éֱɯnù ÊEòªÉÉ* ÊxÉ®úɶÉÉ +Éè®ú EÖòÆ`öÉ EòÉ Ê¶ÉEòÉ®ú ½þÉä SÉÖEòÒ +É¨É VÉxÉiÉÉ EòÉä +nùɱÉiÉ, +zÉÉ, º´ÉɨÉÒ ®úɨÉnäù´É, ºÉÖ¥ÉÀhªÉ¨É º´ÉɨÉÒ, |ɶÉÉÆiÉ ¦ÉÚ¹ÉhÉ, +®úÊ´ÉÆnù EäòVÉ®úÒ´ÉÉ±É +Éè®ú ÊEò®úhÉ ¤ÉänùÒ ¨ÉäÆ +ɶÉÉ EòÒ ÊEò®úhÉ ÊnùJÉÒ +Éè®ú näù¶É EòÒ VÉxÉiÉÉ xÉä

VÉä{ÉÒ +ÉÆnùÉä±ÉxÉ Eäò ¤ÉÉnù ¶ÉɪÉnù {ɽþ±ÉÒ ¤ÉÉ®ú

nù®ú+ºÉ±É, PÉÉä]õɱÉÉäÆ EòÒ ±ÉMÉÉiÉÉ®ú ±ÉƤÉÒ ½þÉäiÉÒ ¡äò½þÊ®úºiÉ,

+ÉÆnùÉä±ÉxÉEòÉÊ®úªÉÉäÆ EòÉä ¤ÉnùxÉÉ¨É Eò®úxÉä +Éè®ú =x½äþÆ ¡ÆòºÉÉxÉä EòÒ VÉèºÉÒ EòÉäʶɶÉäÆ ½Öþ<ÇÆ =ºÉºÉä ±ÉMÉxÉä ±ÉMÉÉ ÊEò ºÉ®úEòÉ®ú §É¹]õÉSÉÉ®ú ºÉä xɽþÒÆ, +ÉÆnùÉä±ÉxÉ +Éè®ú +ÉÆnùÉä±ÉxÉEòÉÊ®úªÉÉäÆ ºÉä ÊxÉ{É]õxÉÉ SÉɽþiÉÒ ½èþ* ¨ÉMÉ®ú, +ÉÆnùÉä±ÉxÉEòÉÊ®úªÉÉäÆ xÉä ¦ÉÒ ZÉÖEòxÉä ºÉä ºÉÉ¡ò

§É¹]õÉSÉÉ®ú Eäò ÊJɱÉÉ¡ò <ÆÊb÷ªÉÉ +MÉÆº]õ Eò®ú{¶ÉxÉ EòÒ MÉÊiÉÊ´ÉÊvɪÉÉÆ Ê{ÉUô±Éä ºÉÉ±É +C]Úõ¤É®ú ¨ÉäÆ ¶ÉÖ°ü ½Öþ<Ç* ºÉÆMÉ`öxÉ xÉä 29 +C]Úõ¤É®ú 2010 EòÉä BEò |ÉäºÉ EòÉÆ£äòÆºÉ EòÒ.. ÊVɺɨÉäÆ ®úɹ]Åõ¨ÉÆb÷±É JÉä±É PÉÉä]õɱÉä EòÒ VÉÉÆSÉ Eò®ú ®ú½þÒ ¶ÉÚÆMɱÉÖ ºÉʨÉÊiÉ EòÉä {ɪÉÉÇ{iÉ +ÊvÉEòÉ®ú xɽþÒÆ ÊnùB VÉÉxÉä EòÉ ¨ÉÖqùÉ =`öɪÉÉ* <ºÉÒ ºÉÉ±É SÉÉènù½þ xÉ´ÉÆ¤É®ú EòÉä ºÉÆMÉ`öxÉ Eäò Eò®úÒ¤É nùºÉ ½þVÉÉ®ú EòɪÉÇEòiÉÉÇ+ÉäÆ xÉä ®úɹ]Åõ¨ÉÆb÷±É JÉä±É PÉÉä]õɱÉä EòÉä ±ÉäEò®ú {ÉÉ̱ɪÉɨÉäÆ]õ º]ÅõÒ]õ {ÉÖÊ±ÉºÉ lÉÉxÉä ¨ÉäÆ BEò ¨ÉɨɱÉÉ nùVÉÇ Eò®úɪÉÉ* ¤ÉÉ<ºÉ ÊnùºÉƤɮú 2010 EòÉä Eò®úÒ¤É ¤ÉÒºÉ ½þVÉÉ®ú EòɪÉÇEòiÉÉÇ+ÉäÆ xÉä ]ÚõVÉÒ PÉÉä]õɱÉä Eäò ÊJɱÉÉ¡ò ®úɨɱÉÒ±ÉÉ ¨ÉènùÉxÉ ¨ÉäÆ |Énù¶ÉÇxÉ ÊEòªÉÉ* <ºÉEäò ¤ÉÉnù iÉÒºÉ VÉxÉ´É®úÒ 2011 EòÉä näù¶É Eäò Eò®úÒ¤É ¤ÉÉ´ÉxÉ ¶É½þ®úÉäÆ ¨ÉäÆ ½þVÉÉ®úÉäÆ EòɪÉÇEòiÉÉÇ+ÉäÆ xÉä |Énù¶ÉÇxÉ ÊEòªÉÉ.. <ºÉ ¤ÉÒSÉ <ÆÊb÷ªÉÉ +MÉÆº]õ Eò®ú{¶ÉxÉ xÉä §É¹]õÉSÉÉ®ú ºÉä ÊxÉ{É]õxÉä Eäò ʱÉB VÉxÉ ±ÉÉäEò{ÉÉ±É EòÉ BEò ¨ÉºÉÉènùÉ iÉèªÉÉ®ú ÊEòªÉÉ.. +Éè®ú ºÉ®úEòÉ®ú ºÉä <ºÉä EòÉxÉÚxÉÒ °ü{É näùxÉä EòÒ ¨ÉÉÆMÉ EòÒ* ¨ÉMÉ®ú, ºÉÆMÉ`öxÉ Eäò

VÉxÉ ±ÉÉäEò{ÉÉ±É EòÉxÉÚxÉ EòÒ ¨ÉÉÆMÉ EòÉä ±ÉäEò®ú +zÉÉ ½þVÉÉ®äú xÉä {ÉÉÆSÉ +|Éè±É 2011 EòÉä Ênù±±ÉÒ Eäò VÉÆiÉ®ú-¨ÉÆiÉ®ú {É®ú +xɶÉxÉ ¶ÉÖ°ü ÊEòªÉÉ* +zÉÉ EòÉä MÉè®ú-ºÉ®úEòÉ®úÒ ºÉÆMÉ`öxÉÉäÆ, ®úÉVÉxÉÒÊiÉEò nù±ÉÉäÆ +Éè®ú Ê¡ò±¨ÉÒ ½þκiɪÉÉäÆ EòÉ ¦ÉÉ®úÒ ºÉ¨ÉlÉÇxÉ Ê¨É±ÉÉ.. VÉÆiÉ®ú ¨ÉÆiÉ®ú Eäò ºÉ¨ÉÉxÉÉÆiÉ®ú Ê´ÉʦÉzÉ ¶É½þ®úÉäÆ ¨ÉäÆ ¦ÉÒ VÉxɱÉÉäEò{ÉÉ±É Eäò ºÉ¨ÉlÉÇxÉ ¨ÉäÆ +ÉÆnùÉä±ÉxÉ ¶ÉÖ°ü ½ÖþB* ]õÒ¨É +zÉÉ xÉä §É¹]õÉSÉÉ®ú Eäò ʴɯûrù ¤ÉxÉä ¨ÉÆÊjɺɨÉÚ½þ {É®ú ½þÒ ºÉ´ÉÉ±É =`öÉ ÊnùªÉÉ* +ÉÊJÉ®úEòÉ®ú, §É¹]õÉSÉÉ®ú Eäò ÊJɱÉÉ¡ò ¤ÉxÉä ¨ÉÆÊjɺɨÉÚ½þ ºÉä ºÉÉiÉ +|Éè±É EòÉä ¶É®únù {É´ÉÉ®ú xÉä <ºiÉÒ¡òÉ näù ÊnùªÉÉ* ºÉ®úEòÉ®ú xÉä PÉÉä¹ÉhÉÉ EòÒ ÊEò ´ÉÉä ºÉÆºÉnù Eäò ¨ÉÉxɺÉÚxÉ ºÉjÉ ¨ÉäÆ ±ÉÉäEò{ÉÉ±É Ê´ÉvÉäªÉEò {Éä¶É Eò®äúMÉÒ* xÉÉè +|Éè±É EòÉä ºÉ®úEòÉ®ú xÉä ±ÉÉäEò{ÉÉ±É EòÉ ¨ÉºÉÉènùÉ iÉèªÉÉ®ú Eò®úxÉä Eäò ʱÉB BEò ºÉƪÉÖHò ºÉʨÉÊiÉ EòÉ MÉ`öxÉ ÊEòªÉÉ ÊVɺɨÉäÆ {ÉÉÆSÉ ºÉnùºªÉ ºÉ®úEòÉ®ú Eäò +Éè®ú {ÉÉÆSÉ xÉÉMÉÊ®úEò ºÉ¨ÉÉVÉ Eäò ¶ÉÉÊ¨É±É ÊEòB MÉB*

<ºÉEäò ¤ÉÉnù ªÉÉäMÉ MÉÖ¯û º´ÉɨÉÒ ®úɨÉnäù´É xÉä EòɱÉävÉxÉ Eäò ÊJɱÉÉ¡ò SÉÉ®ú VÉÚxÉ EòÉä ®úɨɱÉÒ±ÉÉ ¨ÉènùÉxÉ ¨ÉäÆ +xɶÉxÉ ¶ÉÖ°ü ÊEòªÉÉ* ¨ÉMÉ®ú, ÊVÉºÉ º´ÉɨÉÒ ®úɨÉnäù´É EòÉä ¨ÉxÉÉxÉä Eäò ʱÉB EäòÆpù ºÉ®úEòÉ®ú Eäò SÉÉ®ú-SÉÉ®ú ´ÉÊ®ú¹`ö ¨ÉÆjÉÒ ½þ´ÉÉ<Ç +bÂ÷bä÷ {ɽÖþÆSÉä.. =ºÉÒ º´ÉɨÉÒ ®úɨÉnäù´É Eäò +ÉÆnùÉä±ÉxÉ EòÉä Ênù±±ÉÒ {ÉÖÊ±ÉºÉ xÉä +ÉvÉÒ ®úÉiÉ EòÉä ¤Éc÷Ò ½þÒ ¤É¤ÉÇ®úiÉÉ ºÉä EÖòSÉ±É ÊnùªÉÉ* ]õÒ¨É +zÉÉ Eäò +±ÉÉ´ÉÉ Ê´ÉʦÉzÉ ®úÉVÉxÉÒÊiÉEò nù±ÉÉäÆ xÉä ¦ÉÒ Ênù±±ÉÒ {ÉÖÊ±ÉºÉ EòÒ <ºÉ ¤É¤ÉÇ®ú EòÉ®Çú´ÉÉ<Ç EòÒ Eòc÷Ò ÊxÉÆnùÉ EòÒ +Éè®ú <ºÉä ±ÉÉäEòiÉÆjÉ EòÒ ½þiªÉÉ Eò®úÉ®ú ÊnùªÉÉ* ¨ÉMÉ®ú, ºÉ®úEòÉ®ú EòÉä <ºÉ {ÉÖʱÉʺɪÉÉ EòÉ®Çú´ÉÉ<Ç {É®ú VÉ®úÉ ¦ÉÒ +¡òºÉÉäºÉ xɽþÒÆ ½Öþ+É +Éè®ú Eò½þ ÊnùªÉÉ ÊEò {ÉÖÊ±ÉºÉ Eäò {ÉÉºÉ +Éè®ú EòÉä<Ç SÉÉ®úÉ xɽþÒÆ lÉÉ*

=vÉ®ú, ºÉƪÉÖHò ºÉʨÉÊiÉ xÉä iÉÒxÉ ¨É½þÒxÉÉäÆ Eäò nùÉè®úÉxÉ Eò<Ç ¤Éè`öEäòÆ EòÒ.. ¨ÉMÉ®ú,

+zÉÉ ½þVÉÉ®äú xÉä 16 +MɺiÉ ºÉä BEò¤ÉÉ®ú Ê¡ò®ú +ÊxÉζSÉiÉEòɱÉÒxÉ +xɶÉxÉ {É®ú {É®ú VÉÉxÉä EòÉ ¡èòºÉ±ÉÉ Eò®ú ÊnùªÉÉ* ¨ÉÖÆ¤É<Ç Eäò Eò®úÒ¤É iÉÒºÉ ½þVÉÉ®ú ]èõCºÉÒ SÉɱÉEòÉäÆ ºÉʽþiÉ ½þVÉÉ®úÉäÆ Êb÷¤¤Éä´ÉɱÉÉäÆ xÉä ¦ÉÒ +zÉÉ Eäò ºÉ¨ÉlÉÇxÉ ¨ÉäÆ ºÉc÷EòÉäÆ {É®ú =iÉ®úxÉä EòÒ PÉÉä¹ÉhÉÉ Eò®ú nùÒ* <ºÉ nùÉè®úÉxÉ ]õÒ¨É +zÉÉ xÉä Eò<Ç SÉÖxÉÉ´É IÉäjÉÉäÆ ¨ÉäÆ VÉxɨÉiÉ ºÉ´ÉæIÉhÉ ¦ÉÒ Eò®ú´ÉÉB.. +ÉÊJÉ®úEòÉ®ú ºÉÉä±É½þ +MɺiÉ EòÒ iÉÉ®úÒJÉ Eò®úÒ¤É +É MÉ<Ç* ¨ÉMÉ®ú, Ênù±±ÉÒ {ÉÖÊ±ÉºÉ xÉä +ÉÆnùÉä±ÉxÉEòÉÊ®úªÉÉäÆ Eäò ºÉɨÉxÉä EÖòUô BäºÉä ÊxɪɨÉÉäÆ EòÒ ºÉÚSÉÒ {Éä¶É EòÒ.. ÊVɺÉä {ÉÚ®úÉ Eò®úxÉÉ Eò®úÒ¤É-Eò®úÒ¤É xÉɨÉÖ¨ÉÊEòxÉ lÉÉ* +ÉÊJÉ®úEòÉ®ú, +zÉÉ xÉä ÊMÉ®ú}iÉÉ®úÒ näùxÉä EòÉ ¡èòºÉ±ÉÉ ÊEòªÉÉ +Éè®ú <ºÉä +ÉVÉÉnùÒ EòÒ nÚùºÉ®úÒ ±Éc÷É<Ç ¤ÉiÉɪÉÉ*

ºÉÉä±É½þ +MɺiÉ EòÉä Ênù±±ÉÒ {ÉÖÊ±ÉºÉ xÉä +zÉÉ ½þVÉÉ®äú +Éè®ú =xÉEäò ºÉ½þªÉÉäÊMɪÉÉäÆ EòÉä ÊMÉ®ú}iÉÉ®ú Eò®ú ʱɪÉÉ +Éè®ú ¨ÉÊVɺ]Åäõ]õ xÉä =x½äþÆ ºÉÉiÉ ÊnùxÉÉäÆ Eäò ʱÉB ʽþ®úɺÉiÉ ¨ÉäÆ ¦ÉäVÉ ÊnùªÉÉ MɪÉÉ* ªÉÉxÉÒ §É¹]õÉSÉÉ®ú Eäò ÊJɱÉÉ¡ò ±Éc÷xÉä ´ÉɱÉä +zÉÉ §É¹]õÉSÉÉ®ú Eäò +É®úÉäÊ{ɪÉÉäÆ Eäò ¤ÉÒSÉ ÊiɽþÉc÷ {ɽÖþÆSÉ MÉB* +zÉÉ EòÒ ÊMÉ®ú}iÉÉ®úÒ Eäò ʱÉB iɨÉÉ¨É Ê´É{ÉIÉÒ {ÉÉÌ]õªÉÉäÆ xÉä ºÉ®úEòÉ®ú EòÒ Eòc÷Ò ÊxÉÆnùÉ EòÒ +Éè®ú <ºÉä ºÉÆ´ÉèvÉÉÊxÉEò +ÊvÉEòÉ®úÉäÆ {É®ú ½þ¨É±ÉÉ Eò®úÉ®ú ÊnùªÉÉ* SÉÉ®úÉäÆ +Éä®ú ºÉä ÊEò®úÊEò®úÒ ZÉä±ÉxÉä Eäò ¤ÉÉnù SÉÉèiÉ®ú¡òÉ nù¤ÉÉ´É Eäò ¤ÉÒSÉ ºÉ®úEòÉ®ú xÉä +zÉÉ EòÉä Ê®ú½þÉ Eò®úxÉä EòÉ ¡èòºÉ±ÉÉ ÊEòªÉÉ ¨ÉMÉ®ú, +zÉÉ xÉä iÉ¤É iÉEò VÉä±É ºÉä ¤Éɽþ®ú VÉÉxÉä ºÉä

<ÆÊb÷ªÉÉ +MÉÆº]õ Eò®ú{¶ÉxÉ xÉä {ÉÚ®äú BEò ºÉÉ±É iÉEò ±ÉÉäEò{ÉÉ±É EòÒ ±Éc÷É<Ç ±Éc÷Ò.. <ºÉ ±Éc÷É<Ç ºÉä näù¶É EòÉä CªÉÉ ½þÉÊºÉ±É ½Öþ+É.. <ºÉEòÉ +xÉÖ¨ÉÉxÉ ±ÉMÉɪÉÉ VÉÉxÉÉ +¦ÉÒ ¤ÉÉEòÒ ½èþ.. ±ÉäÊEòxÉ <ºÉ +ÉÆnùÉä±ÉxÉ xÉä ±ÉÆ¤Éä ºÉ¨ÉªÉ ¤ÉÉnù näù¶É Eäò ±ÉÉäMÉÉäÆ ¨ÉäÆ VÉxÉ VÉÉMɯûEòiÉÉ ¡èò±ÉÉ<Ç +Éè®ú ÊEòºÉÒ BEò ¨ÉÖqäù {É®ú näù¶É EòÉä BEòVÉÖ]õ ÊEòªÉÉ*



नीतिगत पक्षाघात की शिकार सरकार

इस लेख को पढ़ने के लिए ये फॉंट डाऊनलोड करें


¨ÉxɨÉÉä½þxÉ ºÉ®úEòÉ®ú EòÉ {ɽþ±ÉÉ EòɪÉÇEòÉ±É +ÉÌlÉEò ºÉÖvÉÉ®úÉäÆ Eäò ʱÉB VÉÉxÉÉ MɪÉÉ iÉÉä nÚùºÉ®úÉ EòɪÉÇEòÉ±É {ÉÉìʱɺÉÒ {Éè®úɱÉÉ<ÊºÉºÉ Eäò °ü{É ¨ÉäÆ ¨É¶É½Úþ®ú ½þÉä MɪÉÉ ½èþ* EòÉì{ÉÉæ®äú]õ VÉMÉiÉ EòÉä ÊSÉÆiÉÉ ½èþ ÊEò {ÉÉìʱɺÉÒ {Éè®úɱÉÉ<ÊºÉºÉ näù¶É EòÒ +ÉÌlÉEò iÉ®úCEòÒ {É®ú ¥ÉäEò ±ÉMÉÉ ºÉEòiÉÉ ½èþ* EòÉì{ÉÉæ®äú]õ VÉMÉiÉ Eäò +±ÉɨÉÇ EòÉä ºÉÖxÉEò®ú ºÉ®úEòÉ®ú iÉÉä VÉMÉ ºÉEòiÉÒ ½èþ, ¨ÉMÉ®ú ºÉ®úEòÉ®ú Eäò {ÉÉºÉ <ºÉ ºÉ´ÉÉ±É EòÉ {ÉÖJiÉÉ VÉ´ÉÉ¤É xɽþÒÆ ½èþ ÊEò +ÉÊJÉ®ú ¨É½ÆþMÉÉ<Ç, EòɱÉÉvÉxÉ, PÉÉä]õɱÉÉäÆ +Éè®ú §É¹]õÉSÉÉ®ú ºÉä ÊPÉ®äú +ÉÌlÉEò Ê´ÉEòÉºÉ EòÒ ®úɽþ.. näù¶É Eäò MÉ®úÒ¤ÉÉäÆ +Éè®ú ´ÉÆÊSÉiÉÉäÆ iÉEò EèòºÉä {ɽÖþÆSÉäMÉÒ* +¨ÉÒ®úÒ +Éè®ú MÉ®úÒ¤ÉÒ Eäò ¤ÉÒSÉ ±ÉMÉÉiÉÉ®ú SÉÉèc÷Ò ½þÉäiÉÒ JÉÉ<Ç +ÉÊJÉ®ú EèòºÉä {É]äõMÉÒ*


¤ÉÉiÉ BäºÉÒ ¦ÉÒ xɽþÒÆ ½èþ ÊEò PÉÉä]õɱÉÉäÆ EòÒ ¶ÉÖ¯û+ÉiÉ ªÉÚ{ÉÒB-2 Eäò ¶ÉɺÉxÉEòÉ±É ¨ÉäÆ +ÉEò®ú ½Öþ<Ç ½þÉä*

EòÉì{ÉÉæ®äú]õ VÉMÉiÉ EòÉ +±ÉɨÉÇ ºÉÖxÉEò®ú ºÉ®úEòÉ®ú EòÒ xÉÒÆnù iÉÉä JÉÖ±ÉÒ.. ¨ÉMÉ®ú, +vÉJÉÖ±ÉÒ xÉÒÆnù ¨ÉäÆ ½þÒ ºÉ®úEòÉ®ú xÉä JÉÖnù®úÉ ¤ÉÉVÉÉ®ú ¨ÉäÆ |ÉiªÉIÉ Ê´Énäù¶ÉÒ ÊxÉ´Éä¶É EòÉä ¨ÉÆVÉÚ®úÒ näùxÉä EòÉ ¡èòºÉ±ÉÉ Eò®ú ʱɪÉÉ* ºÉ®úEòÉ®ú Eäò <ºÉ ¡èòºÉ±Éä Eäò ÊJɱÉÉ¡ò xÉ ÊºÉ¡Çò Ê´É{ÉIÉ ¤ÉαEò ºÉ®úEòÉ®ú Eäò ºÉ½þªÉÉäMÉÒ nù±ÉÉäÆ xÉä ¦ÉÒ ¨ÉÉäSÉÉÇ JÉÉä±É ÊnùªÉÉ* ºÉ®úEòÉ®ú Eäò >ð{É®ú +{ÉxÉä +κiÉi´É EòÉ JÉiÉ®úÉ ¨ÉÆb÷®úÉxÉä ±ÉMÉÉ +Éè®ú ¨ÉVɤÉÚ®ú ½þÉäEò®ú +{ÉxÉÉ ¡èòºÉ±ÉÉ ´ÉÉ{ÉºÉ ±ÉäxÉÉ {Éc÷É*


EòÉì{ÉÉæ®äú]õ VÉMÉiÉ Eäò SɽäþiÉä ¨ÉxɨÉÉä½þxÉ ÊºÉÆ½þ Eäò ½þÉäiÉä ½ÖþB ¦ÉÒ JÉÖnù®úÉ IÉäjÉ ¨ÉäÆ |ÉiªÉIÉ Ê´Énäù¶ÉÒ ÊxÉ´Éä¶É EòÉ ¡èòºÉ±ÉÉ ´ÉÉ{ÉºÉ ±ÉäxÉÉ EòÉì{ÉÉæ®äú]õ VÉMÉiÉ EòÉä xÉÉMÉ´ÉÉ®ú MÉÖVÉ®úÉ +Éè®ú +ÉètÉäÊMÉEò PÉ®úÉxÉÉäÆ xÉä ºÉ®úEòÉ®ú EòÒ ¡èòºÉ±Éä EòÒ +ɱÉÉäSÉxÉÉ EòÒ* EÖòUô xÉä iÉÉä ®úÉVÉxÉÒÊiÉEò nù±ÉÉäÆ EòÒ EòɪÉÇ|ÉhÉɱÉÒ {É®ú ½þÒ ºÉ´ÉÉ±É JÉcä÷ Eò®ú ÊnùB*

®úÉVÉxÉÒÊiÉEò ¨ÉiɦÉänùÉäÆ EòÉä ¦ÉÉ®úiÉ EòÒ iÉ®úCEòÒ EòÒ ®úɽþ ¨ÉäÆ xɽþÒÆ +ÉxÉä näùxÉÉ SÉÉʽþB* näù¶É EòÉ |ÉÉSÉÒxÉ MÉÉè®ú´É +Éè®ú +ÉÌlÉEò xÉäiÉÞi´É EòÉä {ÉÖxɺlÉÉÇÊ{ÉiÉ Eò®úxÉÉ ½þ®ú näù¶É´ÉɺÉÒ Eäò ®úɹ]ÅõÒªÉ MÉÉè®ú´É EòÉ |ɶxÉ ½èþ*

®úiÉxÉ ]õÉ]õÉ, ]õÉ]õÉ OÉÖ{É Eäò SÉäªÉ®ú¨ÉèxÉ


ʴɦÉÉVÉxÉEòÉ®úÒ ®úÉVÉxÉÒÊiÉ näù¶É EòÒ iÉ®úCEòÒ EòÉä ®úÉäEò ®ú½þÉ ½èþ* ªÉ½þ +ºÉ½þ¨ÉÊiÉ <ºÉʱÉB ½èþ +Éè®ú ªÉä ¤ÉÖÊrù¨ÉÉxÉÒ xɽþÒÆ ½èþ*

ÊEò®úhÉ ¨ÉVÉÖ¨ÉnùÉ®ú, ¤ÉÉìªÉÉäEòÉìxÉ


+ɶSɪÉÇ ½èþ* ®úÉVÉxÉÒÊiÉ <ºÉ iÉ®ú½þ ºÉä EòÉ¨É Eò®úiÉÒ ½èþ* Eò<Ç ºÉÉÆºÉnù {ÉÉ]õÔ ±ÉÉð{É®ú =`öEò®ú Eò½þiÉä ½èþÆ ÊEò Ê®ú]äõ±É ºÉäC]õ®ú ¨ÉäÆ B¡òb÷Ò+É<Ç +SUôÉ ½èþ, ±ÉäÊEòxÉ {ÉÉ]õÔ ±ÉÉ

Ê´ÉVÉªÉ ¨ÉɱªÉÉ


VÉÒb÷Ò{ÉÒ EòÒ nÚùºÉ®úÒ ÊiɨÉɽþÒ EòÉ +ÉÆEòc÷É JÉiÉ®äú EòÉ ºÉÆEäòiÉ ½èþ* ºÉÖvÉÉ®ú EòÉä MÉÊiÉ näùxÉä EòÒ Vɰü®úiÉ ½èþ* ¤ÉÖÊxɪÉÉnùÒ føÉÆSÉÉ IÉäjÉ ¨ÉäÆ ÊxÉ´Éä¶É ¤ÉgøÉxÉä Eäò ʱÉB ºÉɽþºÉ EòÒ Vɰü®úiÉ ½èþ*

+ÉxÉÆnù ¨ÉʽþÆpùÉ, ¨ÉʽþÆpùÉ OÉÖ{É Eäò ´ÉÉªÉºÉ SÉäªÉ®ú¨ÉèxÉ


BEò iÉ®ú¡ò Ê´ÉEòÉºÉ ½èþ iÉÉä nÚùºÉ®úÒ iÉ®ú¡ò §É¹]õÉSÉÉ®ú* §É¹]õÉSÉÉ®ú {É®ú EòºÉxÉä ±ÉMÉÒ ±ÉMÉÉ¨É iÉÉä lÉ¨É MÉ<Ç Ê´ÉEòÉºÉ EòÒ ®ú}iÉÉ®ú* {ÉÉìʱɺÉÒ EòÉä {ÉIÉÉPÉÉiÉ ½þÉä MɪÉÉ* +C]Úõ¤É®ú ¨É½þÒxÉä ¨ÉäÆ +ÉètÉäÊMÉEò Ê´ÉEòÉºÉ nù®ú ¨ÉÉ

ºÉÉ¡ò ½èþ Ê´ÉEòÉºÉ iÉÉä SÉÉʽþB.. ±ÉäÊEòxÉ §É¹]õÉSÉÉ®ú xɽþÒÆ* CªÉÉäÆÊEò ªÉä §É¹]õÉSÉÉ®ú ½þÒ ½èþ VÉÉä +¨ÉÒ®úÒ +Éè®ú MÉ®úÒ¤ÉÒ Eäò ¤ÉÒSÉ BEò ¤É½ÖþiÉ ¤Éc÷Ò JÉÉ<Ç {ÉènùÉ Eò®úiÉÉ ½èþ* ªÉä §É¹]õÉSÉÉ®ú ½þÒ ½èþ VÉÉä +{É®úÉvÉÒ EòÉä xªÉÉªÉ Eäò Eò`öPÉ®äú iÉEò xɽþÒÆ {ɽÖþÆSÉxÉä näùiÉÉ ½èþ* ªÉä §É¹]õÉSÉÉ®ú ½èþ ÊVɺÉxÉä +É¨É +Énù¨ÉÒ EòÉ VÉÒxÉÉ ¨ÉÖ½þÉ±É Eò®ú ®úJÉÉ ½èþ* Ê´ÉEòÉºÉ ®úɹ]Åõ EòÒ Vɰü®úiÉ ½èþ.. ±ÉäÊEòxÉ <ºÉ Ê´ÉEòÉºÉ EòÉä §É¹]õÉSÉÉ®ú ºÉä nÚù®ú ®úJÉÉ VÉÉxÉÉ Vɰü®úÒ ½èþ.. iÉÉÊEò +É¨É +Énù¨ÉÒ EòÉä <ºÉEòÉ ¡òɪÉnùÉ Ê¨É±É ºÉEäò*

मीडिया पर लगाम लगाना- लोकतंत्र का गला दबाने जैसा

प्रस्तुत लेख को पढ़ने के लिए डीवीटीटी योगेश फॉंट डाऊनलोड कर लें

ºÉɱÉ-2011 ¨ÉäÆ nùÉä ¶É¤nù ºÉ¤ÉºÉä VªÉÉnùÉ Ê´É´ÉÉnùÉäÆ ¨ÉäÆ ®ú½äþ.. =ºÉ¨ÉäÆ BEò SÉÌSÉiÉ ¶É¤nù ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ ¦ÉÒ ½èþ.. ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ, JÉɺÉEò®ú ]äõ±ÉÒÊ´ÉVÉxÉ ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ xÉ ÊºÉ¡Çò, ºÉ®úEòÉ®ú, ®úÉVÉxÉÒÊiÉEò nù±ÉÉäÆ +Éè®ú |ÉäºÉ EòÉ=ÆÊºÉ±É Eäò ÊxɶÉÉxÉä {É®ú ®ú½þÉ, ¤ÉαEò JÉÖnù ]äõ±ÉÒÊ´ÉVÉxÉ ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ Eäò +Ænù®ú ¦ÉÒ BEò +Éi¨É-¨ÉÆlÉxÉ EòÉ nùÉè®ú SÉ±É {Éc÷É ½èþ..

ºÉÉ±É 2011 EòÉä Eò<Ç ¨ÉɪÉxÉÉäÆ ¨ÉäÆ ¦ÉÉ®úiÉÒªÉ ]äõ±ÉÒÊ´ÉVÉxÉ ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ EòÉ xÉ´É VÉÉMÉ®úhÉ EòÉ±É ¦ÉÒ Eò½þÉ VÉÉ ºÉEòiÉÉ ½èþ.. <ºÉ ºÉÉ±É ¦ÉÉ®úiÉÒªÉ ]äõ±ÉÒÊ´ÉVÉxÉ ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ xÉä ¦ÉªÉ, ¦ÉÚiÉ +Éè®ú ¦É¦ÉÚiÉ ºÉä ÊxÉEò±ÉxÉä EòÒ ºÉÉlÉÇEò EòÉäÊ¶É¶É EòÒ..


¨ÉÖZÉä ±ÉMÉiÉÉ ½èþ ÊEò <ºÉ iÉ®ú½þ EòÒ vÉÉ®úhÉÉ ¤ÉxÉiÉÒ VÉÉ ®ú½þÒ ½èþ ÊEò ªÉ½þ ºÉ®úEòÉ®ú SÉÉ®úÉäÆ +Éä®ú ºÉä ÊPÉ®ú SÉÖEòÒ ½èþ,, +Éè®ú ½þ¨É +{ÉxÉä BVÉäÆbä÷ {É®ú SɱÉxÉä ¨ÉäÆ ºÉIÉ¨É xɽþÒÆ ½èþÆ.. näù¶É ¨ÉäÆ BEò |ÉEòÉ®ú EòÉ ´ÉÉiÉÉ´É®úhÉ ¤ÉxÉɪÉÉ VÉÉ ®ú½þÉ ½èþ.. ¨ÉèÆ Ê´ÉxÉ©ÉiÉÉ{ÉÚ´ÉÇEò Eò½þiÉÉ ½ÚþÆ ÊEò +ÉVÉ Eò<Ç ¨ÉɨɱÉÉäÆ ¨ÉäÆ ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ EòÒ ¦ÉÚʨÉEòÉ +É®úÉä{ÉEòiÉÉÇ, +ʦɪÉÉäVÉxÉEòiÉÉÇ +Éè®ú VÉVÉ iÉÒxÉÉäÆ EòÒ ½þÉä MÉ<Ç ½èþ..

b÷Éì ¨ÉxɨÉÉä½þxÉ ÊºÉÆ½þ, |ÉvÉÉxɍɯjÉÒ


ªÉÉnù EòÒÊVÉB +zÉÉ EòÉ ºÉÉä±É½þ +MɺiÉ ´ÉɱÉÉ +ÉÆnùÉä±ÉxÉ.. {ÉÚ®äú ºÉÉiÉ ÊnùxÉ +Éè®ú SÉÉè¤ÉÒºÉÉäÆ PÉÆ]äõ ]äõ±ÉÒÊ´ÉVÉxÉ SÉèxɱÉÉäÆ {É®ú JɤɮäúÆ ½þÒ JɤɮäúÆ ÊnùJÉÒÆ.. ´ÉÉä ¦ÉÒ VÉxÉ ºÉ®úÉäEòÉ®úÉäÆ EòÒ Jɤɮú.. Ê®ú{ÉÉä]Çõ®ú ÊnùxÉ-®úÉiÉ ®úɨɱÉÒ±ÉÉ ¨ÉènùÉxÉ ºÉʽþiÉ iɨÉÉ¨É |Énù¶ÉÇxÉ ºlɱÉÉäÆ {É®ú b÷]äõ ®ú½äþ.. +zÉÉ Eäò +ÉÆnùÉä±ÉxÉ EòÒ ´ÉVɽþ ºÉä ºÉÆºÉnù EòÉä VÉxÉiÉÉ EòÒ +É´ÉÉVÉ ºÉÖxÉxÉÒ {Éc÷Ò.. VÉxÉiÉÉ Eäò ºÉɨÉxÉä xÉäiÉÉ+ÉäÆ EòÉ Eònù UôÉä]õÉ ÊnùJÉxÉä ±ÉMÉÉ.. +Éè®ú xÉäiÉÉ+ÉäÆ xÉä =ºÉ VÉxÉÉÆnùÉä±ÉxÉ Eäò ʱÉB ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ EòÉä ÊVɨ¨ÉänùÉ®ú `ö½þ®úɪÉÉ..


]õÒ¨É +zÉÉ Eäò Ê´ÉvÉäªÉEò ¨ÉäÆ ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ +Éè®ú BxÉVÉÒ+Éä ¨ÉäÆ ¡èò±Éä §É¹]õÉSÉÉ®ú EòÒ VÉÉÆSÉ EòÉä CªÉÉäÆ xɽþÒÆ ¶ÉÉÊ¨É±É ÊEòªÉÉ MɪÉÉ..

ºÉ±É¨ÉÉxÉ JÉÖ¶ÉÔnù, EäòÆpùÒªÉ EòÉxÉÚxÉ ¨ÉÆjÉÒ

SÉèxÉ±É +zÉÉ ½þVÉÉ®äú Eäò +ÉÆnùÉä±ÉxÉ EòÒ +ÊiÉ-ʴɺiÉÞiÉ +É´ÉÉVÉ ¤ÉxÉ MÉB ½èþÆ,, +Éè®ú =x½äþÆ ÊxÉªÉÆÊjÉiÉ xɽþÒÆ Eò®úxÉä Eäò ʱÉB ½þ¨É {É®ú nùÉä¹É ¨ÉgøÉ VÉÉ ®ú½þÉ ½èþ..

+ÆÊ¤ÉEòÉ ºÉÉäxÉÒ, EäòÆpùÒªÉ ºÉÚSÉxÉÉ B´ÉÆ |ɺÉÉ®úhÉ ¨ÉÆjÉÒ


ºÉ¤É VÉÉxÉiÉä ½èþÆ ÊEò VÉ¤É ¤ÉSSÉä JÉcä÷ ½þÉäxÉä EòÒ EòÉäÊ¶É¶É Eò®úiÉä ½èþÆ iÉÉä ÊMÉ®úiÉä ¦ÉÒ ½èþÆ.. ¦ÉÉ®úiÉ ¨ÉäÆ ]äõ±ÉÒÊ´ÉVÉxÉ ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ +¦ÉÒ ¦ÉÒ +{ÉxÉÒ ¶ÉÖ¯û+ÉiÉÒ +´ÉºlÉÉ ¨ÉäÆ ½èþ.. <ºÉEäò ¤ÉÉ´ÉVÉÚnù ¤ÉMÉè®ú ÊEòºÉÒ ºÉ®úEòÉ®úÒ ÊxÉªÉÆjÉhÉ Eäò ¦ÉÉ®úiÉÒªÉ ]äõ±ÉÒÊ´ÉVÉxÉ ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ xÉä +Éi¨É ÊxɪɨÉxÉ EòÒ EòÉäÊ¶É¶É EòÒ +Éè®ú JÉÖnù EòÉä VÉxÉiÉÉ Eäò ºÉ®úÉäEòÉ®úÉäÆ ºÉä VÉÉäc÷xÉä EòÉ |ɪÉÉºÉ ÊEòªÉÉ.. ¨ÉMÉ®ú, |ÉäºÉ {ÉÊ®ú¹Énù Eäò +vªÉIÉ VÉκ]õºÉ ¨ÉÉEÈòbä÷ªÉ EòÉ]õVÉÚ +Éi¨É-ÊxɪɨÉxÉ EòÉä EòÉä<Ç ÊxɪɨÉxÉ ½þÒ xɽþÒÆ ¨ÉÉxÉiÉä.. =x½þÉäÆxÉä ]äõ±ÉÒÊ´ÉVÉxÉ ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ {É®ú VÉxÉiÉÉ Ê´É®úÉävÉÒ ½þÉäxÉä EòÉ ¦ÉÒ +É®úÉä{É ±ÉMÉɪÉÉ +Éè®ú <ºÉä |ÉäºÉ {ÉÊ®ú¹Énù Eäò nùɪɮäú ¨ÉäÆ ±ÉɪÉä VÉÉxÉä EòÒ ´ÉEòɱÉiÉ EòÒ..

+Éi¨É-ÊxɪɨÉxÉ EòÉä<Ç ÊxɪɨÉxÉ xɽþÒÆ ½èþ.. ºÉ¨ÉÉSÉÉ®ú ºÉƺlÉÉBÆ ÊxÉVÉÒ ÊxÉEòÉªÉ ½èþÆ.. ÊVÉxÉEòÒ MÉÊiÉÊ´ÉÊvɪÉÉäÆ ºÉä ¤Éc÷Ò ºÉÆJªÉÉ ¨ÉäÆ ±ÉÉäMÉ |ɦÉÉÊ´ÉiÉ ½þÉäiÉä ½èþÆ +Éè®ú =x½äþÆ VÉxÉiÉÉ Eäò |ÉÊiÉ VÉ´ÉɤÉnäù½þ ½þÉäxÉÉ SÉÉʽþB..

VÉκ]õºÉ ¨ÉÉEÈòbä÷ªÉ EòÉ]õVÉÚ, +vªÉIÉ, ¦ÉÉ®úiÉÒªÉ |ÉäºÉ {ÉÊ®ú¹ÉnÂù


nù®ú+ºÉ±É, ¨É½ÆþMÉÉ<Ç, EòɱÉävÉxÉ, §É¹]õÉSÉÉ®ú, PÉÉä]õɱÉÉäÆ Eäò ÊJɱÉÉ¡ò VÉxÉÉÆnùÉä±ÉxÉÉäÆ EòÉä ]äõ±ÉÒÊ´ÉVÉxÉ ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ xÉä ÊVÉºÉ iÉ®ú½þ ºÉä +É¨É +Énù¨ÉÒ ºÉä VÉÉäc÷xÉä EòÒ EòÉäÊ¶É¶É EòÒ.. =ºÉºÉä ¶ÉɺÉEò ´ÉMÉÇ ¨ÉäÆ Pɤɮúɽþ]õ ¤ÉgøÒ ½èþ +Éè®ú JÉÖnù ¨ÉäÆ ºÉÖvÉÉ®ú EòÒ ¤ÉVÉÉªÉ ¶ÉɺÉEò ´ÉMÉÇ ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ EòÉä ½þÒ ÊxÉªÉÆÊjÉiÉ Eò®úxÉä EòÒ EòÉäʶɶÉÉäÆ ¨ÉäÆ VÉÖ]õ MɪÉÉ ½èþ.. <ºÉ ºÉÆnù¦ÉÇ ¨ÉäÆ ºÉÉä¶É±É ¨ÉÒÊb÷ªÉÉ EòÉä ÊxÉªÉÆÊjÉiÉ Eò®úxÉä EòÒ nÚù®úºÉÆSÉÉ®ú ¨ÉÆjÉÒ EòÊ{É±É ÊºÉ¤¤É±É EòÒ Eò´ÉɪÉnù EòÉä +ɺÉÉxÉÒ ºÉä ºÉ¨ÉZÉÉ VÉÉ ºÉEòiÉÉ ½èþ..


iɺ´ÉÒ®äúÆ +Éè®ú nÚùºÉ®úÒ ºÉɨÉOÉÒ, ÊVÉxÉEòÉ ÊVÉGò ʺɤ¤É±É Eò®ú ®ú½äþ ½èþÆ, EÖòUô ºÉ¨ÉÖnùɪÉÉäÆ EòÒ vÉĘ́ÉEò ½þκiɪÉÉäÆ EòÉä +ÊiÉ +É{ÉÊkÉVÉxÉEò °ü{É ¨ÉäÆ ÊnùJÉÉ ®ú½þÒ ½èþÆ..

VÉκ]õºÉ ¨ÉÉEÈòb÷ªÉ EòÉ]õVÉÚ, +vªÉIÉ, ¦ÉÉ®úiÉÒªÉ |ÉäºÉ {ÉÊ®ú¹ÉnÂù


¦ÉÉ®úiÉ ºÉ®úEòÉ®ú xÉä MÉÚMÉ±É ºÉä ÊVÉxÉ 358 ºÉɨÉÉOÉÒ EòÉä ½þ]õÉxÉä Eäò ʱÉB Eò½þÉ ½èþ,, =xɨÉäÆ 255 BäºÉÒ ½èþÆ VÉÉä MÉÚMÉ±É Eäò ¨ÉÖiÉÉʤÉEò ¦Éc÷EòÉ>ð ¤ÉªÉÉxÉ ªÉÉ ¨ÉÉxɽþÉÊxÉ Eäò nùɪɮäú ¨ÉäÆ xɽþÒÆ +ÉiÉÒ ½èþÆ.. BäºÉÒ ºÉɨÉOÉÒ ¨ÉäÆ ÊºÉ¡Çò ºÉ®úEòÉ®ú EòÒ +ɱÉÉäSÉxÉÉ ½èþ.. +ɱÉÉäSÉxÉÉ, Ê´É®úÉävÉ, |Énù¶ÉÇxÉ +Éè®ú ºÉÆMÉ`öxÉ ½þÒ ±ÉÉäEòiÉÆjÉ EòÒ {ɽþSÉÉxÉ ½èþ.. +MÉ®ú

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

अमेरिका में आयोजित धर्म संसद में स्वामी विवेकानंद का भाषण

अनुभवों के रामबाण



यहां हम आपको कुछ ऐसी युक्तियों के बारे में अपनी अनुभव साधा करेंगे जिसका शायद ही कोई बेहतर विकल्प हो--

१। किसी भी वेबसाइट से ऑडियो- वीडियो आदि डाऊन लोड करने के लिए लिए आप डाऊनलोड- हेल्पर का सहारा ले सकते हैं, यह किसी भी साइट से ऑडियो-वीडियो चित्र आदि डाऊन लोड करने में सहायक है। इसके बाद आपको वीडियो आदि डाऊनलोड करने के लिए किसी अन्य वीडियो डाऊनलोडर की जरूरत नहीं रह जाएगी।

२। एड-ब्लॉक प्लस- वेबपेज में मौजूद विग्यापनों को यदि ब्लॉक करना चाहते हैं तो शायद इससे बेहतर विकल्प आपके लिए मौजूद नहीं हो। यह ध्यान भटकाने वाले, इंटरनेट की गति को कम करने वाले, काम में बाधा पहुंचाने वाले विग्यापनों से छुटकारा दिलाता है।

३।