हिंदी शोध संसार

रविवार, 21 अगस्त 2011

जन लोकपाल से संबंधित कुछ अहम दस्तावेज हिंदी और अंग्रेजी में





  • जन लोकपाल प्रथम संस्करण
  • जन लोकपाल, द्वितीय संस्करण






कांग्रेस को अब गैर-राजनीतिक चेहरों का ही सहारा

गैर-राजनीतिक चेहरों के जरिए कांग्रेस अन्ना के आंदोलन से निपटने को तैयार

कांग्रेस के राजनीतिक दिग्गज टीम अन्ना की रणनीति के सामने औंधे मुंह गिरे हैं। कपिल सिब्बल, चिदंबरम, मनीष तिवारी, दिग्विजय सिंह, अंबिका सोनी, अभिषेक मनु सिंघवी, रेणुका चौधरी, राशिद अल्वी जैसे कांग्रेसी दिग्गजों की बोलती बंद है। खबर तो मिल रही है कि कांग्रेस ने अशालीन और अभद्र भाषा बोलने के लिए मशहूर अपने प्रवक्ता मनीष तिवारी को तरीपार कर दिया है। बड़बोले नेताओं को जुबान पर ताला लगाने को कहा गया है। जुबान खोलने पर तोल-तोल के बोलने को कहा गया है। कल तक टीम अन्ना के लिए अभद्र भाषा बोलने वाले कांग्रेसी दिग्गजों को मुंह की खानी पड़ी है। अभी तक टीम अन्ना ने उनकी हरेक चतुराई और चलाकी का मुंहतोड़ जवाब दिया है। आगे क्या होगा कहना जरा मुश्किल है। लेकिन फिलहाल जो परिस्थिति दिख रही है। उसमें टीम अन्ना सरकार पर भारी दिख रही हैं। कांग्रेस के अंदर अन्ना के मुद्दे पर फूट पड़ती दिख रही है। कांग्रेसी नेता ही अन्ना के खिलाफ कार्रवाई गलत ठहरा रहे हैं। उनकी तथाकथित कानून की दलील पर कांग्रेसी नेता ही सवाल उठा रहे हैं।

कांग्रेस ने टीम अन्ना को नीचा दिखाने की कम कोशिश नहीं की, लेकिन उन्हें टीम अन्ना से अब तक मात ही मिली है। इसमें जहां टीम अन्ना की रणनीति का योगदान है तो वहीं, अन्ना के अनशन को बिना शर्त मिल रहे मीडिया सहयोग को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है। पंद्रह अगस्त की शाम की बात है। राजघाट से लौटने के बाद अन्ना हजारे दिल्ली के कंस्टीट्यूशनल क्लब में प्रेसवार्ता कर रहे थे। उस प्रेसवार्ता में मीडियाकर्मियों ने अन्ना की बात-बात पर जो तालियां बजाई उससे कांग्रेस को जबरदस्त खीझ हुई। उससे भी आगे बढ़कर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने अन्ना के अनशन का जो 24*7 लाइव कवरेज किया, वो भी कांग्रेस और सरकार की नजरों में चढ़ गया। मीडियावालों ने सरकार से कुछ ऐसे सवाल किए जिससे सरकार ना सिर्फ असहज हुई बल्कि उससे जवाब देते नहीं बना। कांग्रेस या यूपीए सरकार ने इससे पहले कभी ऐसे सवालों का सामना नहीं किया। उसे ये सोच-सोचकर परेशानी महसूस हुई कि क्या मीडिया उससे इस ढंग के सवाल भी कर सकती है। दरअसल कांग्रेस ने कभी मीडिया से इस तरह के सवालों की उम्मीद नहीं करती है, जिसका जवाब उसके पास नहीं हो।

दो रोज पहले की बात है। केंद्रीय मंत्री अंबिका सोनी ने टीम अन्ना के सदस्य अरविंद केजरीवाल की योग्यता पर सवाल खड़ा करते हुए कहा कि अरविंद केजरीवाल को कौन जानता था। हमारी सरकार ने आरटीआई लाया, इसी के कारण लोग उन्हें जानते हैं। तभी मीडियाकर्मियों ने सवाल दागा, क्या आप ने ही अरविंद केजरीवाल को मैग्सेसे अवार्ड दिलाया। क्या आप ही उन्हें आईआईटी में एडमिशन दिलाया। क्या आप ही के चलते वो आईआरएस बने। जाहिर है कि कांग्रेस कम से कम मीडिया से तो ऐसे सवालों की उम्मीद नहीं करती है। कांग्रेस के युवराज और मीडिया द्वारा बहुप्रचारित भारत के भावी प्रधानमंत्री राहुल गांधी तो अन्ना के मुद्दे पर जुबान खोलने के लिए तैयार नहीं। तेलुगु सुपरस्टार और पीआरपी प्रमुख चिरंजीवी के कांग्रेस में शामिल होने के मौके पर पत्रकारों ने राहुल से बार-बार अन्ना के मुद्दे पर कुछ बोलने के लिए कहा। लेकिन राहुल गांधी ने मीडिया को नजरअंदाज कर दिया। कांग्रेस राहुल गांधी को यूथ आइकॉन के रूप में प्रस्तुत करती है, मगर यूथ आइकॉन यूथ अन्ना के मामलों पर सवालों को टाल जाते हैं। दसअसल राहुल गांधी देश के किसी भी अहम मुद्दे पर किसी भी सवाल का जवाब देने में खुद को सक्षम नहीं पाते हैं।

राजनीति के हर मोर्चे पर हार चुकी कांग्रेस अब अपने गैर राजनीतिक चेहरों को मैदान में उतार रही हैं। ये ऐसे लोग हैं जो कांग्रेस के प्रति अगुग्रहीत रहे हैं। इन चेहरों में कुछ खुद को सामाजिक कार्यकर्ता कहते हैं जो कांग्रेस के अहसानों तले दबे रहे हैं। इन सामाजिक कार्यकर्ताओं और बुद्धिजीवियों ने कांग्रेस को सत्ता में बनाए रखने के लिए एक समिति बनाई जिसे राष्ट्रीय सलाहकार परिषद नाम दिया गया। इस बहुप्रचारित परिषद के अध्यक्ष स्वयं यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी हैं।

अन्ना के अनशन से कांग्रेस में हाहाकार मचा हुआ है। कांग्रेसी दिग्गज हाथ जला चुके हैं। ऐसे में कांग्रेस ने अब इन अहसानमंद गैर-राजनीतिक चेहरों को मैदान में उतार दी है। इन लोगों की एक गुट ने अरुणा रॉय की अगुवाई में शनिवार को लोकपाल बिल का एक नया ड्राफ्ट पेश कर दिया और इस ड्राफ्ट को संसद की स्थायी समिति में पेश करने की बात कही जा रही है। आपको एकबार फिर याद दिला दें कि अरुणा राय यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की अध्यक्षता वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की एक सदस्य हैं, इस परिषद में हर्षमंदर भी हैं। हर्षमंदर मजबूत लोकपाल के पक्ष में तो हैं लेकिन वो अन्ना के तरीकों से सहमत नहीं हैं। सिर्फ हर्षमंदर ही नहीं अरुणा रॉय भी अन्ना के अनशन से सहमत नहीं है। अरुणा रॉय को जनलोकपाल से भी शिकायत है। और उन्होंने लोकपाल का अपना मसौदा पेश किया है। इस मसौदे में एक दो नहीं बल्कि पांच-पांच स्तरों लोकपाल बनाने की बात कही गई है।

सरकार के इशारों पर नाचने वाली सीबीआई और सीवीसी को लोकपाल से अलग रखने की बात कही गई है। अरुणा रॉय ने ऐसे समय में लोकपाल का अपना मसौदा पेश किया जब अन्ना हजारे पांच दिनों से अनशन पर हैं। अरुणा रॉय लगातार राष्ट्रीय सलाहकार परिषद में बनी हुई हैं। उन्होंने इससे पहले कभी ऐसा बिल पेश नहीं किया। इससे पहले भी अन्ना ने अनशन किया था। अन्ना के अनशन के बाद सरकार ने एक संयुक्त प्रारूपण समिति भी बनाई थी। जिसमें टीम अन्ना और सरकार की ओर से पांच पांच सदस्य थे। उस समय भी अरुणा रॉय की टीम की ओर से कोई सलाह या सुझाव नहीं आया। जबकि वो सलाहकार परिषद में बनी हुई थी। लेकिन अब जब अन्ना हजारे छह दिनों से अनशन पर हैं और पूरा देश सड़कों पर उतर चुका.. ऐसे में अरुणा रॉय के इस मसौदे को क्या कहा जाय। ये सुझाव या सलाह नहीं बल्कि पूरा का पूरा मसौदा है। साफ है कि ये अन्ना के आंदोलन की हवा निकालने की सरकारी कोशिश है और कांग्रेस ने अपने गैर-राजनीतिक चेहरों को सामने लाकर अन्ना के आंदोलन की हवा निकालने की कोशिश की है।

ऐसा नहीं है कि अरुणा रॉय पर ही बात समाप्त हो जाएगी। कांग्रेस के और कई गैर-राजनीतिक चेहरे सामने आएंगे। इन लोगों का अपना-अपना मसौदा होगा और इस मसौदे के जरिए वो अन्ना के आंदोलन को अप्रभावी बनाने की कोशिश करेंगे। टीम अन्ना को इसके लिए भी तैयार रहना होगा। ऐसे में जन लोकपाल का भविष्य आम जनता के समर्थन पर निर्भर करेगा।

हालांकि अन्ना पहले ही साफ कर चुके हैं कि उनकी लड़ाई किसी पार्टी के खिलाफ नहीं है बल्कि ये लड़ाई व्यवस्था के खिलाफ है। टीम अन्ना ने भाजपा की भी आलोचना की है क्योंकि भाजपा ने जो रवैया अख्तियार कर रखा है वो ना सिर्फ आश्चर्यजनक है बल्कि वो खुद भाजपा के लिए भी घातक है। अगर भाजपा अपना रुख साफ नहीं करती है तो उस पर भी भ्रष्टाचारियों को संरक्षण देने का आरोप लगेगा और चुनाव के समय पब्लिक भाजपा नेताओं का स्वागत अंडे और टमाटरों से करेगी। फिलहाल भाजपा बीज बोने के लिए तैयार नहीं है, मगर उसकी नजर फसल पर लगी हुई है।

इधर, कांग्रेस राजनीतिक रूप से असहाय तो हो ही चुकी है। गैर-राजनीतिक रूप से भी वो सीधे-सीधे सामने नहीं आ रही है। यहां भी उसका कुटिल और चालाक स्वभाव उसे ऐसा करने से रोक रही है। साफ है कि वो वो हर जंग को अपनी कुटिलता व चालाकीपन से जीतना चाहती है। लोकतांत्रिक मूल्यों की धज्जियां उड़ाने के लिए वह बात-बात में कानून, संविधान, प्रक्रिया, लोकतंत्र आदि की दुहाई देती है। मगर, अन्ना और उनकी टीम की सादगी, सरलता, बेबाकीपन और पारदर्शिता के आगे उसका हर दांव फीका पड़ता जा रहा है। और आगे भी ऐसा ही होगा। इसमें कोई संदेह नहीं।


गुरुवार, 18 अगस्त 2011

तिहाड़ जेल से अन्ना हजारे का वीडियो संदेश, दो भागों में






अन्ना हजारे की सहयोगी किरण बेदी ने अन्ना से ये बातचीत है।

अरविंद केजरीवाल ने कहा


आखिर जन भावनाओं के आगे सरकार को बिना-शर्त झुकनी पड़ी। दिल्ली पुलिस ने अन्ना हजारे को दो सितंबर तक रामलीला मैदान में अनशन करने की अनुमति दे दी।
इसकी जानकारी देते हुए अन्ना के सहयोगी अरविंद कजरीवाल ने कहा कि अभी तो युद्ध क्षेत्र में प्रवेश ही मिला है, अभी तो पूरी लड़ाई लड़नी बाकी है।
  • सोलह अगस्त की सुबह पुलिस ने आठ लोगों को गिरफ्तार किया। उनपर आरोप लगाए कि इनके बाहर रहने से कानून व्यवस्था की स्थिति खराब होती है।
  • इन्होंने लोगों को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया। पुलिस ने मजिस्ट्रेट से सात दिनों की हिरासत मांगी। जिसे स्वीकार कर लिया गया।
  • आगे पुलिस ने शर्त रखी कि अगर ये लोग बाहर निकलकर जेपी पार्क नहीं जाएंगे इन्हें छोड़ दिया जाएगा।
  • इन्होंने कहा कि वो निकलते ही जेपी पार्क जाएंगे।
  • फिर क्या इन्हें तिहाड़ जेल पहुंचा दिया गया।
  • दो घंटे बाद ही, पुलिस ने इन्हें कहा आप लोग रिहा किए जाते हैं।
  • अरविंद केजरीवाल ने पूछा कि दो घंटे पहले हम कानून-व्यवस्था की स्थिति के लिए खराब थे और दो घंटे बाद ही हम अच्छे कैसे हो गए।
  • केजरीवाल ने पूछा- आखिर इस देश में कौन का लोकतंत्र या प्रजातंत्र है जिसमें सरकार की जब मर्जी होती है लोगों को जेल के अंदर डाल दिया जाता है और जब मर्जी होती है उन्हें जेल से बाहर कर दिया जाता है।
  • आखिर क्या इस देश का आम आदमी मात्र खिलौना है जिससे सरकारें जब चाहे खेलती रहती है।
  • इस सवाल पर व्यापक विचार विमर्श की जरूरत है।

सोमवार, 15 अगस्त 2011

Fight against neo-colonial rule part-2


IN nineties, Dr Manmohan Singh, then Finance Minister and currently Prime Minister of India, came with an imported theory of economic development, named Globalization, liberalization and reforms. Dr. Manmohan Singh, Montek Singh Ahluwalia have been the Indian face of world bank and International Monetary Fund. Western nations want to capture the vast indian market and its resources. So, they used these faces and imposed their economic policies in India through these Indian faces. Overnight, Licence and permission Raj came to end. The fate of indian economy handed over to corporates and markets, and the markets were opened to the western nations. It had been claimed that only the open economy can eradicate the poverty and bring prosperity to India. After, two decades of the open economic policy, the illusion has broken and the much hyped claim came to trivia. The economy get centralized. The governments became the tool to collect taxes and to go on foreign tour. Subsidies have been terminated. They think for corporates and their interests. They think fro four paise loss of companies but they do not think about the suicide of the farmers.
To be continues--

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

Fight against neo-colonial rule


This essay has been written for my English blog parindian-the soul of the nation
.
Anna Hazare is nothing, but symbol of true indigenous nationalistic character of Indian soul. This soul is nearer to the dream of father of the nation Mahatma Gandhi. Mahatma Gandhi had a dream of self-dependent, decentralised, rural economy based India. At the beginning of the independent India a little had been done to realize the dream of the great soul, but colonial thinking of the rulers of India, left the Gandhian theory and model of development. They failed to understand the basic structure and culture of Indian society. They adopted the imported theories of development for India, those were irrelevant and against to the fabric of indian society.
The imported and fabricated thinking of communists began to inject into the nerves of Indian masses. They projected Dharma(literally, religion) and morality as Afeem(opium) for the development. They propagated that there should not be religion in public life, what is the soul of the Indian society for the hundreds of centuries. They observed that religion(dharma) and politics can not and should not go together, so there should not be public demonstration of religion. Our neo-colonial rulers also supported these theories and adopted in the syllabuses of schools. They propagated that Aryan were outsiders and India had nothing on which Indian could have pride. They had literally no contribution to the world in the field of Science, Technology, Medical Science, Philosophy, Art and even Culture.
In nineties, Dr. Manmohan Singh came with......

TO BE CONTINUED..

गुरुवार, 11 अगस्त 2011

धत तेरे की। आप तो समझने के लिए तैयार ही नहीं हैं


सच में, आज मुझे बेहद अफसोस हो रहा है। मैं अपने छोटे की बात नहीं समझ पा रहा हूं। छोटा है। बहुत लिहाज करता है। मुझसे बोलता भी कम है। यूं कहें कि मुंह नहीं लगाता है। टभर-टभर नहीं करता है। एक लाइन में ही सही, मगर, आज वह अपने मन की बात निकाल ही गया।
क्या चाहते हैं आप, वो नैतिकता के नाम पर इस्तीफा दे दें।
बहुत ही खीझ थी उसके मन में। वह मेरी बात भी नहीं सुना। आगे बढ़ गया। उसकी बातों पर मन ही मन जिरह करता रहा।
आखिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह क्यों इस्तीफा दें। आखिर उनकी गलती क्या है। भ्रष्टाचार किया तो उनके मंत्रियों ने। उसके लिए वो क्यों जिम्मेदार हों। आखिर उनकी ईमानदार छवि को इससे क्या नुकसान पहुंचता है।
छोटे की बातों में दम था। लेकिन मैं अपने मन को नहीं समझा पा रहा था कि आखिर इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी मनमोहन सिंह ईमानदार कैसे बने हुए हैं और कैसे उनकी छवि अब भी साफ सुथरी बची हुई है।
अगर किसी व्यक्ति के सामने कोई अपराध होता है या कोई आपराधिक घटना होती है तो उससे अपेक्षा की जाती है कि वो पुलिस में उसकी रिपोर्ट दर्ज कराएगा। वो कोर्ट में इसकी गवाही देगा। मगर, अगर वो व्यक्ति उस अपराधी को बचाने की कोशिश करता है तो उसे क्या कहा जायेगा। उसे अपराधी कहा जाए या नहीं, मगर कम से कम उसे ईमानदार तो नहीं कहा जाएगा। कम से कम इस घटना के बाद उसकी छवि साफ सुथरी तो नहीं कही जाएगी।
जहां तक मुझे याद है टू-जी घोटाले पर कैग की रिपोर्ट आने के बाद प्रधानमंत्री कैग को उसका काम समझा रहे थे। मौका था कैग की १५० वर्षगांठ का। मनमोहन सिंह उस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कह रहे थे कि कैग को गलती और जानबूझकर की गई गलती, वास्तविक गलती और परिकल्पना में अंतर को समझना चाहिए। कैग अपना काम ईमानदारी से कर रहा था मगर प्रधानमंत्री उसे वास्तविक गलती और परिकल्पना में अंतर समझाने में व्यस्त थे। अगर वो इस व्यस्तता को छोड़कर दोषियों के खिलाफ कार्रवाई करते तो उनकी छवि ईमानदार समझी जाती और यही काम करने के लिए सुप्रीमकोर्ट को मोर्चा नहीं संभालना पड़ा।
सरकारें अक्सर कोर्ट की अतिसक्रियता पर सवाल उठाती रही हैं मगर, कोर्ट को ऐसा होने के लिए मजबूत कौन करता है।
अगर कमजोर व्यक्ति अपराध को देखकर, उससे डरकर भाग जाता है, पुलिस में रिपोर्ट दर्ज नहीं कराता है, कोर्ट में गवाही नहीं देना चाहता है तो उसकी मजबूरी समझ में आती है मगर, देश का सबसे ताकतवर व्यक्ति अगर ऐसा करता है तो क्या वो ईमानदार या साफ सुथरी छवि का कहलाने लायक है?
अगर ये ताकतवर व्यक्ति उस अपराधी को बचाने की कोशिश में जुट जाए तो उसे क्या कहा जाएगा। क्या छोटे बाबू आप तब भी उसे ईमानदार ही कहेंगे।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने तो ऐसा ही किया।
जब कैग कि रिपोर्ट आई तो विपक्ष की ओर से हमले झेल रही सरकार ने अपने महारथी, कपिल सिब्बल को मोर्चे पर उतार दिया। सिब्बल ने अपनी वकालत पेशा की बाजीगरी का इस्तेमाल करते हुए जीरो लॉस की थ्योरी गढ़ डाली। यानी टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन से सरकार को कोई नुकसान नहीं हुआ।
जब नुकसान ही नहीं हुआ तो राजा, कनिमोझी, बेहुरा सहित दर्जन भर लोग जेल में क्यों हैं। क्यों कलानिधि मारन को इस्तीफा देना पड़ा।
छोटे बाबू क्या आप बताएंगे कि जीरो लॉस की थ्योरी गढ़ने वाले कपिल सिब्बल के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई। जहां तक हमें पता है कार्रवाई नहीं, उन्हें दो-दो मंत्रालय पर बरकरार रख कर पुरस्कृत किया गया। क्या सच पर परदा डालने वालों को पुरस्कृत करना ही मनमोहन सिंह की ईमानदारी है.
सिब्बल की बात छोड़िये। खुद प्रधानमंत्री ने कहा कि टूजी स्पेक्ट्रम आवंटन से सरकार को कोई नुकसान नहीं हुआ। उन्होंने इस घोटाले से हुए नुकसान की तुलना गरीबों को दी जाने वाली सब्सिडी से कर दी। क्या लूट सब्सिडी के बराबर है। क्या सब्सिडी देने के लिए किसी सरकार को जेल जाते सुना है। क्या कोर्ट ने सब्सिडी देने के लिए सरकार के किसी मंत्री को जेल भेजा है। क्या ईमानदारी की यही परिभाषा है।
हाल ही में प्रिंट मीडिया के पत्रकारों से बातचीत में प्रधानमंत्री ने कहा कि राष्ट्रमंडल खेल घोटाले पर तत्कालीन खेल मंत्री मणिशंकर अय्यर का विरोध आडियॉलॉजिकल यानी सैद्धांतिक था। लेकिन प्रधानमंत्री को मणिशंकर अय्यर का लिखा हुआ पत्र जो मीडिया में आया है, उससे अनुसार मणिशंकर अय्यर का विरोध सैद्धांतिक नहीं बल्कि तथ्यात्मक था। बताया गया था कि राष्ट्रमंडल खेल आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाडी ने किस प्रकार खुली लूट मचा रखी थी। इससे बावजूद प्रधानमंत्री ने कोई कार्रवाई करने के बजाय उससे छुपाने का काम किया।
कैग की ताजा रिपोर्ट के मुताबिक, तत्कालीन खेल मंत्री सुनील दत्त के विरोध के बावजूद प्रधानमंत्री कार्यालय की सिफारिश के आधार पर सुरेश कलमाडी की नियुक्ति हुई। इतना ही नहीं, खेल सचिव अरोड़ा ने भी प्रधानमंत्री कार्यालय को पत्र लिखा था लेकिन कार्रवाई तो दूर कलमाडी की नियुक्ति कर दी गई।
छोटे, भले ही तुझे मेरी बातों पर गुस्सा आता हो, लेकिन, लेकिन मैंने तुम्हारे सामने जो तथ्य रखे हैं क्या इससे तुम्हारी सोच पर कोई असर पड़ा है। क्या अब भी तुम मुझे समझने की कोशिश करोगे या नहीं। मेरे भाई प्रधानमंत्री पद की अपनी गरिमा होती है। क्या इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी मनमोहन सिंह के लिए इस पद पर बने रहना उचित है। क्या अब भी उनकी ईमानदारी और साफ सुथरी छवि अक्षुण्ण बनी हुई है।
झुंझलाना मत। ठंडे दिमाग से सोचना।

जाते-जाते- अण्णा हजारे को सोलह अगस्त से अनशन करना पड़ रहा है। आखिर सरकार ईमानदार बनना क्यों नहीं चाहती है। आखिर उसे एक मजबूत और कारगर लोकपाल लाने में आपत्ति क्यों है। आखिर वो भ्रष्टाचार की संस्कृति को क्यों बनाए रखना चाहती है। आखिर वो कालाधन वापस देश क्यों नहीं लाना चाहती है। एक ईमानदार व्यक्ति इस पर चुप क्यों है।


वाकई सवाल गंभीर है मगर जवाब देगा कौन

इस लिंक को देखें
http://www.facebook.com/video/video.php?v=1714109831035

पता चल जाएगा कि सवाल कितना गंभीर है मगर इसका जवाब कौन देगा।

बुधवार, 10 अगस्त 2011

सुवचन- संस्कृत साहित्य का अनमोल खजाना


वरम एकौ गुणी पुत्रौ न तु मुर्खा शतान्यपि

एकश्चंद्र: तमो हन्ति न तु तारा सहस्त्रश:

भावार्थ- एक ही गुणी पुत्र अच्छा है न कि सैंकड़ों मुर्ख। क्योंकि एक ही चंद्र संसार के अंधकार को हर लेते हैं जबकि हजारों तारे मिलकर ऐसा नहीं कर पाते हैं.

मनस्येकं वचस्येकं कर्मण्येकं महात्मनाम्।
मनस्यन्यत् वचस्यन्यत् कर्मण्यन्यत् दुरात्मनाम्

भावार्थ- महान व्यक्तियों के मनमे जो विचार होता है वही वे बोलते है और वही कॄति में भी लाते हैं उसके विपरीत नीच लोगों के मनमे एक होता है वो बोलते उससे हैं और करते उससे भी अलग है. यानी महात्माओं का मन, वचन और कर्म एक होता है जबकि दुरात्माओं का मन, वचन और कर्म अलग अलग होता है।

शोको नाशयते धैर्य, शोको नाशयते श्रॄतम्।
शोको नाशयते सर्वं, नास्ति शोकसमो रिपु:।।
भावार्थ- शोक धैर्य को नष्ट करता है, शोक ज्ञान को नष्ट करता है, शोक सर्वस्व का नाश करता है. इसलिए शोक जैसा कोई शत्रु इस संसार में नहीं है |

आर्ता देवान् नमस्यन्ति, तप: कुर्वन्ति रोगिण:।
निर्धना: दानम् इच्छन्ति, वॄद्धा नारी पतिव्रता।।
भावार्थ- संकट में लोग भगवान की प्रार्थना करते हैं, रोगी व्यक्ति तप करने की चेष्टा करता है। निर्धन को दान करने की इच्छा होती है तथा वॄद्ध स्त्री पतिव्रता होती है। यानी कुछ लोग केवल परिस्थिति के कारण अच्छे गुण धारण करने का नाटक करते हैं।

सम्पतं च विपत्तम च महतमां एकरूपता

उदये सविता रक्ता रक्ताश्च मये यथा।

भावार्थ- महान लोग दुख और सुख में एक जैसे होते हैं जैसे सूर्य उदय और अस्त दोनों ही समय एक जैसा होता है।

उपाध्यात् दश आचार्य: आचार्याणां शतं पिता।
सहस्रं तु पितॄन् माता गौरवेण अतिरिच्यते।
भावार्थ- आचार्य उपाध्याय से दस गुना श्रेष्ठ होते हैं। पिता सौ आचार्यों के समान होते हैं। और माता पिता से हजार गुना श्रेष्ठ होती हैं।

दूरस्था: पर्वता: रम्या: वेश्या: च मुखमण्डने।
युध्यस्य तु कथा रम्या त्रीणि रम्याणि दूरत:।।
भावार्थ- पहाड़ दूर से बहुत अच्छे दिखते हैं। मुख विभूषित करने के बाद वैश्या भी अच्छी दिखती है। युद्ध की कहानियां सुनने को बहुत अच्छी लगती है। लेकिन ये तीनों ही चीजें दूर में ही अच्छी होती हैं।



शनिवार, 6 अगस्त 2011

स्क्राइबस- एक बिल्कुल मुफ्त और उत्तम डेस्कटॉप पब्लिशिंग सॉफ्टवेयर



स्क्राइबस एक मुफ्त डेस्कॉप पब्लिशिंग सॉफ्टवेयर है। जिसके माध्यम से आप प्रिंट के लिए तैयार साम्रगी तैयार कर सकते हैं। आप मैगजिन का ले-लाउट तैयार करना चाहते हैं या न्यूजलेटर। सबके लिए ये एक उत्तम सॉफ्टवेयर है।
इसे यहां से डाऊनलोड किया जा सकता है।

इसका इस्तेमाल सीखने के लिए तीन वीडियो मुहैया कराए गए हैं जिसे आप डाउनलोड करके इसके माध्यम से इस सॉफ्टवेयर का प्रयोग सीख सकते हैं-
वीडियो डाऊनलोड करना बिल्कुल आसान है ज्यादा जानकारी के लिए यहां जाएं।
अब एक झलकी। मैंने इस वीडियो को देखकर स्क्राइबस से एक पेज तैयार किया है- बताइये कैसा लगा।






कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना

श्रद्धा-अश्रद्धा मन का रक्तबीज है।
बुद्धि मन की ही चंडी है।
बुद्धि अश्रद्धा का भी संहार करती है।
श्रद्धा का भी संहार कर सकती है।
अबुद्धि शरणागत का स्रोत है।
अबुद्धि खड़ा नहीं कर सकती है प्रश्नचिह्न।
मीमांसा की ओर जाने की बात ही छोड़िए।
ये कविता नहीं।
कविता तो अक्षुण्ण होती है
ये तो भीड़ है।
अव्यक्त भीड़।
उन कवियों की भीड़
जिनके मन में विचार ही विचार हैं।
नहीं हैं तो शब्द।
नहीं है तो अलंकार
नहीं है तो पिंगल।
आखिर कैसे बनेगी कविता
कविता खेतों की ककड़ी नहीं
शरणागत ने अबुद्धि पैदा कर दी है।
हर ओर, चारों ओर।
जो अबुद्धि का दास नहीं।
उसकी कोई दशा नहीं।
निजता का सम्मान
हम करते हैं।
मगर, मेरी निजता का
सम्मान कौन करेगा।
क्योंकि मैंने अबुद्धि की दासता स्वीकार नहीं की।
नहीं हुआ शरणागत।
तो देख रहे हो मेरी दशा।
व्यवस्था और तंत्र का नाम खड़ी इमारत
मेरे ऊपर गिर गई
नष्ट कर देना चाहती है मुझे।

सर्वे भवन्तु सुखिन: सर्वे सन्तु निरामया। सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मां कश्चित दुख भाग भवेत।
सभी सुखी हों, सभी निरोग हो। सभी अच्छे दिखें। किसी को कोई दुख न हो। परवरदिगार। परमपिता परमेश्वर ये यही कामना रहती है। लेकिन इस कामना के बावजूद लोग दुखी हैं। निराश हैंपीड़ित हैं। कई दुखी और निराश लोग आत्महत्या कर लेते हैं। मगर, कई पीड़ित लोग चुपके से ईलाज के लिए विदेश चले जाते हैं। अक्सर ये लोग बड़े होते हैं। मगर, सवाल तब उठता है। जब कोई सबसे बड़ा व्यक्ति(?) अपने ईलाज के लिए विदेश चला जाता है. वो चुपके-चुपके। किसी को पता भी नहीं चलता है कि वो किस हाल में है। उसे क्या हुआ है। वो ईलाज के लिए कहां जा रहा है। क्या देश में उसका इलाज नहीं हो सकता है। नहीं तो क्यों नहीं हो सकता है। क्या दे
श में कुशल डॉक्टरों की कमी है। क्या देश में अच्छे अस्पताल नहीं हैं(ये तो सब जानते हैं, मगर सवाल उन लोगों से है जो भारत को महाशक्ति या विश्वशक्ति समझते हैं। गर्व तीस इंच का सीना छत्तीस का हो जाता है) नहीं है तो क्यों नहीं है। है तो एक दो ही क्यों है।

बगल का चित्र- देश के प्रसिद्ध स्वास्थ्य संस्थान एम्स का है।

साठ साल पहले भी हम ऐसे थे। आज भी हम ऐसे हीं है। आखिर देश में सुविधाएं क्यों उपलब्ध होंगी। क्योंकि देश के चुनिंदा लोगों, मंत्रियों, संतरियों, नेताओं के लिए स्वास्थ्य की तमाम सुविधाएं विदेशों में हैं। उनकी शिक्षा-दीक्षा की तमाम व्यवस्था विदेशों में हैं। वो अंग्रेजी में गिटिर-पिटिर करते हैं और देश का शासक बन जाते हैं. ऐसे शासक हमारे लिए सुविधाएं क्यों मुहैया कराएंगे। क्यों अच्छे स्कूल बनने देंगे। उनके बच्चे भी पढ़ सकेंगे। क्यों ऐसे अस्पताल बनने देंगे। जहां उनका इलाज भी हो सकेगा। जब इनका कपड़ा भी विदेशों से धुलकर आता है तो बाकी चीजों पर माथापच्ची करना बेकार है।


मंगलवार, 2 अगस्त 2011

संतकवि रसखान की अनुपम कृति

  • मानुष हौं तो वही रसखानि, बसौं बृज गोकुल गांव के ग्वारन।
  • जो पशु हौं, तो कहां बस मेरो, चरौं नित नंद की धेनु मझारन।।
  • पाहन हौं, तो वही गिरि को, जो धरयों कर छत्र पुरंदर धारण।
  • ज्यौ खग हौं, तो बसेरो करौं मिली कालिंदीकूल कदम्ब की डारन।

  • या लकुरि अरु कामरिया पर, राज तिरु पुर को तजि डारौं।
  • आठों सिद्धि नवों निधि को सुख, नंद की धेनु चराई बिसारौं।।
  • इन आंखन सौं कबौं रसखानि, बृद के वन-बाग तड़ाग निहारौं।
  • कोटिक हौं कलधौत के धाम, करील के कुंजन ऊपर वारौं।।

  • मोर-पंखा सिर ऊपर राखिहौं, गुंज की माल गरे पहिरौंगी।
  • ओढ़ि पितंबर ले लकुटी, बन गोधन ग्वारिन संग फिरौंगी।।
  • भाव तो वोहि मेरी रसखानि, सो तेरे कहे सब स्वांग भरौंगी।
  • या मुरली मुरलीधर की, अधरान धरि अधरा ना धरौंगी।।

  • शेष महेश गणेश दिनेश, सुरेशहूं जाहि निरंतर गावै
  • जाहि अनादि अनंत अखंड, अछेद अभेद सुदेव बतावै।।
  • नारद से सुक व्यास रटै, पचि हारे तौ पुनि पार ना पावै।
  • ताहि अहीर की छोहरिया, छछिया भर छाछ पे नाच नचावै।।

  • धूरि भरे अति शोभित श्याम जू, जैसी बनी सिर सुंदर चोटी।
  • खेलत खात फिरै अंगना, पग पैरी बाजती पीरी कछौटी।।
  • जा छवि को रसखान विलोकत, बारत काम कलानिधि कोटी।
  • काग के भाग कहा कहिए, हरि हाथ सों ले गयो माखन रोटी।ष

  • बैन वही उनको गुन गाई, औ कान वही उन बैन सो सानी।
  • हाथ वही उन गात सरै, औ पाइ वही जो वही अनुजानी।।
  • आन वही उन आन के संग, और मान वही जु करै मनमानी।
  • त्यों रसखानि वही रसखानि, जो है रसखानि सो है रसखानि।।

  • शंकर के सुर जाहि जपै, चतुरानन ध्यावै धर्म बढ़ावै।
  • नैक हिये जिहिं आनत ही, जड़ मूढ़ महा रसखानि कहावै।।
  • जा पर देव अदेव भू अंगना, वारत प्राणन प्राणन पावै।
  • ताहि अहीर की छोहरिया, छछिया भर छाछ पे नाच नचावै।।

अंधे के हाथ में बटेर लग जाए तो वो खुद को शिकारी समझने लगता है

ऐसे ही शिकारी संसद, लोकतंत्र, संविधान की आड़ जनमत को ठेंगा दिखाने से बाज नहीं आते हैं। बीस से पच्चीस प्रतिशत लोगों का वोट हासिल कर खुद का जनता का प्रतिनिधि समझने लगते हैं और जनता के सच्चे प्रतिनिधियों की खिल्ली उड़ाते हैं। उनको तदवीर से तकदीर बनाने की सीख देते हैं। उनको चुनाव लड़ने के लिए कहते हैं। घोटाले पर घोटाले करते हैं और बेशर्मों की तरह संविधान, लोकतंत्र, प्रजातंत्र के पहरेदार होने का दंभ भरते हैं। ऐसे दंभी पाखंडियों से कौन पूछे कि जब इनका पेशा वकालतगिरी है तो ये राजनीति को क्यों गंदा करने चले आते हैं। क्यों राजनीति को वकालत की तराजू पर तौलते हैं। सच को झूठ, झूठ को सच बनाते हैं। कभी जीरो लॉस का सिद्धांत लाते हैं तो कभी खुद और अपने जैसे लोगों को बेदाग साबित कर जाते हैं। जो लोग बीस से पच्चीस प्रतिशत लोगों को वोट हासिल कर चुनाव जीतते हैं वैसे ही लोग दूसरों को सौ प्रतिशत वोट हासिल करने के लिए कहते हैं।

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  • अगर प्रिय से अंत होने वाले शब्द खोजने हो तो --साथ समाप्त होता है क्लिक करें और डिक्शनरी इन शब्दों को खोजेगा- अक्षप्रिय, अरुणप्रिय, प्राणप्रिय आदि
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है न कमाल की डिक्शनरी।
  • साहित्य संदर्भ- यह डिक्शनरी शब्द के साहित्यिक संदर्भों का भी उल्लेख करता है। मसलन, अमूक शब्द का किस साहित्यकार की रचना में प्रयोग हुआ है और किस तरह।
  • पारिभाषिक शब्दकोश- यह एक पारिभाषिक शब्दकोश है जो शब्द को पारिभाषित कर अर्थ बताने की चेष्टा करता है। दुनिया की सभी समृद्ध डिक्शनरी पारिभाषिक शब्द व्याख्या ही पेश करती है। दुर्भाग्य से हमारे यहां शब्दों के पर्याय बताने का प्रचलन चल पड़ा और शब्दकोश इसी शैली में लिखे जाने लगे।
फिलहाल इतना ही, प्रयास के बारे में जरूर बताये। आगे भी कोई नई चीज मिलेगी तो जरूर लाऊंगा।