हिंदी शोध संसार

रविवार, 28 फ़रवरी 2010

इस तरह मेरे औकात का पता चल गया

एक मित्र का फोन आया. उसने पूछा, यार कहां हो. मैंने जवाब दिया, घर पर हूं, कहो, क्या बात है.
उसने कहा, नानाजी देशमुख के बारे में थोड़ा विस्तार से बता सकते हो.
मैंने पूछा, कौन नानाजी देशमुख?
उसने कहा, नहीं जानते हो तो जल्दी पता करो, मुझे सिर्फ इतना पता है कि वे एक सांसद और समाजसेवी थे.
मैंने कहा, पता करना पड़ेगा, आधे घंटे बाद फोन करो तो कुछ बता सकूंगा.
उसने कहा, ठीक आधे घंटे में फोन करता हूं.
और फोन कट गया.
मैंने नेट कनेक्ट किया और नानाजी के बारे में खोज शुरू कर दिया. हिंदी विकिपीडिया पर नानाजी देशमुख सर्च मारा. पांच सात पंक्तियों में उनके बारे में जानकारी दी(उतनी ही, जितनी मेरे दोस्त ने दी थी) जो नाकाफी थे. मजबूर होकर अंग्रेजी विकिपीडिया की शरण में गया, वहां उतनी जानकारी थी, जितनी की हमें तत्काल जरूरी थी.
मैंने पूरी शिद्दत से जल्दबादी में ही सही, पूरा लेख पढ़ डाला. आधे घंटे के अंदर मेरे दोस्त का फोन आया और मैंने उसे संक्षेप में बताकर उससे धन्यवाद पाया.
अपने दोस्त का धन्यवाद पाकर भी मैं खुश नहीं था, बहुत शर्मिंदगी महसूस कर रहा था. मेरे उस दोस्त ने अंजाने में ही मुझे मेरी औकात बता दी. दरअसल मैं उस महापुरूष के बारे में नहीं जानता था, जिसके बारे में जानना चाहिए था. एक महापुरूष जिसने स्वतंत्र भारत में भारत को स्वतंत्रता का पाठ पढ़ाया, जिसने अपने सिद्धांतो पर जिया. जब राजनीति के शिखर पर थे, तब उन्होंने राजनीति छोड़ दी. वो सिर्फ इसलिए कि उसे समाज के सबसे निचले और शोषित तबके से संवाद स्थापित करना था. उसके जीवन में रोशनी लानी थी. पृष्ठभूमि से अगर वे आरएसएस के नहीं होते तो वे मीडिया में चर्चा पाते और मुझ जैसा अदना व्यक्ति भी उन्हें जानता. पर ऐसा नहीं हुआ.
अभी एक रोज पहले ही मेरे कुछ साथ चर्चा कर रहे थे कि भारत में ऐसा एक भी व्यक्ति नहीं बचा जो निस्वार्थ भाव से मानवता की सेवा करता हो. मैं यह मानने के लिए तैयार नहीं हुआ. मेरा मानना था कि ये अलग बात है कि हम उनके बारे में नहीं जानते हैं क्योंकि कलाम के अनुसार, हमारी मीडिया निगेटिव ऑब्सेस्ड है. उसे पॉजिटिव खबरों से कोई लेना देना नहीं रहता है. अगर किसी पॉजिटिव खबर की आस रहती है तो वो ईसाई मिशनरियों के पॉप और फादर की पॉजिटिव स्टोरी छपती है कि कैसे उसने फलां भाग का कायाकल्प कर दिया. अगर व्यक्ति आरएसएस से जुड़ा तो उसे अछूत करार दिया जाता है. खैर अभी मीडिया की भूमिका के बारे में ज्यादा चर्चा करना नहीं है.
मैं दिनभर नानाजी पर अंग्रेजी विकिपीडिया से लेख का अनुवाद करता रहा. शाम तक मैंने हिंदी विकिपीडिया के लिए नानाजी  देशमुख के लिए लेख पूरा कर लिया.
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नानाजी देशमुख

नानाजी देशमुख (जन्म- ११ अक्तूबर, सन् १९११- निधन- 27 फरवरी, 2010) भारत के एक प्रसिद्ध समाजसेवी थे। वे पूर्व में भारतीय जनसंघ के नेता थे। वे भारत के ऊपरी सदन राज्यसभा के सदस्य भी थे।

आरम्भिक जीवन

नानाजी का जन्म महाराष्ट्र के परभनी जिले के कदोली नामक छोटे से कस्बे में ग्यारह अक्टूबर १९११ में हुआ था। नानाजी का लंबा और घटनापूर्ण जीवन अभाव और संघर्षों में बीता. उन्होंने छोटी उम्र में ही अपने माता-पिता को खो दिया. मामा ने उनका लालन-पालन किया. बचपन अभावों में बीता। उनके पास शुल्क देने और पुस्तकें खरीदने के लिये पैसे नहीं थे किन्तु उनके अन्दर शिक्षा और ज्ञानप्राप्ति की उत्कट अभिलाषा थी। अत: इस कार्य के लिये उन्होने सब्जी बेचकर पढ़ाई के लिए पैसे जुटाते थे. वे मंदिरों में रहे और पिलानी के बिरला इंस्टीट्यूट में उन्होंने उच्च शिक्षा प्राप्त की. बाद में तीस के दशक में वे आरएसएस में शामिल हो गए. भले ही उनका जन्म महाराष्ट्र में हुआ, लेकिन उनका कार्यक्षेत्र राजस्थान और उत्तरप्रदेश में रहा. उनकी श्रद्धा देखकर आरएसएस सरसंघचालक श्री गुरू जी ने उन्हें प्रचारक के रूप में गोरखपुर भेजा. बाद में वे उत्तरप्रदेश के प्रांत प्रचारक बने.

आरएसएस कार्यकर्ता के रूप में

नानाजी देशमुख लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक के राष्ट्रवादी विचारधारा से प्रेरित हुए. तिलक से प्रेरित होकर उन्होंने समाज सेवा और सामाजिक गतिविधियों में रूचि ली. आरएसएस के डॉ केशब बलिराम हेडगेवार से उनके पारिवारिक संबंध थे. हेडगेवार ने नानाजी में छिपी प्रतिभा को पहचान लिया और आरएसएस की शाखा में आने के लिए प्रेरित किया.
1940 में, डॉ केशव बलिराम हेडगेवार के निधन के बाद उन्हें कई युवकों को महाराष्ट्र की आरएसएस शाखा में शामिल होने के लिए प्रेरित किया. नानाजी ऐसे लोगों में से थे जिन्होंने अपना संपूर्ण जीवन राष्ट्र की सेवा में अर्पित करने के लिए आरएसएस से जुड़े. वे प्रचारक के रूप में उत्तरप्रदेश भेजे गए. आगरा में वे पहलीबार डॉ दीनदयाल उपाध्याय से मिले. बाद में नानाजी गोरखपुर गए जहां उन्होंने लोगों को संघ की विचारधारा के बारे में बताया. ये कार्य बिल्कुल ही आसान नहीं था, संघ के पास दैनिक खर्च के लिए भी धन नहीं थे. उन्हें धर्मशालाओं में ठहरना पड़ता था. उन्हें लगातार धर्मशाला बदलना पड़ता था, क्योंकि एक धर्मशाला में लगातार तीन दिनों से ज्यादा समय तक ठहरने नहीं दिया जाता था. अंत में बाबा राघवदास ने उन्हें इस शर्त पर ठहरने दिया कि वे उनके लिए खाना बनाएंगे. तीन साल के अंदर उनकी मेहनत ने रंग लाई और गोरखपुर के आसपास करीब 250 संघ की शाखाएं खुल गई. नानाजी ने हमेशा शिक्षा पर बहुत जोर दिया. उन्होंने 1950 में गोरखपुर में पहले सरस्वती शिशु मंदिर की स्थापना की.
1947 में, आरएसएस ने राष्ट्रधर्म और पांचजन्य नामक दो पत्रिकाओं और स्वदेश नामक पत्र की शुरूआत करने का फैसला किया. श्री अटल बिहारी वाजपेयी को संपादन और दीन दयाल उपाध्याय को मार्गदर्शन, जबकि नानाजी को प्रबंध निदेशक की जिम्मेदारी सौंपी गई. पैसे के अभाव में पत्र और पत्रिकाओं का प्रकाशन संगठन के लिए मुश्किल कार्य था, लेकिन इससे उनके उत्साह में कमी नहीं आई और सुदृढ राष्ट्रवादी सामाग्री के कारण इन प्रकाशनों को लोकप्रियता और पहचान मिली. 1948 में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की हत्या के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिससे इन प्रकाशन कार्यों पर असर पड़ा. उन दिनों भूमिगत होकर इनका प्रकाशन कार्य जारी रहा.

राजनीतिक जीवन

जब आरएसएस पर से प्रतिबंध हटा तो फैसला राजनीतिक संगठन भारतीय जन संघ की स्थापना का फैसला हुआ. श्री गुरूजी ने नानाजी को उत्तरप्रदेश में भारतीय जन संघ के महासचिव का प्रभार लेने को कहा. नानाजी का जमीनी कार्य उत्तरप्रदेश में पार्टी को स्थापित करने में अहम भूमिका निभायी. 1957 तक भाजपा ने उत्तरप्रदेश के सभी जिलों में अपनी ईकाई बनाई. इस दौरान नानाजी ने पूरे उत्तरप्रदेश का दौरा किया. जल्द ही भारतीय जनसंघ उत्तरप्रदेश की प्रमुख शक्ति बन गई. 1967 में भारतीय जनसंघ संयुक्त विधायक दल का हिस्सा बन गया और चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में सरकार में शामिल हो गई. नानाजी के चौधरी चरण सिंह और डॉ राम मनोहर लोहिया से अच्छे संबंध थे, इसलिए गधबंधन में उन्होंने अहम भूमिका निभायी. उत्तरप्रदेश की पहली गैर-कांग्रेसी सरकार के गठन में विभिन्न राजनीतिक दलों को एकजुट करने में नानाजी जी ने अहम भूमिका निभायी. उत्तरप्रदेश की बड़ी राजनीतिक हस्ती चंद्रभानु गुप्ता को नानाजी की वजह से तीन बार कड़ी चुनौती का सामाना करना पड़ा. एकबार, राज्यसभा चुनाव में कांग्रेसी नेता और चंद्रभानु के पसंदीदा उम्मीदवार को हराने के लिए उन्होंने रणनीति बनाई. 1957 में जब गुप्ता स्वयं लखनऊ से चुनाव लड़ रहे थे, तो नानाजी ने समाजवादियों से साथ गठबंधन बनाकर बाबू त्रिलोकी सिंह को बड़ी जीत दिलाई. 1957 में गुप्ता को दूसरी बार हार को मुंह देखना पड़ा. उत्तरप्रदेश में भाजपा ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय की दृष्टि, अटल बिहारी वाजपेयी के वक्तृत्व और नानाजी के संगठनात्मक कार्यों के कारण भारतीय जनसंघ महत्वपूर्ण राजनीतिक शक्ति बन गया. न सिर्फ पार्टी कार्यकर्ताओं से बल्कि विपक्षी दलों के साथ भी नानाजी के संबंध अच्छे थे. श्री चंद्रभानु गुप्ता, जिन्हें नानाजी के कारण कई बार चुनावों में हार का सामना करना पड़ा, नानाजी का खूब सम्मान करते थे और उन्हें प्यार से नाना फड़नवीस कहते थे. डॉ राम मनोहर लोहिया से उनके अच्छे संबंधों ने भारतीय राजनीति की दशा-दिशा बदल दी. एकबार नानाजी ने डॉ लोहिया को भारतीय जनसंघ कार्यकर्ता सम्मेलन में बुलाया, जहां लोहिया की मुलाकात दीन दयाल उपाध्याय से हुई. दोनों के जुड़ाव से भाजस समाजवादियों के करीब आया, दोनों ने कांग्रेस और उसके कुशासन का पर्दाफाश कर दिया. नानाजी विनोबा भावे के भूदान आंदोलन में सक्रिय रूप से शामिल हुए. दो महीनों तक विनोबा के साथ रहे. वे आंदोलन से प्रभावित हुए. जेपी आंदोलन में जब जयप्रकाश पर पुलिस ने लाठियां बरसाई. उस समय नानाजी ने जयप्रकाश को सुरक्षित निकाल लिया. जिसमें नानाजी को चोटें आई और इनका एक हाथ टूट गया. बाद में जयप्रकाश नारायण और पूर्व पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी ने नानाजी के साहस की भूरि-भूरि प्रशंसा की. उन्हें पुरस्कार के तौर पर उन्हें मंत्रिमंडल में बतौर उद्योग मंत्री शामिल होने का न्यौता भी दिया, लेकिन नानाजी ने इनकार कर दिया. आपातकाल हटने के बाद चुनाव हुए, जिसमें बलरामपुर लोकसभा सीट से नानाजी सांसद चुने गए. 1980 में साठ साल की उम्र में उन्होंने सक्रिय राजनीति से संन्यास लेकर आदर्श की स्थापना की. बाद में उन्होंने अपना पूरा जीवन सामाजिक और रचनात्मक कार्यों में लगा दिया. वे आश्रमों में रहे और कभी अपना प्रचार नहीं किया. जय प्रकाश नारायण के आह्वान पर उन्होंने संपूर्ण क्रांति को पूरा समर्थन दिया. जनता पार्टी से संस्थापकों में नानाजी प्रमुख थे. कांग्रेस को सत्ताच्यूत तक जनता पार्टी सत्ता में आई. नानाजी दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की और उसमें सेवा दी. उन्होंने चित्रकूट में चित्रकूट ग्राम्योदय विश्वविद्यालय की स्थापना की. यह भारत का पहला ग्रामीण विश्वविद्यालय है और वे इसके पहले कुलाधिपति थे. 1999 में एनडीए सरकार ने उन्हें राज्यसभा से सांसद बनाया.
पंडित दीनदयाल उपाध्याय की हत्या उनके लिए बहुत बड़ी क्षति थी. और उन्होंने दिल्ली में अकेले दम पर दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की और देश में रचनात्मक कार्य आंदोलन को समर्पित कर दिया. उन्होंने गरीबी निरोधक और न्यूनतम आवश्यकता कार्यक्रम चलाया. उन्होंने कृषि, कुटीर उद्योग, ग्रामीण स्वास्थ्य और ग्रामीण शिक्षा पर बल दिया. राजनीति से हटने के बाद उन्होंने संस्थान का अध्यक्ष पद संभाला और संस्थान की बेहतरी में अपना सारा समय अर्पित कर दिया. उन्होंने मंथन पत्रिका प्रकाशित किया जिसका कई वर्षों तक के आर मलकानी ने संपादन किया. नानाजी ने उत्तरप्रदेश और महाराष्ट्र के सबसे पिछड़े जिलों गोंडा और बीड में बहुत से सामाजिक कार्य किए. उनके द्वारा चलाई गई परियोजना का उद्देश्य था- हर हाथ को काम और हर खेत को पानी. 1969 में वे पहली बार चित्रकूट आए और अंतिम रूप से वे चित्रकूट में बस गए. उन्होंने भगवान श्रीराम की कर्मभूमि चित्रकूट की दुर्दशा देखी. वे मंदाकिनी के तट पर बैठ गए और अपने जीवन काल में चित्रकूट को बदलने का फैसला किया. अपने वनवास के काल में राम ने दलित जनों के उत्थान का कार्य किया. इससे प्रेरणा लेकर नानाजी ने चित्रकूट कोअपने सामाजिक कार्यों का केंद्र बनाया. उन्होंने सबसे गरीब व्यक्ति की सेवा शुरू की. वे अक्सर कहा करते थे कि वे राजाराम से वनवासी राम की अधिक प्रशंसा करते हैं, इसलिए वे अपना बचा हुआ जीवन चित्रकूट में बिताएंगे. ये वही स्थान है जहां राम ने अपने वनवास के चौदह में से बारह वर्ष गरीबों की सेवा में बिताए. उन्होंने अपने अंतिम क्षण तक इस प्रण का पालन किया. उनका निधन चित्रकूट में २७ फरवरी २०१० को हो गया।

दीनदयाल शोध संस्थान

पंडित दीनदयाल उपाध्याय(1916-1968) प्रणीत एकात्म मानववाद को मूर्त रूप देने के लिए नानाजी देशमुख ने 1972 में नई दिल्ली में दीनदयाल शोध संस्थान की स्थापना की. यह दर्शन समाज के प्रति मानव की समग्र दृष्टि पर आधारित है जो भारत को आत्मनिर्भर बना सकता है. नानाजी देशमुख ने एकात्म मानववाद के आधार पर ग्रामीण भारत के विकास की रूपरेखा रखी. शुरुआती प्रयोगों के बाद उत्तरप्रदेश के गोंडा और महाराष्ट्र के बीड में नानाजी ने गांवों में स्वास्थ्य, सुरक्षा, शिक्षा, कृषि, आय अर्जन, संसाधनों के संरक्षण, सामाजिक विवेक के विकास के लिए एकात्म कार्यक्रम की शुरुआत की. पूर्ण परिवर्तन कार्यक्रम का आधार, लोक सहयोग और सहकार है. चित्रकूट परियोजना या आत्म-निर्भरता के लिए अभियान की शुरूआत 26 जनवरी 2005 में चित्रकूट के आस-पास हुई. जो उत्तरप्रदेश और मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित है. इस परियोजना का उद्देश्य 2005 तक इन गांवों में आत्म-निर्भरता हासिल करना था. परियोजना 2010 में पूरी हुई. परियोजना से उम्मीद जगी कि इसके आसपास के पांच सौ गांवों को आत्म-निर्भर बनाया जाए. यह भारत और दुनिया के लिए आदर्श बन सकता है.

प्रशंसा और सम्मान

1999 में नानाजी देशमुख को पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया. पूर्व राष्ट्र एपीजे अब्दुल कलाम ने नानाजी देशमुख और उनके संगठन दीनदयाल शोध संस्थान की प्रशंसा की. इस संस्थान की मदद से सैकड़ों गांवों को मुकदमा मुक्त विवाद सुलझाने का आदर्श बनाया गया. अब्दुल कलाम ने कहा
"चित्रकूट में मैंने नानाजी देशमुख और दीनदयाल उपाध्याय के उनके साथियों से मुलाकात की. दीन दयाल शोध संस्थान ग्रामीण विकास के प्रारूप को लागू करने वाला अनुपम संस्थान है यह प्रारूप भारत के लिए उपयुक्त है. विकास कार्यों से अलग दीनदयाल उपाध्याय संस्थान विवाद-मुक्त समाज की स्थापना में मदद करता है. मैं समझता हूं कि चित्रकूट के आसपास अस्सी गांव मुकदमा-मुक्त है. गांव के लोगों ने सर्वसम्मति से फैसला किया कि किसी विवाद का हल करने के लिए वे वे अदालत नहीं जाएंगे. तय हुआ कि विवाद आपसी सहमति से सुलझा लिए जाएंगे. नानाजी देशमुख के मुताबिक अगर लोग लड़ते झगड़ते रहेंगे तो विकास के लिए समय ही नहीं बचेगा." कलाम के मुताबिक, विकास के इस अनुपम प्रारूप को सामाजिक संगठनों, न्यायिक संगठनों और सरकार के माध्यम से देश के विभिन्न भागों में फैलाया जा सकता है. शोषितों और दलितों के उत्थान के लिए समर्पित नानाजी की प्रशंसा करते हुए कलाम ने कहा कि नानाजी चित्रकूट में जो कर रहे हैं वो अन्य लोगों के लिए आंखें खोलने वाला होना चाहिए.

निधन

नाना जी ने 95 साल की उम्र में देश के पहले ग्रामीण विश्वविद्यालय(जिसकी स्थापना उन्होंने खुद की) में 27 फरवरी 2010 को अंतिम सांस ली. वे पिछले कुछ समय से बीमार थे, लेकिन ईलाज के लिए दिल्ली जाने से मना कर दिया. नाना साहब देश के पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपना शरीर मेडिकल शोध के लिए दान करने की इच्छा जताई.
अंत में, सुधि जनों से निवेदन है कि वे विकिपीडिया पर इस लेख को भी संवर्धित और पूर्ण बनाने में विकि का सहयोग करें.

शनिवार, 27 फ़रवरी 2010

हिंदी की मदद आप भी कर सकते हैं

आप अंकुर जी को जानते होंगे, नहीं जानते हैं तो कोई बात नहीं, यहां क्लिक करें. अंकुर भाई ने बहुत अच्छा सवाल किया, पढ़े, आपलोग हिंदी यानी अपनी मातृभाषा के लिए क्या कर रहे हैं. अंकुर भाई यानी एक कंप्यूटर गीक और खूबसूरत लड़कियों को और खूबसूरत बनाने वाले(हा..हा..हा) अंकुर भाई को लगा कि हिंदी को बढ़ावा देने या हिंदी के विकास यानी हिंदी के लिए कुछ करने के नाम पर ज्यादातर लोग बकवास ही कर रहे हैं. ऐसा मानने वालों में मैं भी शामिल हूं. हिंदी में इंटरनेट पर लिखा जा रहा है, बहुत लिखा जा रहा है, लेकिन आप किसी ज्वलंत मुद्दे पर पूर्ण अधिकृत लेख का दावा नहीं कर सकते हैं. लोग लिखते तो हैं, लेकिन जिम्मेदारी लेकर नहीं, जिम्मेदारीपूर्वक नहीं. ऐसे में इस सवाल उठना लाजिमी है कि आप हिंदी या अपनी मातृभाषा के विकास के लिए आप क्या कर रहे हैं.
किसी भी हिंदी प्रेमी के मस्तिष्क में ये प्रश्न उठना स्वाभाविक है. लेकिन इस सवाल का जवाब उतना ही मुश्किल. लेकिन कुछ लोग हिंदी के विकास को लेकर अपने कार्य पर सुलझे हुए है जैसे कि अनुनाद सिंह जी, रवि रतलामी जी आदि आदि.
हिंदी के लिए आप अगर कुछ करना चाहते हैं तो इंटरनेट पर हिंदी में ज्यादा से ज्यादा लिखे, यथासंभव पूर्ण और अधिकृत रूप से लिखने का प्रयास करें. अपनी रचना के लिए जिम्मेदारी लें, उसपर दावा करें.
इंटरनेट पर हिंदी की सशक्त उपस्थिति प्रदान करने का सबसे सशक्त माध्यम है हिंदी विकिपीडिया को शक्तिशाली बनाना. हिंदी विकिपीडिया पर ज्ञान-विज्ञान के करीब-करीब तमाम विषयों पर पूर्ण और अधिकृत लेख बनाने की आवश्यकता है(यहां आप न तो लेख की जिम्मेदारी ले सकते हैं और न ही उस पर दावा कर सकते हैं, लेकिन यहां पर लिखा गया हर एक पूर्ण लेख हिंदी विकिपीडिया को सशक्त बनाएगी और इसी से हिंदी सशक्त होगी)
क्या आपको मालूम है कि अंग्रेजी विकिपीडिया अंग्रेजी भाषा में ज्ञान-विज्ञान का अक्षय-भंडार बन रहा है. अंग्रेजी विकि प्रेमियों की योजना है कि मानव सभ्यता और इतिहास ने पिछले पांच हजार सालों जो कुछ जाना और सीखा है उसे अंग्रेजी विकि-पीडिया में पिरो देना है. क्या हिंदी के लिए ऐसा कुछ नहीं किया जा सकता है. किया जा सकता है. और हम सबको करना होगा, अगर हम और आप हिंदी को सशक्त और संबल बनाना चाहते हैं तो. अगर अंग्रेजी से टक्कर लेना चाहते हैं तो. इसके सिवा कोई चारा नहीं है.
हमारे दोस्तों में एक ने कहा, यार इसबार सैलरी बढ़ेगी. दूसरे न जवाब दिया, यार विकिपीडिया में सर्च मार लेना. पता चल जाएगा. मैंने पूछा कितने लेख लिखे हो हिंदी विकिपीडिया पर. उनका मुंह बंद था(दरअसल, वो लोग मुझे हिंदी विकिपीडिया के दीवाने के रूप में जानते हैं और अक्सर मजाक करते हैं). मैंने विभिन्न लॉग-इन से करीब एक हजार लेख को रूपांतरित, पुनर्लेखन, संवर्धन या आरंभन में योगदान दिया है. क्योंकि जहां तक मैं जानता हूं हिंदी के लिए विकिपीडिया लेखन से बड़ा काम नहीं किया जा सकता है. इंटरनेट पर हिंदी की सशक्त उपस्थिति के लिए हिंदी विकिपीडिया को सशक्त करने से बेहतर दूसरा कोई बेहतर तरीका नहीं दिख रहा है. सिर्फ विकिपीडिया पर लिखना ही काफी नहीं है. हिंदी विकीपीडिया को बेहतर बनाने के लिए आप काम करें, अभियान चलायें, हिंदी प्रेमियो, छात्रों से अपील करें, उन्हें जोड़े, विकि संपादन का तरीका बताएं, इंटरनेट पर हिंदी की सेटिंग समझाएं. यानी विकि को मजबूत करें, हिंदी स्वत: मजबूत हो जाएगी.
विकिपीडिया पर या यूं कहें कि कंप्यूटर पर हिंदी लिखने में अब भी कई लोगों को परेशानी आ रही है. इस बात को सिर्फ एक उदाहरण से समझा जा सकता है.
एक बहुत ही उन्नत ब्लॉग पर कंप्यूटर पर हिंदी नहीं लिख पाने की मजबूरी का बयान किया गया था. मैंने अपने एक मित्र को ऑपन-ऑफिस में हिंदी टाइप करके दिखा दिया तो वो आश्चर्यचकित रह गया और जब मैंने उसे भी ये करना सिखा दिया तो वो मेरा कृतज्ञ (अहसानमंद) हो गया. ऑपन-ऑफिस की बात छोड़िए, किसी भी ऑफिस, वर्ड पैड, नोटपैड, इंटरनेट पर किसी भी पेज में हिंदी सीधे लिखी जा सकती है. बस एक बार एक कंप्यूटर में थोड़ी सैटिंग्स बदलने की जरूरत है. बस वो हिंदी का गुलाम बन जाएगा. जब तक आप कहेंगे नहीं, तब तक वो अंग्रेजी में एक शब्द अंग्रेजी लिख ही नहीं सकता है. मैं पिछले दो साल से कंप्यूटर पर हिंदी लिख रहा हूं, कोई परेशानी नहीं है.
मेरी एक भतीजी अन्नामलाई विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग कर रही है. उसने अपने एक मित्र से पूछा कि मेरे लैपटॉप पर हिंदी सेट कर दो, तो उसने कंप्यूटर और हिंदी कहके हंसा. मेरी भतीजी बोली, अरे अंकल तो अपने कंप्यूटर पर हिंदी में लिखते हैं. तो उसने कहा, हिंदी लिखने के लिए चार हजार का सॉफ्टवेयर आता है. मेरी भतीजी ने मुझसे संपर्क किया. मैंने उसे सैटिंग्स बता दी. जब उसका कंप्यूटर हिंदी लिखने लगा तो वह अपने दोस्त पर गुस्साते हुए कहा, कंप्यूटर के बड़े मास्टर बनते हो, लेकिन इतना भी पता नहीं कि कंप्यूटर पर हिंदी कैसे लिखी जाती है.
कहने का मतलब है कंप्यूटर पर हिंदी लिखी जा सकती है. वो भी आसानी से.
हिंदी को विकि के माध्यम से सशक्त बनाए.

सोमवार, 22 फ़रवरी 2010

घाव पर नमक

संसद के बजट सत्र में सदस्यों को संबोधित कर राष्ट्रपति दो बातें कहीं, शायद आपको पसंद आए
महंगाई का फायदा देश के किसानों को मिला.
महंगाई सर्वांगीण विकास का सूचक है
हमारे राष्ट्रनिर्माताओं ने जो सपना देखा था, हम उस सपने को पूरा करने के इतने करीब कभी नहीं थे, जितने अब हैं.

जय हिंदी जय भारत

मेरा अपना संग्राहक

मेरा अपना संग्राहक
http://madhuchhatra.feedcluster.com/
मैंने चिट्ठों का अपना संग्राहक बनाया है जो चिट्ठों को प्रकाशित करेगा. अगर आप अपना चिट्ठा जोड़ना चाहें तो अपना पता भेजिए.
जय हिंदी जय भारत

बीबीसी ने गूगल-माइक्रोसॉफ्ट के बीच समझौता करा दिया

बीबीसी ने गूगल और माइक्रोसॉफ्ट के बीच समझौता करा दिया
जय हिंदी जय भारत

रविवार, 21 फ़रवरी 2010

मैं यानी माइकल जैक्सन

 सारी दुनिया जानती है मुझे
माइकल जैक्सन के नाम से
पर मैं पूरी जिंदगी
अपना अस्तित्व खोजता रहा
मेरा जन्म तो हुआ
पर मैं उन बदनसीब बच्चों में था
जिनका कोई बचपन नहीं होता
नहीं सी जान पर
अनुशासन के नाम पर
तरह-तरह से जुल्म ढाए गए
शुक्रिया उन जुल्मों का
जिसने मेरे पैरों को साध दिया
साधना इतनी पक्की कि
मैं बन गया
दुनिया का सबसे बड़ा पॉप स्टार
अकूत दौलत और शोहरत के बीच
अपने बचपन को खोजता रहा
मैंने नेवरलैंड भी बसाया
पर मेरा आहत बचपन
कही हरवक्त मेरा पीछा करता रहा
उससे पीछा छुड़ाने की
मैंने लाख कोशिश की, लेकिन
आज तक सफल नहीं हो सका
बचपन को तलाशती रही मेरी जिंदगी
विवादों में फंस गई
मुझे पथभ्रष्ट और न जाने
क्या-क्या कहा गया
पर तुम क्या कहोगे
मुझे किस रूप में याद रखोगे
मैं जानता हूं कि ये दुनिया
मेरे बचपन की तरह ही आहत है
उसे चाहिए, स्नेह का मरहम
उसे चाहिए, शब्दों का स्पर्श
मैंने आहत दुनिया के घाव पर
मरहम लगाने की कोशिश की
इसमें कितना सफल रहा
इसका फैसला तो तुम्ही करोगे
मेरा काम यहीं खत्म नहीं होता है
मैं तुम्हारे बीच हमेशा मौजूद रहूंगा
तुम्हारे दुखते घाव पर
मरहम लगाने के लिए
डूबे रहोगे तुम
गहन अंधकार में
घिरे रहोगे तुम
गहरी निराशा में
तब सुनाई देंगे
मेरे पदचाप
थपथपाएंगे तुम्हें
मेरे शब्दों के स्नेहिल हाथ
घिरे रहोगे तुम
गहरी विपत्ति में
मंडराएंगे शंकाओं के बादल
तुम्हारी कुंठा में
तुम्हारे विक्षोभ में
मिल जाएगी
मेरे पैरों की थिरकन
तुम्हारे दर्द में
तुम्हारे गम में
तुम्हारी खुशी में
वादा है मेरा
मैं रहूंगा तुम्हारे साथ
तुम्हारे दिल में
हमेशा, हमेशा और हमेशा के लिए
सप्रेम तुम्हारा
माइकल जैक्सन

शनिवार, 20 फ़रवरी 2010

नरेंद्र कोहली- हिंदी के सर्वश्रेष्ठ रचनाकार

2009071651620401  6521Image3194चित्र- द हिंदू और पुस्तक.ऑर्ग से(साभार)
नरेंद्र कोहली आधुनिक हिंदी साहित्य के बहुचर्चित लेखकों में से एक हैं. कोहली आधुनिक हिंदी साहित्य में सांस्कृतिक पुनर्जागरण के अगुवा के रूप में पहचाने जाते हैं. उन्हें आधुनिक हिंदी गद्य साहित्य में प्राचीन महाकाव्य की पुनर्खोज का श्रेय दिया जाता है. हिंदी साहित्य में उनके योगदान की तुलना उपन्यास सम्राट प्रेमचंद से की जाती है, हालांकि उनके आलोचकों का दावा है कि नरेंद्र कोहली का साहित्य प्रेमचंद से भी ज्यादा प्रभावोत्पादक और दीर्घ-प्रभावी है. वहीं प्रकाशकों का मानना है कि उच्चस्तरीय हिंदी साहित्य में कोहली, प्रेमचंद की ही तरह, सबसे ज्यादा बिकने वाले लेखक हैं.
आधुनिक हिंदी साहित्य में नरेंद्र कोहली के लेखन से ही सांस्कृति पुनर्जागरण की शुरुआत होती है. अपने महाकाव्य लेखन में भारतीय संस्कृति और दर्शन के मूलभूत तत्वों के समग्र संश्लेषण का श्रेय नरेंद्र कोहली को दिया जाता है. नरेंद्र कोहली के सर्वश्रेष्ठ और कालजयी रचनाओं में महासमर शामिल है. उनकी रचनाओं में पाठक अनायास ही तल्लीन हो जाता है. जैसा कि धर्मवीर भारती ने कहा, “यूं ही कुतूहलवश 'दीक्षा' के कुछ पन्ने पलटे और फिर उस पुस्तक ने ऐसा जादू डाला कि दोनों दिन पूरी शाम उसे पढ़कर ही खत्म किया. चार खंडों में पूरी रामकथा एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है. यदि आप आदि से अंत तक यह लय रख ले गए, तो वह बहुत बड़ा काम होगा.” आश्चर्य नहीं, कि नरेंद्र कोहली ने अभ्युदय, महासमर सहित अन्य कालजयी रचनाओं में धर्मभारती के कथनानुसार, उस लय को बरकरार रखा. कोहली जी की कलात्मक प्रस्तुति, कथा कहने की उनकी अद्भुत कला के कारण पाठक कर्मयोग जैसे भारतीय दर्शन के जटिल संकल्पनाओं को पौराणिक आख्यानों और उदाहरणों के माध्यम से, बिना तारतम्य खोये समझ जाता है. उसे ये भी नहीं लगता है कि उसे कोई शिक्षा या उपदेश दे रहा है.
उनकी सर्वश्रेष्ठ रचनाओं में उनकी कालजयी रचना, अभ्युदय, महासमर, तोड़ो कारा तोड़ो(महाकाव्य), वसुदेव, अभिज्ञान, आत्मदान(उपन्यास), पांच अबसर्ड उपन्यास, आश्रितों का विरोध(व्यंग्य), जहां है धर्म, वहीं है जय: महाभारत की अर्थप्रकृति, हिंदी उपन्यास:सृजन एवं सिद्धांत(साहित्यिक आलोचना), स्मरामि(लेख और संस्मरण), साथ सहा गया दुख, प्रीति कथा(आत्मकथापरक उपन्यास)
नरेंद्र कोहली मानवीय रिश्तों के अन्वेषण के अद्वितीय और सिद्धहस्त लेखक हैं. जटिल चरित्रों के वर्णन में- एक आम आदमी(साथ सहा गया दुख) से विध्वंसकारी( जैसे- महासमर में दुर्योधन) से मानवीय विकास के शिखर पुरूष(जैसे- राम, कृष्ण, रामकृष्ण परमहंस एवं विवेकानंद). उनके हास्य लोगों को गुदगुदाते हैं और भावनात्मक रचनाएं(साथ सहा गया दुख) पाठकों को रुलाती हैं, जबकि महाकाव्यात्मक रचनाएं पाठकों को विस्मयाभिभूत और आश्चर्यचकित करती हैं. उनकी रचनाओं ने वर्तमान जीवन का यथार्थ और अतीत का आदर्श एक साथ चलता है, जो उन्हें प्रासंगिक और पठनीय बनाती हैं.
उनकी रचनाएं देश और काल सीमाओं से परे मानवीय मस्तिष्क और व्यवहार और प्रकृति की सार्वभौमिक थाती हैं. विश्व साहित्य में नरेंद्र कोहली को रूसी साहित्यकार लियो तोल्स्टॉय के समकक्ष माना जाता है. अगर उनकी रचनाओं को विश्व की विभिन्न भाषाओं में अनुवाद कराया जाता है तो भारत का शाश्वत और सार्वभौमिक संदेश पूरे विश्व में फैलेगा.
नरेंद्र कोहली का जन्म अविभाजित भारत के पंजाब प्रांत में हुआ. 1947 में भारत विभाजन के बाद वे बिहार के जमशेदपुर में आ बसे. यहीं उनकी प्रारंभिक शिक्षा उर्दू माध्यम से हुई. उन्होंने जमशेदपुर को-ऑपरेटिव कॉलेज में हिंदी माध्यम से पढ़ाई की. 1963 में दिल्ली से रामजस कॉलेज से एमए की डिग्री ली. 1970 में दिल्ली विश्वविद्यालय से पीएचडी की. 1963 से 1965 तक दिल्ली विश्वविद्यालय में अध्यापन कार्य किया और वहीं से 1995 में स्वैच्छिक अवकाश ग्रहण किया.
हिंदी साहित्य में नरेंद्र कोहली युग प्रवर्तक माने जाते हैं. पिछले करीब पांच दशकों से हिंदी साहित्य पर कोहली जी प्रभाव है. वे अपनी प्रतिभा से हिंदी साहित्य को नई गति और दिशा प्रदान कर रहे हैं. हिंदी साहित्य में नूतन आयाम जोड़ने का श्रेय कोहली जी को जाता है. भारतेंदु हरिश्चंद्र, जयशंकर प्रसाद और प्रेमचंद की तरह ही नरेंद्र कोहली हिंदी साहित्य में पुनर्जागरण युग या कोहली युग के प्रवर्तक हैं. डॉ विजय स्नातक के अनुसार,
"डा नरेन्द्र कोहली का हिन्दी साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान है। विगत तीस-पैंतीस वर्षों में उन्होंने जो लिखा है वह नया होने के साथ-साथ मिथकीय दृष्टि से एक नई जमीन तोड़ने जैसा है।...कोहली ने व्यंग, नाटक, समीक्षा और कहानी के क्षेत्र में भी अपनी मौलिक प्रतिभा का परिचय दिया है। मानवीय संवेदना का पारखी नरेन्द्र कोहली वर्तमान युग का प्रतिभाशाली वरिष्ठ साहित्यकार है।"
सामयिक पृष्ठभूमि- कोई भी साहित्यकार शून्य में साहित्य का सृजन नहीं कर सकता है. वह अपने युग की प्रकृति और प्रवृति से प्रभावित होता है. हिंदी साहित्य में नरेंद्र कोहली का पर्दापण उस समय हुआ जब देश का विशाल मध्यमवर्ग स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देखे गए सपनों के टूटने की निराशा, गरीबी और बेकारी के दौर से गुज़र रहा था. स्वतंत्रता संग्राम का आदर्शवाद एवं उत्साह अब पिछले युग की कहानी बन गए थे. भय, भूख और भ्रष्टाचार का बोलबाला बढ़ रहा था. एक अंग्रेज से स्वतंत्र हुए तो दूसरा अंग्रेज हमपर शासन करने लगा. कथित रूप से अर्जित स्वतंत्रता में न तो हमारा अपना शासन था और न अपना कानून. स्वतंत्र भारत के कर्णाधारों के पास न तो कोई भी दूरगामी सोच वाली स्वतंत्र एवं भारतीय शिक्षा प्रणाली थी, और न ही जनसामान्य के पास ऐसी स्थिति से निबटने के लिए पर्याप्त नैतिक आधार था. जो कुछ जातीय अनुभव का बल था उसे सांप्रदायिक कहकर नकार दिया दिया. हम आयातित विचारधारा और आयातित बुद्धि के गुलाम बनते चले गए. छठे दशक के अंतिम दौर में जहां नवनिर्माण की धारा क्षीणतर होती जा रही थी, वहीं राजनेताओं एवं सरकारी कर्मचारियों का भ्रष्टाचार एवं नैतिक पतन निर्लज्ज रूप से सार्वजनिक होता जा रहा था. त्रस्त जनता के आक्रोश की अभिव्यक्ति उसकी अपनी कायरता एवं दायित्व बोध के अभाव के कारण किसी ठोस सामाजिक क्रांति में परिवर्तित नहीं हो सकी. इसके विपरीत विशाल बेरोजगार युवा वर्ग में कुंठाएं और हीन भावनाएं घर कर गईं. न्हीं विकृतियों से तत्कालीन साहित्यकार एवं आलोचक भी ग्रस्त रहे, जिन्हें तत्कालीन कृतियों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है. इस युग में कविता और गद्य दोनों ही क्षेत्रों में प्रयोग एवं यथार्थ के नाम पर दुर्बल चरित्रों का चित्रण, उनकी ग्रंथियों एवं विकृतियों के नग्न चित्रण की परम्परा चल पड़ी.
जैनेन्द्र कुमार अपने अस्वभाविक चरित्रों की अस्वस्थ मनोवृत्तियों एवं कुंठाओं के खुले चित्रण के कारण प्रेमचंद के बाद सबसे चर्चित रचनाकारों में से एक रहे. इसी परम्परा में अज्ञेय, धर्मवीर भारती इत्यादि भी आते हैं, जिनके साहित्य के बारे में प्रख्यात आलोचक एवं इतिहासकार गणपतिचन्द्र गुप्त का कथन है
"यह दुर्बल व्यक्तियों की दुर्बल कहानियां हैं जो समाज में अस्वस्थता, दुर्बलता एवं रुग्णता का वातावरण उत्पन्न करने में पर्याप्त सहायक सिद्ध हो सकती हैं. नए लेखकों में जो अनाचार, पीडा एवं कुंठाओं की जो प्रबलता दृष्टिगोचर होती है वह बहुत कुछ इस वर्ग के साहित्य से प्रभावित है."
चूंकि यह समस्याएं आज भी वर्तमान हैं, इसलिए आश्चर्य नहीं की यह उच्छृंखलतावाद, भोगवाद, निराशावाद एवं अन्य पतानोन्मुखी वृत्तियाँ आज भी हिन्दी साहित्य के कई रचनाकारों एवं आलोचकों में पर्याप्त प्रबल हैं. आश्चर्य नहीं कि नरेन्द्र कोहली का निर्माणोन्मुखी एवं आदर्शवादी साहित्य उनके लिए विस्मय, उपेक्षा एवं भय का विषय है।
प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया आवश्यम्भावी है. साहित्यिक आत्मा के अभाव के कारण आत्म-कृतघ्नात्मक पतानोन्मुखी साहित्य से पाठक दूर होते चले गए. उसके फलस्वरूप साहित्यकारों की एक ऐसी पीढ़ी का उदय हुआ जो मानव-विकास के मूल तत्वों को रेखांकित कर विकासोन्मेषी साहित्य में विश्वास रखती थी. आर्ष साहित्यिक मनीषा का परिचय, आद्य भारतीय संस्कृति के शाश्वत तत्वों की पहचान एवं आध्यात्म-रूपी भारतीय आत्मा की खोज जिस साहित्य का लक्ष्य रही, वही इन साहित्यकारों में प्रधान रहा. उन्मुक्तता एवं बंधनहीनता के नाम पर अपनी संस्कृति एवं आदर्शों के लांछित करने की जो प्रवृत्ति साहित्य में प्रवेश कर चुकी थी, उसको दरकिनार करते हुए; स्वविवेक से श्रेय को स्वीकार कर एवं हेय का परित्याग कर जिन साहित्यकारों ने आस्था के मूल स्वरों को सपने के साहित्य की शक्ति बनाया, उन्हें 'सांस्कृतिक पुनरुत्थान के युग' का हिस्सा माना जा सकता है.
ऐसा नहीं है कि आस्थावादी स्वर कभी साहित्य में थे ही नहीं. पर १९४० के आस-पास छायावादी युग के अवसान के साथ यह स्वर फीके पड़ते गए. यह दिलचस्प है कि सभी युग-प्रवर्तक साहित्यकारों में आस्थावादी सांस्कृतिक विचारधारा की प्रधानता रही है. गोस्वामी तुलसीदास से लेकर भारतेंदु से 'प्रसाद', महादेवी, 'निराला' एवं पन्त, सभी भारतीय संस्कृति के विशारद थे. सभी प्रखर सांस्कृतिक दृष्टि से संपन्न थे एवं सभी ने आस्थावादी अवं आदर्शवादी मूल्यों को बल दिया है. अंध-रूढ़ियाँ तोड़ी हैं, पर निर्माण का स्वर कभी फीका नहीं पड़ने दिया.
नरेन्द्र कोहली ने साहित्य में आस्थावादी मूल्यों को स्वर दिया. सन् १९७५ में उनके रामकथा पर आधारित उपन्यास 'दीक्षा' के प्रकाशन से हिंदी साहित्य में 'सांस्कृतिक पुनरुत्थान का युग' प्रारंभ हुआ जिसे हिन्दी साहित्य में 'नरेन्द्र कोहली युग' का नाम देने का प्रस्ताव भी जोर पकड़ता जा रहा है. तात्कालिक अन्धकार, निराशा, भ्रष्टाचार एवं मूल्यहीनता के युग में नरेन्द्र कोहली ने ऐसा कालजयी पात्र चुना जो भारतीय मनीषा के रोम-रोम में स्पंदित था. युगों युगों के अन्धकार को चीरकर उन्होंने भगवान् राम को भक्तिकाल की भावुकता से निकाल कर आधुनिक यथार्थ की जमीन पर खड़ा कर दिया.
साहित्यिक एवम पाठक वर्ग चमत्कृत ही नहीं, अभिभूत हो गया। किस प्रकार एक उपेक्षित और निर्वासित राजकुमार अपने आत्मबल से शोषित, पीड़ित एवं त्रस्त जनता में नए प्राण फूँक देता है, 'अभ्युदय' में यह देखना किसी चमत्कार से कम नहीं था. युग-युगांतर से रूढ़ हो चुकी रामकथा जब आधुनिक पाठक के रुचि-संस्कार के अनुसार बिलकुल नए कलेवर में ढलकर जब सामने आयी, तो यह देखकर मन रीझे बिना नहीं रहता कि उसमें रामकथा की गरिमा एवं रामायण के जीवन-मूल्यों का लेखक ने सम्यक् निर्वाह किया है. हिंदी साहित्य का मूर्धन्य कवि शिवमंगल सिंह 'सुमन' ने कहा,
"रामकथा की ऐसी युगानुरूप व्याख्या पहले कभी नहीं पढ़ी थी. इससे राम को मानवीय धरातल पर समझने की बड़ी स्वस्थ दृष्टि मिलती है और कोरी भावुकता के स्थान पर संघर्ष की यथार्थता उभर कर सामने आती है. आपकी व्याख्या में बड़ी ताजगी है. तारीफ़ तो यह है कि आपने रामकथा की पारम्परिक गरिमा को कहीं विकृत नहीं होने दिया है. मैं तो चाहूंगा कि आप रामायण और महाभारत के अन्य पौराणिक प्रसंगों एवं पात्रों का भी उद्घाटन करें. है तो जोखिम का काम पर यदि सध गया तो आप हिन्दी कथा साहित्य में सर्वथा नयी विधा के प्रणेता होंगे."
कोहली की प्रशंसा
हिंदी साहित्य के मूर्धन्य साहित्यकारों और दिग्गजों ने नरेंद्र कोहली की मुक्त कंठ से प्रशंसा की है. कथाकार जैनेंद्र कुमार ने कहा,
मैं नहीं जानता कि उपन्यास से क्या अपेक्षा होती है और उसका शिल्प क्या होता है. प्रतीत होता है कि आपकी रचना उपन्यास के धर्म से ऊंचे उठकर कुछ शास्त्र की कक्षा तक बढ़ जाती है. मैं इसके लिए आपका कृतज्ञ होता हूँ और आपको हार्दिक बधाई देता हूँ.
भगवतीचरण वर्मा ने कहा,
मैंने आपमें वह प्रतिभा देखी है जो आपको हिन्दी के अग्रणी साहित्यकारों में ला देती है. राम कथा के आदि वाले अंश का कुछ भाग आपने ('दीक्षा' में) बड़ी कुशलता के साथ प्रस्तुत किया है. उसमें औपन्यासिकता है, कहानी की पकड़ है.
यशपाल जैसे मार्क्सवादी चिन्तक भी नरेन्द्र-कोहली की प्रतिभा के कायल हुए बिना न रहे.
"आपने राम कथा, जिसे अनेक इतिहासकार मात्र पौराणिक आख्यान या मिथ ही मानते हैं, को यथाशक्ति यथार्थवादी तर्कसंगत व्याख्या देने का प्रयत्न किया है. अहल्या की मिथ को भी कल्पना से यथार्थ का आभास देने का अच्छा प्रयास.
भारतीय संस्कृति के सजग प्रहरी हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे मूर्धन्य आलोचक तथा इतिहासकार ने कहा,
"रामकथा को आपने एकदम नयी दृष्टि से देखा है. 'अवसर' में राम के चरित्र को आपने नयी मानवीय दृष्टि से चित्रित किया है. इसमें सीता का जो चरित्र आपने चित्रित किया है, वह बहुत ही आकर्षक है. सीता को कभी ऐसे तेजोदृप्त रूप में चित्रित नहीं किया गया था. साथ ही सुमित्रा का चरित्र आपने बहुत तेजस्वी नारी के रूप में उकेरा है. मुझे इस बात की प्रसन्नता है कि यथा-संभव रामायण कथा की मूल घटनाओं को परिवर्तित किये बिना आपने उसकी एक मनोग्राही व्याख्या की है. ...पुस्तक आपके अध्ययन, मनन और चिंतन को उजागर करती है.
डा. नगेन्द्र जैसे आलोचक का कहना है कि-
दीक्षा में प्रौढ़ चिंतन के आधार पर रामकथा को आधुनिक सन्दर्भ प्रदान करने का साहसिक प्रयत्न किया गया है. बालकाण्ड की प्रमुख घटनाओं तथा राम और विश्वामित्र के चरित्रों का विवेक सम्मत पुनराख्यान, राम के युगपुरुष/युगावतार रूप की तर्कपुष्ट व्याख्या उपन्यास की विशेष उपलब्धियाँ हैं.
वहीं धर्मवीर भारती का ने कहा-
"यूं ही कुतूहलवश 'दीक्षा' के कुछ पन्ने पलटे और फिर उस पुस्तक ने ऐसा intrigue किया कि दोनों दिन पूरी शाम उसे पढ़कर ही ख़त्म किया. बधाई. चार खंडों में पूरी रामकथा एक बहुत बड़ा प्रोजेक्ट है. यदि आप आदि से अंत तक यह 'tempo' रख ले गए, तो वह बहुत बड़ा काम होगा. इसमें सीता और अहल्या की छवियों की पार्श्व-कथाएँ बहुत सशक्त बन पड़ी हैं.
प्रसिद्ध ललित निबंधकार रामनारायण उपाध्याय तो उनपर ऐसे न्यौछावर हुए कि उनकी आलोचना 'भक्ति' की सीमा को छूने लगी :
"मैनें डा. शान्तिकुमार नानुराम का वाल्मीकि रामायण पर शोध-प्रबंध पढ़ा है. रमेश कुंतल मेघ एवं आठवलेकर के राम को भी पढ़ा है; लेकिन (दीक्षा में) जितना सूक्ष्म, गहन, चिंतनपूर्ण विराट चित्रण आपने किया वैसा मुझे समूचे हिन्दी साहित्य में आज तक कहीं देखने को नहीं मिला. अगर मैं राजा या साधन-सम्पन्न मंत्री होता तो रामायण की जगह इसी पुस्तक को खरीदकर घर-घर बंटवाता".
पर सहज आनंद और गौरव का अनुभव किया महान उपन्यासकार अमृतलाल नागर ने, जिन्होंने न सिर्फ पीठ ठोंकी, वरन पहले उपन्यास की कमियाँ भी बताईं और खुले दिल से आगे बढ़ने का आर्शीवाद भी दिया :
"आप अपने नायक के चित्रण में सश्रद्ध भी हैं और सचेत भी. ...प्रवाह अच्छा है. कई बिम्ब अच्छे उभरे, साथ साथ निबल भी हैं, पर होता यह चलता है कि एक अच्छी झांकी झलक जाती है और उपन्यास फिर से जोर पकड़ जाता है. इस तरह रवानी आद्यांत ही मानी जायगी. इस सफलता के लिए बधाई. ... सुबह के परिश्रम से चूर तन किन्तु संतोष से भरे-पूरे मन के साथ तुम्हें बहुत काम करने और अक्षय यश सिद्ध करने का आर्शीवाद देता हूँ.
कोहली जी ने गद्य की सभी विधाओं पर इतना लिखा जितना आज तक किसी भी शीर्षस्थ रचनाकार ने नहीं लिखा था. और प्रेमचंद की ही भांति हिन्दी को वह लेखक फिर मिला जो स्पर्श मात्र से किसी भी विषय को जीवंत कर दे. कहीं भी बिखराव नहीं, कहीं भी अस्पष्टता नहीं; न जटिलता, न ठहराव. नरेन्द्र कोहली आज उस सोपान पर हैं जहां प्रेमचंद तब होते यदि उन्होंने लम्बी आयु पाई होती और अपने कृतित्व का और विकास किया होता. यदि उन्होंने अपनी प्रतिबद्धताओं को तर्कसंगत व्यापकता प्रदान की होती.
प्रसिद्ध कवि बाबा नागार्जुन लिखते हैं,
" प्रथम श्रेणी के कतिपय उपन्यासकारों में अब एक नाम और जुड़ गया-दृढ़तापूर्वक मैं अपना यह अभिमत आपतक पहुंचाना चाहता हूँ. ...रामकथा से सम्बन्धित सारे ही पात्र नए-नए रूपों में सामने आये हैं, उनकी जनाभिमुख भूमिका एक-एक पाठक-पाठिका के अन्दर (न्याय के) पक्षधरत्व को अंकुरित करेगी यह मेरा भविष्य-कथन है.
शेष अगले भागों में--

क्या यही सेक्यूलरिज्म है?

Scale of injustice_thumb[3] चित्र- साभार-nomadmolouges.blogspot.com
हाल ही में पश्चिम बंगाल सरकार की बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार ने अल्पसंख्यकों(सेक्यलुरों के लिए अल्पसंख्यकों का मतलब सिर्फ मुसलमान होता है) के लिए दस प्रतिशत आरक्षण देने का फैसला किया है. पश्चिम बंगाल सरकार के इस फैसले से कांग्रेस किकर्तव्यविमूढ़ हो गई है. आखिर क्या करे और न करें. दरअसल पश्चिम बंगाल सरकार ने रंगनाथ मिश्रा समिति की रिपोर्ट के आधार पर अल्पसंख्यकों(सिर्फ मुसलमानों) को आरक्षण दिया है. रंगनाथ मिश्रा कमिटी की रिपोर्ट तीन साल पहले यानी 2007 में ही आई थी, लेकिन केंद्र में कांग्रेस की अगुवाई वाली यूपीए सरकार इसे संसद में रखने से घबरा रही थी. वो जानती थी कि इसे संसद में रखने पर हंगामा होगा. आखिरकार उसने ये हिम्मत कर दिखाया. रिपोर्ट संसद में पेश की गई. इस पर भाजपा ने बवाल भी मचाया, मगर इसे सांप्रदायिक पार्टी का शोर-शराबा कहकर खारिज कर दिया गया. अभी केंद्र सरकार इस रिपोर्ट पर विचार विमर्श ही कर रही थी कि पश्चिम बंगाल की बुद्धदेब भट्टाचार्य की सरकार ने मुसलमानों को दस प्रतिशत आरक्षण देने की घोषणा कर दी.
पश्चिम बंगाल सरकार ने मुसलमानों को आरक्षण देने का धर्म निरपेक्षतावादी कदम किन परिस्थितियों में उठाया इसे समझने की जरूरत है. बुद्धदेव भट्टाचार्य की सरकार पश्चिम बंगाल में सीपीएम के हाल से परेशान थी. सीपीएम के गढ़ कहे जाने वाले पश्चिम बंगाल और केरल से उसका सफाया हो रहा था. पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की अगुवाई वाली तृणमूल कांग्रेस के सामने सीपीएम के अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया. स्थानीय निकाय के चुनावों में सीपीएम का मटियामेट हो गया. रही-सही कसर लोकसभा के चुनावों ने निकाल दी. सीपीएम को इससे पहले कभी भी पश्चिम बंगाल में ऐसी बुरी स्थिति का सामना करना नहीं पड़ा था. सिंगूर और नंदीग्राम नरसंहार ने सीपीएम का क्रूर और वीभत्स चेहरा लोगों के सामने ला दिया. छद्म-धर्म-निरपेक्षता का चोला ओढ़ने वाले सीपीए का क्रूर चेहरा सबके सामने था. इन नरसंहारों में ज्यादातर मुसलमानों को ही सीपीएम के कार्यकर्ताओं ने निशाना बनाया. बुद्धदेव भट्टाचार्य के क्रूर नेतृत्व के सामने ममता बनर्जी का कुशल नेतृत्व था. लोगों ने ममता के विराट व्यक्तित्व का साथ दिया और सीपीएम को खारिज कर दिया. सीपीएम अपने ढहते किले से परेशान थी और ऐसे में छद्म धर्मनिरपेक्षता पूर्ण रंगनाथ मिश्रा कमिटी की रिपोर्ट का उसने सहारा लिया और दे डाला मुसलमानों को दस प्रतिशत आरक्षण.
रंगनाथ मिश्रा कमिटी ने किस आधार पर मुसलमानों को आरक्षण देने की सिफारिश की? केंद्रीय कैबिनेट ने अब तक इस पर कोई फैसला नहीं किया तो आखिर किस आधार पर पश्चिम बंगाल सरकार ने मुसलमानों को आरक्षण दिया. सवाल उठता है कि आखिर धर्म निरपेक्षता का दंभ भरने वाली सीपीएम सांप्रदायिक क्यों नहीं है?
संविधान में आर्थिक पिछड़ापन के आधार पर किसी को भी आरक्षण देने की व्यवस्था नहीं है. संविधान में आरक्षण की व्यवस्था सिर्फ उन लोगों के लिए की गई है, जिन्हें सामाजिक भेदभाव, उत्पीड़न और छुआछूत का दंश झेलना पड़ा था. इस श्रेणी ने केवल अनुसूचित जातियां और जनजातियां ही शामिल हैं. लेकिन तथाकथित सेक्यूलरों ने आर्थिक पिछड़ेपन का राग छेड़कर मुसलमानों को भी आरक्षण देने के लिए समिति बनवाकर उससे सिफारिश भी करवा ली (यहां गौर करने वाली बात की, सत्ताधारी पार्टियां अपने इच्छानुसार समितियां और आयोग बनाती है और अपने इच्छानुसार ही रिपोर्ट तैयार करवाती है और सिफारिशें भी करवाती हैं. जैसे लालू ने गोधरा कांड की जांच के लिए यूसी बनर्जी कमिटी बनवाई और “दूध का दूध और पानी का पानी रिपोर्ट” ला दिया और उसका फायदा बिहार विधानसभा चुनाव में उठाने की कोशिश की. ऐसी ही लिब्राहन आयोग और रंगनाथ मिश्रा कमिटी की रिपोर्ट में कांग्रेस ने सिफारिशें करवाई)
अगर आर्थिक पिछड़ेपन के आधार पर ही आरक्षण देना हो तो जाति-धर्म के ऊपर उठकर गरीबों की पहचान क्यों नहीं की जाती है. क्यों नहीं पता किया जाता है कि इस देश में कितने प्रतिशत लोग गरीब है और उन सभी को आरक्षण का लाभ क्यों नहीं दिया जाता. क्यों जाति धर्म के नाम पर विभिन्न समूहों को आरक्षण देने की व्यवस्था की गई है.
पादरियों और मुल्लाओं ने हिंदुओं को प्रलोभन देकर धर्मांतरित करवाया. उन्हें प्रलोभन दिया गया कि “उनसे प्यार करो जो सबसे प्यार करता है” लेकिन धर्मांतरित होने बाद भी न तो अल्लाह न और न ही परमपिता परमात्मा ने इन दलितों से प्रेम किया. उनकी हालत बद से बदतर हो गई. अब ये मुसलमान और ईसाई दलित होकर आरक्षण की मांग कर रहे हैं.  आखिर, धर्मांतरण करने वालों से क्यों नहीं पूछा जाए कि इनकी स्थिति क्यों नहीं बदली. और फिर जिन लोगों ने सामाजिक भेदभाव से तंग आकर धर्मांतरण कर लिया उन्हें यह आरक्षण का लाभ क्यों मिलना चाहिए.
कांग्रेस के युवराज दलितों के घर रात बिताकर, विदेशी मेहमानों के साथ गरीबी का फोटो खिंचवाकर हीरो तो बन जाते हैं लेकिन क्या उनके पास इस बात का जवाब है कि देश में कितने प्रतिशत लोग गरीब हैं. उनको क्या पता होगा. जिस अमेठी के लोगों ने राहुल के मॉ, दादी, चाचा, खुद उनको सांसद बनाया, उसी अमेठी में आजादी के बासठ साल गुजर जाने के बाद भी लोग गरीब क्यों है. क्या राहुल को पता कि अमेठी में कितने लोग गरीब हैं. शायद नहीं.  देश में गरीबी है यह जानने के लिए प्राचीन राजा-महराजाओं की तरह राहुल को भी गरीबों के घर रात बिताना पड़ता है. उन्होंने  कहना पड़ता है कि केंद्र सरकार द्वारा भेजा गया एक रूपये में से महज पांच पैसा ही गरीबों तक पहुंच पाता है(कुछ ऐसा ही खुलासा इनके पिताजी ने दशकों पहले किया था)
अजी राहुल की बात छोड़ भी दें तो क्या सरकार को पता है कि देश में कितने लोग गरीब हैं. नहीं
हाल ही अनेक समितियों का गठन हुआ. सबने अलग अलग रिपोर्ट दिया. गरीबी के आंकड़े में सबों की रिपोर्ट में जमीन आसमान का अंतर है.
साल 2005 में विभिन्न मंचों से हमारे ईमानदार अफसरशाह प्रधानमंत्री जी घोषणा किया करते थे कि देश में मात्र 26 प्रतिशत लोग गरीबी रेखा नीचे रह गए हैं(महान उपलब्धि) वे आने वाले पांच सालों में इसे घटाकर दस प्रतिशत पर ला देंगे. लेकिन अभी जो गरीबी के आंकड़े सामने आएं हैं वे चौकाने वाले हैं. भले ही हर समितियों के आंकड़ों मे जमीन आसमान का फर्क है, लेकिन देश में गरीबों की संख्या में भारी बढ़ोतरी हुई है. हां अमीरों की संख्या में भी कुछ बढ़ोतरी हुई है.
गरीबी के ये आंकड़े-
प्रधानमंत्री के अनुसार(2005)- 26.5 प्रतिशत
योजना आयोग द्वारा गठित तेंदुलकर समिति के अनुसार- 41.8 प्रतिशत
विश्व बैंक रिपोर्ट(2005)- 42 प्रतिशत(सवा डॉलर यानी साठ रुपया प्रतिव्यक्ति प्रतिदिन के हिसाब से)
योजना आयोग के अनुसार(2005)-27.5 प्रतिशत
ग्रामीण विकास मंत्रालय की रिपोर्ट- 50 प्रतिशत
अर्जुन सेनगुप्ता समिति की रिपोर्ट-78 प्रतिशत
जब सरकार को गरीबों की संख्या के बारे में ही पता नहीं है तो वो गरीबी को कम करने के लिए प्रयास करेगी तो किस स्तर पर. वो गरीबों को जाति-धर्म के नाम पर आरक्षण के दायरे में बांधकर उन्हें ठगने और गुमराह करने की कोशिश कर रही है.

शुक्रवार, 12 फ़रवरी 2010

ऐसा सिर्फ बिहारी कर सकता है

ऐसा सिर्फ बिहारी कर सकता है
विश्वास नहीं हो रहा है तो इस लिंक को देखिए. कांग्रेस के जिस युवराज के स्वागत में मीडिया पलक पांवरे बिछाये रहती है. उस युवराज का स्वागत बिहारियों ने भी किया, लेकिन अपने तरीके से. कैसे देखिए इस वीडियो में और न्यूज यहां
जय हिंदी जय भारत

हर कोई बिक रहा है, आरोपी और आरोप लगाने वाला भी

कौन नहीं बिक रहा है
अंग्रेजी के बड़े-बड़े अखबारों में हिंदी, मराठी गुजराती(यू कहें, क्षेत्रीय अखबारों) के खिलाफ एक अभियान चलाया जा रहा है कि ये पत्रकारिता के मूल्यों को तार-तार कर रहे हैं. पैसे लेकर खबर छापते हैं. प्रतिष्ठित समाचार पत्र "द हिंदू" नामचीन पत्रिका "आउटलुक" जैसे अंग्रेजी अखबारों और मैगजीन ने इस अभियान को खूब बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया. इस मुहिम में पी साईनाथ जैसे वरिष्ठ और प्रतिष्ठित पत्रकार भी शामिल थे.
मैं बतला दूं कि मैं अखबारों की इस घटिया हरकत का समर्थक नहीं हूं, लेकिन क्षेत्रीय पत्रकारिता के खिलाफ एकतरफा अभियान के खिलाफ जरूर हूं.
इस खबर को पढ़िए
पता चल जाएगा कि केवल क्षेत्रिय समाचार पत्र ही इस घिनौती हरकत में शामिल नहीं हैं बल्कि अंग्रेजी के तथाकथित बड़े-बड़े अखबार और पत्र-पत्रिकाएं भी शामिल हैं. इनकी पहुंच वेटिकन से लेकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों, समाजवादी से लेकर साम्यवादी देश, खाड़ी से लेकर टिपोरी तक है.
अगर इजाजत हो तक इसका लेखा-जोखा किसी दूसरे दिन प्रस्तुत कर सकता हूं.
फिलहाल लिंक को पढ़ लीजिए.

जय हिंदी जय भारत

बुधवार, 10 फ़रवरी 2010

नरेंद्र कोहली का महासमर पढ़िए

 नरेंद्र कोहली का महासमर पढ़िए. हिंदी में विश्वस्तरीय साहित्य का अनुभव करिेए. यह पुस्तक पिछले पच्चीस सालों से हिंदी में बेस्ट सेलर(सबसे ज्यादा बिकने वाली) पुस्तक है. यह पुस्तक आपको हिंदी में सोचने का तरीका बदल देगी. वाणी प्रकाशन की नई साज-सज्जा इसे विश्वस्तरीय बनाती है.
जय हिंदी जय भारत

भारतीय किसान आंदोलन के जनकः स्वामी सहजानंद सरस्वती


डॉ देवकुमार पुखराज
भारत में संगठित किसान आंदोलन खड़ा करने का श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को जाता है. उन्होंने अंग्रेजी दासता के खिलाफ लड़ाई लड़ी और किसानों को जमींदारों के शोषण से मुक्त कराने के लिए निर्णायक संघर्ष किया. दण्डी संन्यासी होने के बावजूद सहजानंद ने रोटी को हीं भगवान कहा और किसानों को भगवान से बढ़कर बताया. स्वामीजी ने नारा दिया था-
जो अन्न-वस्त्र उपजाएगा ,अब सो कानून बनायेगा,
ये भारतवर्ष उसी का है, अब शासन वहीं चलायेगा।
ऐसे महान नेता,युगद्रष्टा और किसानों के मसीहा का जन्म उत्तरप्रदेश के गाजीपुर जिले के देवा गांव में सन् 1889 में महाशिवरात्रि के दिन हुआ था. स्वामीजी के बचपन का नाम नौरंग राय था. उनके पिता बेनी राय मामूली किसान थे. नौरंग जब छह साल के थे तभी उनकी माताजी का स्वर्गवास हो गया. चाची ने उनका लालन-पालन किया. कहते हैं पूत के पांव पलने में हीं दिखने लगते हैं. बालक नौरंग में भी महानता के गुण बचपन से हीं दिखने लगे. प्राथमिक शिक्षा के दौरान हीं उन्होंने अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाना शुरू कर दिया .पढ़ाई के दौरान हीं उनका मन आध्यात्म में रमने लगा. बालक नौरंग ये देखकर हैरान थे कि कैसे भोले-भाले लोग नकली धर्माचार्यों से गुरु मंत्र ले रहे हैं. उनके बालमन में धर्म की इस विकृति के खिलाफ पहली बार विद्रोह का भाव उठा. उन्होंने इस परंपरा के खिलाफ आवाज उठाने का संकल्प लिया. धर्म के अंधानुकरण के खिलाफ उनके मन में जो भावना पली थी कालांतर में उसने सनातनी मूल्यों के प्रति उनकी आस्था को और गहरा किया. उनके मन में वैराग्य पैदा होने लगा. घर वालों ने बच्चे की ये हाल देखी तो समय से पहले हीं उनकी शादी करा दी. लेकिन जिसके सर पर समाज और देश की दशा सुधारने का भूत सवार हो वो भला पारिवारिक जीवन में कहां बंधने वाला था. संयोग ऐसा रहा कि गृहस्थ जीवन शुरू होने के पहले हीं उनकी पत्नी भगवान को प्यारी हो गयीं. ये सन् 1905 के आखिरी दिनों की बात है. हालांकि दो साल बाद हीं उन्होंने विधिवत संन्यास लेने का फैसला किया और दशनामी दीक्षा लेकर स्वामी सहजानंद सरस्वती हो गये. बाद के सात साल उन्होंने धार्मिक ग्रंथों को पढ़ने और सामाजिक-राजनीतिक स्थितियों का अध्ययन करने में बिताया. इसी दौरान उन्हें काशी में समाज की एक और कड़वी सच्चाई से रू--रू होना पड़ा. दरअसल काशी के कुछ पंड़ितों ने उनके संन्यास का ये कहकर विरोध किया कि ब्राह्मणेतर जातियों को दण्ड धारण करने का अधिकार नहीं है. स्वामी सहजानंद ने इसे चुनौती के तौर पर लिया और विभिन्न मंचों पर शास्त्रार्थ कर ये साबित किया कि भूमिहार भी ब्राह्मण हीं हैं और हर योग्य व्यक्ति संन्यास ग्रहण करने की पात्रता रखता है.बाद के दिनों में ब्रह्मर्षि वंश विस्तर और भूमिहार-ब्राह्मण परिचय जैसे ग्रंथ लिखकर उन्होंने अपनी धारण को सैद्धांतिक जामा पहनाया. वैसे स्वामीजी ने जब बिहार में किसान आंदोलन शुरू किया तो उनके निशाने पर अधिकांश भूमिहार जमींदार हीं थे जो अपने इलाके में किसानों के शोषण का पर्याय बने हुए थे.
महात्मा गांधी के नेतृत्व में शुरू हुआ असहयोग आंदोलन बिहार में गति पकड़ा तो सहजानंद उसके केन्द्र में थे. घूम-घूमकर उन्होंने अंग्रेजी राज के खिलाफ लोगों को खड़ा किया. इस अभियान ने युवा संन्यासी को गांव-देहात की स्थिति को नजदीक से देखने का पर्याप्त अवसर दिया. लोग ये देखकर अचरज में पड़ जाते कि गेरूआ वस्त्रधारी ये कैसा संन्यासी है जो मठ-मंदिरों में तप साधना करने की बजाय दलितों-वंचितों की स्थिति को जानने-समझने में अपनी ऊर्जा खपा रहा है. ये वो समय था जब स्वामी जी भारत को समझ रहे थे. इस क्रम में उन्हें एक अजूबा अनुभव हुआ. स्वामीजी ने देखा कि अंग्रेजी शासन की आड़ में जमींदार गरीब किसानों पर जुल्म ढा रहे हैं. बिहार के गांवों में गरीब लोग अंग्रेजो से नहीं वरन् गोरी सत्ता के इन भूरे दलालों से आतंकित हैं. किसानों की हालत गुलामों से भी बदतर है. युवा संन्यासी का मन एक बार फिर नये संघर्ष की ओर उन्मुख होता है. वे किसानों को लामबंद करने की मुहिम में जुटतें हैं. सन् 1929 में उन्होंने बिहार प्रांतीय किसान सभा की नींव रखी. इस मंच से उन्होंने किसानों की कारुणिक स्थिति को उठाया. जमींदारों के शोषण से मुक्ति दिलाने और जमीन पर रैयतों का मालिकाना हक दिलाने की मुहिम शुरू की. इस रूप में देखें तो भारत के इतिहास में संगठित किसान आंदोलन खड़ा करने और उसका सफल नेतृत्व करने का एक मात्र श्रेय स्वामी सहजानंद सरस्वती को जाता है. कांग्रेस में रहते हुए स्वामीजी ने किसानों को जमींदारों के शोषण और आतंक से मुक्त कराने का अभियान जारी रखा. उनकी बढ़ती सक्रियता से घबड़ाकर अंग्रेजों ने उन्हें जेल में डाल दिया. कारावास के दौरान गांधीजी के कांग्रेसी चेलों की सुविधाभोगी प्रवृति को देखकर स्वामीजी हैरान रह गये. उन्होंने देखा कि जेल में बंद कांग्रेस के कार्यकर्ता और नेता सुविधापूर्वक जीने के लिए कैसे-कैसे हथकंड़े अपना रहे हैं. स्वभाव से हीं विद्रोही स्वामीजी का कांग्रेस से मोहभंग होना शुरू हो गया. जब1934 में बिहार प्रलयंकारी भूकंप से तबाह हुआ तब स्वामीजी ने बढ़-चढ़कर राहत और पुनर्वास के काम में भाग लिया. इस दौरान स्वामीजी ने देखा कि प्राकृतिक आपदा में अपना सबकुछ गंवा चुके किसानों को जमींदारों के लठैत टैक्स देने के लिए प्रताड़ित कर रहे है. उन्होंने तब पटना में कैंप कर रहे महात्मा गांधी से मिलकर किसानों की दशा बतायी और दोहरी मार से मुक्ति दिलाने के लिए प्रयास करने की मांग की. जवाब में गांधीजी ने कहा कि जमींदारों के अधिकांश मैनेजर कांग्रेस के कार्यकर्ता है .वे निश्चित तौर पर गरीबों की मदद करेंगे. गांधीजी ने दरभंगा महाराज से मिलकर भी किसानों के लिए जरूरी अन्न का बंदोबस्त करने के लिए स्वामीजी से कहा. कहते है कि गांधीजी की ऐसी बातें सुनकर स्वामी सहजानंद आग बबूला हो गये और तत्काल वहां से ये कहकर चल दिए कि किसानों का सबसे पड़ा शोषक तो दरभंगा राज हीं है. मैं उससे भीख मांगने कभी नहीं जाऊंगा.इस घटना ने कांग्रेस नेताओं की कार्यशैली से नाराज चल रहे स्वामीजी का गांधीजी से भी पूरी तरह मोहभंग कर दिया.विद्रोही सहजानंद ने एक झटके में हीं चौदह साल पुराना संबंध तोड़ दिया और किसानों को हक दिलाने के लिए संघर्ष को हीं जीवन का लक्ष्य घोषित कर दिया. उन्होंने नारा दिया -कैसे लोगे मालगुजारी,लट्ठ हमारा जिन्दाबाद. बाद में यहीं नारा किसान आंदोलन का सबसे प्रिय नारा बन गया.वे कहते थे ,अधिकार हम लड़ कर लेंगे और जमींदारी का खात्मा करके रहेंगे. उनका ओजस्वी भाषण किसानों पर गहरा असर डालता था. काफी कम समय में किसान आंदोलन पूरे बिहार में फैल गया. स्वामीजी का प्रांतीय किसान सभा संगठन के तौर पर खड़ा होने के बजाए आंदोलन बन गया. इस दौरान किसानों की सैकड़ों रैलियां और सभाएँ हुई. बड़ी संख्या में किसान स्वामीजी को सुनने आते थे. बाद के दिनों में उन्होंने कांग्रेस के समाजवादी नेताओं से हाथ मिलाया. अप्रैल,1936 में कांग्रेस के लखनऊ सम्मेलन में अखिल भारतीय किसान सभा की स्थापना हुई और स्वामी सहजानंद सरस्वती को उसका पहला अध्यक्ष चुना गया. एम जी रंगा, ई एम एस नंबूदरीपाद, पंड़ित कार्यानंद शर्मा, पंडित यमुना कार्यजी,आचार्य नरेन्द्र देव, राहुल सांकृत्यायन, राम मनोहर लोहिया, जयप्रकाश नारायण, पंडित यदुनंदन शर्मा, पी. सुन्दरैया और बंकिम मुखर्जी जैसे तब के कई नामी चेहरे किसान सभा से जुड़े थे. सभा ने उसी साल किसान घोषणा पत्र जारी कर जमींदारी प्रथा के समग्र उन्मूलन और किसानों के सभी तरह के कर्ज माफ करने की मांग उठाई. अक्टूबर 1937 में सभा ने लाल झंड़ा को संगठन का निशान घोषित किया.किसानों के हक की लड़ाई बड़े पैमाने पर लड़ी जाने लगी थी. दस्तावेज बताते हैं कि स्वामी सहजानंद के नेतृत्व में किसान रैलियों में जुटने वाली भीड़ कांग्रेस की सभाओं में आने वाली भीड़ से कई गुना ज्यादा होती थी.संगठन की लोकप्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि 1935 में इसकी सदस्यों की संख्या अस्सी हजार थी जो 1938 में बढ़कर दो लाख पचास हजार हो गयी. शायद यहीं वजह हुआ कि इसके नेताओं की कांग्रेस से दूरियां बढ़ गयी. वैसे बिहार और संयुक्त प्रांत में कांग्रेस सरकार के साथ कई बार इनकी तीखी झड़पें भी हुई. किसान आंदोलन के संचालन के लिए पटना के समीप बिहटा में उन्होंने आश्रम स्थापित किया. वो सीताराम आश्रम आज भी है .
किसान हितों के लिए आजीवन सक्रिय रहे स्वामी सहजानंद ने नेताजी सुभाष चन्द्र बोस के साथ कई रैलियां की. वे उनके फारवॉड ब्लॉक से भी निकट रहे. सीपीआई भी स्वामीजी को अपना आदर्श मानती रही. आजादी की लड़ाई के दौरान जब उनकी गिरफ्तारी हुई तो नेताजी ने 28 अप्रैलप्रैल को ऑल इंडिया स्वामी सहजानंद डे घोषित कर दिया. बिहार के प्रमुख क्रांतिकारी लोक कवि बाबा नागार्जुन भी स्वामीजी से अति प्रभावित थे. उन्होंने वैचारिक झंझावातों के दौरान बिहटा आश्रम में जाकर स्वामीजी से मार्गदर्शन प्राप्त किया था.
स्वामी सहजानंद संघर्ष के साथ हीं सृजन के भी प्रतीक पुरूष हैं. अपनी अति व्यस्त दिनचर्या के बावजूद उन्होंने कोई दो दर्जन से ज्यादा पुस्तकों की रचना की. सामाजिक व्यवस्था पर जहां उन्होंने भूमिहार ब्राह्मण परिचय, झूठा भय मिथ्या अभिमान, ब्राह्मण कौन,ब्राह्मण समाज की स्थिति जैसी पुस्तकें हिन्दी में लिखी वहीं ब्रह्मर्षि वंश विस्तर और कर्मकलाप नामक दो ग्रंथों का प्रणयन संस्कृत और हिन्दी में किया.उनकी आत्मकथा मेरा जीवन संघर्ष के नाम से प्रकाशित है. आजादी की लड़ाई और किसान आंदोलन के संघर्षों की दास्तान उनकी -किसान सभा के संस्मरण,महारुद्र का महातांडव,जंग और राष्ट्रीय आजादी, अब क्या हो,गया जिले में सवा मास आदि पुस्तकों में दर्ज हैं. उन्होंने गीता ह्रदय नामक भाष्य भी लिखा .
किसानों को शोषण मुक्त करने और जमींदारी प्रथा के खिलाफ लड़ाई लड़ते हुए स्वामी जी 26 जून ,1950 को महाप्रयाण कर गये. उनके जीते जी जमींदारी प्रथा का अंत नहीं हो सका. लेकिन उनके द्वारा प्रज्जवलित ज्योति की लौ आज भी बुझी नहीं है. आजादी मिलने के साथ हीं जमींदारी प्रथा को कानून बनाकर खत्म कर दिया गया. लेकिन प्रकारांतर से देश में किसान आज भी शोषण -दोहन के शिकार बने हुए हैं. कर्ज और भूख से परेशान किसान आत्महत्या कर रहे हैं. आज यदि स्वामीजी होते तो फिर लट्ठ उठाकर देसी हुक्मरानों के खिलाफ संघर्ष का ऐलान कर देते. लेकिन दुर्भाग्य से किसान सभा भी है. उनके नाम पर अनेक संघ और संगठन सक्रिय हैं. लेकिन स्वामीजी जैसा निर्भीक नेता दूर -दूर तक नहीं दिखता. उनके निधन के साथ हीं भारतीय किसान आंदोलन का सूर्य अस्त हो गया. राष्ट्रकवि दिनकर के शब्दों में दलितों का संन्यासी चला गया.
-पुखराज


जय हिंदी जय भारत

रविवार, 7 फ़रवरी 2010

क्या आप कवि बनना चाहते हैं?

जब मैं छोटा था तो सत्यनारायण लाल, सोहनलाल द्विवेदी, शिवमंगल सिंह सुमन, रामधारी सिंह दिनकर, आरसी प्रसाद सिंह जैसे कवियों की कविताएं पढ़ा करता था. इनकी कविताएं आसानी से जुबान पर चढ़ जाती थी. इनकी दर्जनों कविताएं अभी भी कंठस्थ हैं.
इनकी कविताएं इतनी अच्छी लगती थी कि मैंने भी उसी समय सोच लिया कि बड़ा होकर मैं भी कवि बनूंगा. लिखने की कोशिश भी करता था, लेकिन कविता लिखना कितना कठिन है, इसका अनुभव बड़ा होकर हुआ.
बड़ा हुआ तो देखा कविता लेखन की एक अद्भुत परंपरा चल पड़ी है. उसका नाम छंदमुक्त कविता दिया गया(छंदमुक्त कविता की शुरुआत सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने की थी और उन्होंने ही इनका नाम छंदमुक्त कविता रखा). लेकिन निराला ने तो छंदमुक्त कविता लिखी थी लेकिन आज के बेतुके कवि बेतुकी कविता लिख रहे हैं.
मेरे एक दोस्त अजय लाल(जो एक वरिष्ठ पत्रकार भी हैं) वो भी कवितागिरी करते हैं . वो  कविता लिखते तो नहीं हैं, बल्कि कविता करते हैं यानी उनको कवि कहने में कोई हर्ज नहीं है. कवि समाज में उनका बड़ा नाम है. अक्सर कवि सम्मलेनों में जाते हैं. बड़ा रुतबा है उनका. हालांकि मैंने कभी उनकी कविता नहीं पढ़ी. लेकिन अखबार में अक्सर उनके कविता पाठ और कवि सम्मेलन में उनकी वाहवाही की खबर पढ़ता हूं. मैंने सोचा जब मेरे दोस्त अजयलाल कविताएं लिख सकते हैं तो मैं क्यों नहीं. मेरी साध पूरी होती दिख रही थी.
मैं कवि बनने की चाह में अजयलाल से कहा कि यार मैं भी कवि बनना चाहता हूं.
उन्होंने भी मुझे निराश नहीं किया. बोले, तो देर किस बात की. आज ही बन जाओ कवि.
मैंने पूछा, कैसे. कैसे बन जाऊं कवि.
बोले, यार कुछ नहीं करना पड़ता है.
कोई भी अखबार का पन्ना उठाओ, उसके बीच के कुछ टेक्स्ट को छोड़कर दोनों ओर से ढ़क दो. उन्होंने ये सब करके दिखाया. वो चित्र मैं दे रहा हूं.
 07022010056 07022010057
फिर बोले, बीच में जो कुछ लिखा हुआ है, वही तुम्हारी कविता हुई.
यानी ये कविता कुछ इस तरह बनी-
मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में
वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी
मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच
नोंक-झोंक हुई, बैठक के दौरान
यूपीए सरकार पर आरोप लगा
अपने घोषणापत्र में
की दर से अनाज देने
लेकिन सरकार
असफल रही
तमतमाए वित्तमंत्री
ने कहा.. आदि आदि
मैंने सपने में भी नहीं सोचा था कि कविता लिखना और कवि बनना इतना आसान होगा. ये दुनिया की सबसे अद्भुत खोज होगी. जिससे भारत के सभी लोगों को आसानी से कविता बनाया जा सकेगा.
मैंने कहा कि यार, जितनी जल्दी हो, कवि बनने के इस अद्भुत खोज को पेटेंट करवा लो.
उन्होंने कहा कि ऐसा संभव नहीं है.
मैने पूछा, क्यों, आने वाले दिनों में तुम इसका पेटेंट राइट्स बेचकर करोड़ों रुपये कमा सकते हो.
वो बोले, यार हमारे देश के दर्जनों कवियों को ये नायाब तरीका मालूम है और वो इसी तरह कविताएं लिखते हैं. इसलिए इसका पेटेंट नहीं किया जा सकता है.
मैं समझ गया कि इसी अद्भुत खोज की वजह से मेरे देश में कवि घास की तरह उग आये हैं.
भले ही इस गुप्त विद्या का पेटेंट नहीं कराया जा सकता है. लेकिन मैंने तय कर लिया कि यह गुप्त विद्या अब आगे गुप्त नहीं रहेगा और मैं इस गुप्त विद्या का प्रचार पूरे देश में करूंगा और हर भारतवासी को कवि बनने में सहयोग करूंगा, ताकि वो भी इस गुप्त विद्या का लाभ उठाकर सफल कवि बन सके और नाम-यश और पैसा बटोर सकें.
इसी फैसले के तहत मैंने ये पोस्ट लिखी है. आपसे अनुरोध है कि आप भी इस गुप्त विद्या का प्रचार-प्रसार करें और मेरे इस महान मिशन में सहयोग करें.

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2010

अब तो मान जाइये कि आप नक्कारे हैं, (प्रधानमंत्री के नाम खुला पत्र)

आदरणीय मनमोहन सिंह जी,                                                                                                        manmohan-singh-2                  
अब तो मान जाइए कि आप नक्कारे साबित हुए हैं और तथाकथित विश्वबंधुत्व के आपका सिद्धांत(उदारवाद और वैश्विकरण) फेल हो गया है. आपके उदारीकरण और वैश्विकरण में आम आदमी का खून चूसने वाले मोटे-मोटे जोंक ही शामिल थे, कहां से कम होगी महंगाई.
आपका अर्थशास्त्र आदमी की मुश्किलों की आग घी डालने का ही काम किया. महंगाई कम करने के लिए कभी बैंक दरों को बढ़ाओ- कभी बैंक दरों को घटाओ वाला आपका(आपका ही का क्या, चिदंबरम, अहलूवालिया और कुछ कुछ प्रणब दा का सिद्धांत भी) फेल हो गया. आप लोगों को मुश्किलों से छुटकारा नहीं दिला पाए. कई लोग कहते हैं कि आप बहुत ईमानदार हैं. लेकिन मैं तो कहूंगा कि आप भोले नौकरशाह हैं जिसे कॉर्पोरेटरों की भाषा भी समझ में नहीं आती, नेता तो आप कभी हुए नहीं कि आम लोगों की भाषा समझ आपको समझ में आए. हां सोनिया मैडम को(उन बहुत लोगों की तरह) आपमें ईमानदारी और नेता के महान गुण आपमें दिखाई दिए, और आपको देश की सबसे बड़ी(वास्तव में) कुर्सी सौंप दी. और आपने ने भी उनकी महत्वाकांक्षाओं को खूब पूरा किया. आम आदमी के मुंह का निवाला छीनकर बहुराष्ट्रीय कंपनियों की जेबें मोटी करने लगे.
जहां तक मेरा मानना है कि आम आदमी की भाषा को समझने के लिए न ही ऑक्सफोर्ड में पढ़ने, न ही विश्व बैंक में नौकरी करने और न ही अंतर्राष्ट्रीय डिग्री और डिप्लोमाओं को बटोरने की जरूरत है.
अगर देशी सरकारी स्कूलों में पढ़ा-लिखा दो चार भदेस नेताओं को सोनिया जी जैसे लोगों का वरदहस्त(यानी उसे वोट बैंक का जुगाड़ न करना पड़े- जिसके लिए उसे सारा कुकर्म करना पड़ता है, मसलन, सांप्रदायिक दंगे करवाने होते हैं, भाषा, जाति, क्षेत्र के नाम पर लोगों को लड़ाना पड़ता आदि ) प्राप्त हो जाए तो वह कुछ महीनों क्या, कुछ दिनों में महंगाई पर काबू पा लेगा(ये मेरा चैलेंज है). क्योंकि वो आपसे कहीं बेहतर आम आदमी को समझता है. उसे बोलने के लिए लिखे हुए भाषण पढ़ने की जरूरत नहीं होती है. इसके लिए अंतर्राष्ट्रीय मुद्राबाजार, जीडीपी, सीआरआर जैसे भारी भरकम शब्दों की जरूरत नहीं है.
इसके लिए जरूरत है बाजार पर नियंत्रण की और उसे करने के लिए अर्थशास्त्री की मोटी पोथी पढ़ने की जरूरत नहीं है.
अंत में, आपने बहुत देर कर दी, वो बात स्वीकार में जो आपको बहुत पहले स्वीकार कर लेना चाहिए था कि यह हमारे बस की चीज नहीं है. आप कहीं रहेंगे मोटी तनख्वाह वाली नौकरी कर लेंगे. लेकिन उन लोगों का क्या होगा जिसे पानी पीने के लिए हर रोज कुआं खोदना पड़ता है.
आपका
एक आम आदमी