आपके कंप्यूटर के लिए सुंदर, आकर्षक और मुफ्त हिंदी फॉट यहां से डॉऊनलोड किए जा सकते हैं।
1. सिद्धांत
2. अपराजिता और कोकिला फॉंट
3. लोहित

- किसी भी व्यक्ति को जरूरत से ज्यादा ईमानदार नहीं होना चाहिए। सीधे तने वाले पेड़ ही सबसे काटे जाते हैं और बहुत ज्यादा ईमानदार लोगों को ही सबसे ज्यादा कष्ट उठाने पड़ते हैं।
- अगर कोई सांप जहरीला नहीं है, तब भी उसे फुफकारना नहीं छोड़ना चाहिए। उसी तरह से कमजोर व्यक्ति को भी हर वक्त अपनी कमजोरी का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।
- सबसे बड़ा गुरुमंत्र : कभी भी अपने रहस्यों को किसी के साथ साझा मत करो, यह प्रवृत्ति तुम्हें बर्बाद कर देगी।
- हर मित्रता के पीछे कुछ स्वार्थ जरूर छिपा होता है। दुनिया में ऐसी कोई दोस्ती नहीं जिसके पीछे लोगों के अपने हित न छिपे हों, यह कटु सत्य है, लेकिन यही सत्य है।
- अपने बच्चे को पहले पांच साल दुलार के साथ पालना चाहिए। अगले पांच साल उसे डांट-फटकार के साथ निगरानी में रखना चाहिए। लेकिन जब बच्चा सोलह साल का हो जाए, तो उसके साथ दोस्त की तरह व्यवहार करना चाहिए। बड़े बच्चे आपके सबसे अच्छे दोस्त होते हैं।
- दिल में प्यार रखने वाले लोगों को दुख ही झेलने पड़ते हैं। दिल में प्यार पनपने पर बहुत सुख महसूस होता है, मगर इस सुख के साथ एक डर भी अंदर ही अंदर पनपने लगता है, खोने का डर, अधिकार कम होने का डर आदि-आदि। मगर दिल में प्यार पनपे नहीं, ऐसा तो हो नहीं सकता। तो प्यार पनपे मगर कुछ समझदारी के साथ। संक्षेप में कहें तो प्रीति में चालाकी रखने वाले ही अंतत: सुखी रहते हैं।
- ऐसा पैसा जो बहुत तकलीफ के बाद मिले, अपना धर्म-ईमान छोड़ने पर मिले या दुश्मनों की चापलूसी से, उनकी सत्ता स्वीकारने से मिले, उसे स्वीकार नहीं करना चाहिए।
- नीच प्रवृति के लोग दूसरों के दिलों को चोट पहुंचाने वाली, उनके विश्वासों को छलनी करने वाली बातें करते हैं, दूसरों की बुराई कर खुश हो जाते हैं। मगर ऐसे लोग अपनी बड़ी-बड़ी और झूठी बातों के बुने जाल में खुद भी फंस जाते हैं। जिस तरह से रेत के टीले को अपनी बांबी समझकर सांप घुस जाता है और दम घुटने से उसकी मौत हो जाती है, उसी तरह से ऐसे लोग भी अपनी बुराइयों के बोझ तले मर जाते हैं।
- जो बीत गया, सो बीत गया। अपने हाथ से कोई गलत काम हो गया हो तो उसकी फिक्र छोड़ते हुए वर्तमान को सलीके से जीकर भविष्य को संवारना चाहिए।
- असंभव शब्द का इस्तेमाल बुजदिल करते हैं। बहादुर और बुद्धिमान व्यक्ति अपना रास्ता खुद बनाते हैं।
- संकट काल के लिए धन बचाएं। परिवार पर संकट आए तो धन कुर्बान कर दें। लेकिन अपनी आत्मा की हिफाजत हमें अपने परिवार और धन को भी दांव पर लगाकर करनी चाहिए।
- भाई-बंधुओं की परख संकट के समय और अपनी स्त्री की परख धन के नष्ट हो जाने पर ही होती है।
- कष्टों से भी बड़ा कष्ट दूसरों के घर पर रहना है।
आचार्य चाणक्य एक ऐसी महान विभूति थे, जिन्होंने अपनी विद्वत्ता और क्षमताओं के बल पर भारतीय इतिहास की धारा को बदल दिया। मौर्य साम्राज्य के संस्थापक चाणक्य कुशल राजनीतिज्ञ, चतुर कूटनीतिज्ञ, प्रकांड अर्थशास्त्री के रूप में भी विश्वविख्यात हुए। इतनी सदियाँ गुजरने के बाद आज भी यदि चाणक्य के द्वारा बताए गए सिद्धांत और नीतियाँ प्रासंगिक हैं तो मात्र इसलिए क्योंकि उन्होंने अपने गहन अध्ययन, चिंतन और जीवानानुभवों से अर्जित अमूल्य ज्ञान को, पूरी तरह नि:स्वार्थ होकर मानवीय कल्याण के उद्देश्य से अभिव्यक्त किया।
वर्तमान दौर की सामाजिक संरचना, भूमंडलीकृत अर्थव्यवस्था और शासन-प्रशासन को सुचारू ढंग से बताई गई नीतियाँ और सूत्र अत्यधिक कारगर सिद्ध हो सकते हैं। चाणक्य नीति के द्वितीय अध्याय से यहाँ प्रस्तुत हैं कुछ अंश -
1. जिस प्रकार सभी पर्वतों पर मणि नहीं मिलती, सभी हाथियों के मस्तक में मोती उत्पन्न नहीं होता, सभी वनों में चंदन का वृक्ष नहीं होता, उसी प्रकार सज्जन पुरुष सभी जगहों पर नहीं मिलते हैं।
2. झूठ बोलना, उतावलापन दिखाना, दुस्साहस करना, छल-कपट करना, मूर्खतापूर्ण कार्य करना, लोभ करना, अपवित्रता और निर्दयता - ये सभी स्त्रियों के स्वाभाविक दोष हैं। चाणक्य उपर्युक्त दोषों को स्त्रियों का स्वाभाविक गुण मानते हैं। हालाँकि वर्तमान दौर की शिक्षित स्त्रियों में इन दोषों का होना सही नहीं कहा जा सकता है।
3. भोजन के लिए अच्छे पदार्थों का उपलब्ध होना, उन्हें पचाने की शक्ति का होना, सुंदर स्त्री के साथ संसर्ग के लिए कामशक्ति का होना, प्रचुर धन के साथ-साथ धन देने की इच्छा होना। ये सभी सुख मनुष्य को बहुत कठिनता से प्राप्त होते हैं।
4. चाणक्य कहते हैं कि जिस व्यक्ति का पुत्र उसके नियंत्रण में रहता है, जिसकी पत्नी आज्ञा के अनुसार आचरण करती है और जो व्यक्ति अपने कमाए धन से पूरी तरह संतुष्ट रहता है। ऐसे मनुष्य के लिए यह संसार ही स्वर्ग के समान है।
5. चाणक्य का मानना है कि वही गृहस्थी सुखी है, जिसकी संतान उनकी आज्ञा का पालन करती है। पिता का भी कर्तव्य है कि वह पुत्रों का पालन-पोषण अच्छी तरह से करे। इसी प्रकार ऐसे व्यक्ति को मित्र नहीं कहा जा सकता है, जिस पर विश्वास नहीं किया जा सके और ऐसी पत्नी व्यर्थ है जिससे किसी प्रकार का सुख प्राप्त न हो।
6. जो मित्र आपके सामने चिकनी-चुपड़ी बातें करता हो और पीठ पीछे आपके कार्य को बिगाड़ देता हो, उसे त्याग देने में ही भलाई है। चाणक्य कहते हैं कि वह उस बर्तन के समान है, जिसके ऊपर के हिस्से में दूध लगा है परंतु अंदर विष भरा हुआ होता है।
7. चाणक्य कहते हैं कि जो व्यक्ति अच्छा मित्र नहीं है उस पर तो विश्वास नहीं करना चाहिए, परंतु इसके साथ ही अच्छे मित्र के संबंद में भी पूरा विश्वास नहीं करना चाहिए, क्योंकि यदि वह नाराज हो गया तो आपके सारे भेद खोल सकता है। अत: सावधानी अत्यंत आवश्यक है।
8. चाणक्य का मानना है कि व्यक्ति को कभी अपने मन का भेद नहीं खोलना चाहिए। उसे जो भी कार्य करना है, उसे अपने मन में रखे और पूरी तन्मयता के साथ समय आने पर उसे पूरा करना चाहिए।
9. चाणक्य का कहना है कि मूर्खता के समान यौवन भी दुखदायी होता है क्योंकि जवानी में व्यक्ति कामवासना के आवेग में कोई भी मूर्खतापूर्ण कार्य कर सकता है। परंतु इनसे भी अधिक कष्टदायक है दूसरों पर आश्रित रहना।
10. चाणक्य कहते हैं कि बचपन में संतान को जैसी शिक्षा दी जाती है, उनका विकास उसी प्रकार होता है। इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे उन्हें ऐसे मार्ग पर चलाएँ, जिससे उनमें उत्तम चरित्र का विकास हो क्योंकि गुणी व्यक्तियों से ही कुल की शोभा बढ़ती है।
11. वे माता-पिता अपने बच्चों के लिए शत्रु के समान हैं, जिन्होंने बच्चों को अच्छी शिक्षा नहीं दी। क्योंकि अनपढ़ बालक का विद्वानों के समूह में उसी प्रकार अपमान होता है जैसे हंसों के झुंड में बगुले की स्थिति होती है। शिक्षा विहीन मनुष्य बिना पूँछ के जानवर जैसा होता है, इसलिए माता-पिता का कर्तव्य है कि वे बच्चों को ऐसी शिक्षा दें जिससे वे समाज को सुशोभित करें।
12. चाणक्य कहते हैं कि अधिक लाड़ प्यार करने से बच्चों में अनेक दोष उत्पन्न हो जाते हैं। इसलिए यदि वे कोई गलत काम करते हैं तो उसे नजरअंदाज करके लाड़-प्यार करना उचित नहीं है। बच्चे को डाँटना भी आवश्यक है।
13. शिक्षा और अध्ययन की महत्ता बताते हुए चाणक्य कहते हैं कि मनुष्य का जन्म बहुत सौभाग्य से मिलता है, इसलिए हमें अपने अधिकाधिक समय का वेदादि शास्त्रों के अध्ययन में तथा दान जैसे अच्छे कार्यों में ही सदुपयोग करना चाहिए।
14. जिस प्रकार पत्नी के वियोग का दुख, अपने भाई-बंधुओं से प्राप्त अपमान का दुख असहनीय होता है, उसी प्रकार कर्ज से दबा व्यक्ति भी हर समय दुखी रहता है। दुष्ट राजा की सेवा में रहने वाला नौकर भी दुखी रहता है। निर्धनता का अभिशाप भी मनुष्य कभी नहीं भुला पाता। इनसे व्यक्ति की आत्मा अंदर ही अंदर जलती रहती है।
15. चाणक्य के अनुसार नदी के किनारे स्थित वृक्षों का जीवन अनिश्चित होता है, क्योंकि नदियाँ बाढ़ के समय अपने किनारे के पेड़ों को उजाड़ देती हैं। इसी प्रकार दूसरे के घरों में रहने वाली स्त्री भी किसी समय पतन के मार्ग पर जा सकती है। इसी तरह जिस राजा के पास अच्छी सलाह देने वाले मंत्री नहीं होते, वह भी बहुत समय तक सुरक्षित नहीं रह सकता। इसमें जरा भी संदेह नहीं करना चाहिए।
16. चाणक्य कहते हैं कि जिस तरह वेश्या धन के समाप्त होने पर पुरुष से मुँह मोड़ लेती है। उसी तरह जब राजा शक्तिहीन हो जाता है तो प्रजा उसका साथ छोड़ देती है। इसी प्रकार वृक्षों पर रहने वाले पक्षी भी तभी तक किसी वृक्ष पर बसेरा रखते हैं, जब तक वहाँ से उन्हें फल प्राप्त होते रहते हैं। अतिथि का जब पूरा स्वागत-सत्कार कर दिया जाता है तो वह भी उस घर को छोड़ देता है।
1७. बुरे चरित्र वाले, अकारण दूसरों को हानि पहुँचाने वाले तथा अशुद्ध स्थान पर रहने वाले व्यक्ति के साथ जो पुरुष मित्रता करता है, वह शीघ्र ही नष्ट हो जाता है। आचार्य चाणक्य का कहना है मनुष्य को कुसंगति से बचना चाहिए। वे कहते हैं कि मनुष्य की भलाई इसी में है कि वह जितनी जल्दी हो सके, दुष्ट व्यक्ति का साथ छोड़ दे।
1८. चाणक्य कहते हैं कि मित्रता, बराबरी वाले व्यक्तियों में ही करना ठीक रहता है। सरकारी नौकरी सर्वोत्तम होती है और अच्छे व्यापार के लिए व्यवहारकुशल होना आवश्यक है। इसी तरह सुंदर व सुशील स्त्री घर में ही शोभा देती है।
हृद्यांजलि- सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, आध्यात्मिक एवं तकनीकी आदि।
ब्लॉग संग्राहक- ब्लॉग एग्रीगेटर
करप्ट वर्ल्ड- भ्रष्टों की दुनिया
पत्रकारिता विद्यापीठ- पत्रकारिता सीखने का पोर्टल
देशी उपचार- वैकल्पिक चिकित्सा का पोर्टल
संकलन- हिंदी रचनाओं का संग्रह


साभार- भास्कर.कॉम
पाकिस्तान में ये शख्स लाखों लोगों की उम्मीद है। बेसहारा को सहारा, महरूम की मदद में मशरूफ होकर पीड़ितों के घाव पर मरहम लगाना ही इनका मिशन है। इंसानी खिदमत ही इनका धर्म है।
मानवता का स्कूल, बेसहारा बच्चों के मां-बाप, अस्पताल और भी बहुत कुछ हैं 83 बरस के ये करूणा के देवदूत। मानवता की खिदमत को ही अपना धर्म बना चुके इस शख्स के दंगाग्रस्त इलाके में दस्तक देने मात्र से ही लड़ाइयां रूक जाती हैं। डाकूओं का दिल पिघल जाता है। मानवाता के लिए इनके प्रयास को देखकर आपका दिल भी इनके जज्बे को सलाम करेगा। अपनी सेवा के बदौलत ही ये 16 बार नोबल प्राइज के लिए नामांकित किए जा चुके हैं।
पाकिस्तान के 'फादर टेरेसा'....
अब्दुल सत्तार इदी..पाकिस्तान के 'फादर टेरेसा'....लाखों लोगों की जिन्दगियां इस नाम के साए में महफूज हैं। पाकिस्तान में इनकी प्रतिष्ठा का आलम ये है कि इदी फाउंडेशन की गाड़ियां पहुंचते ही गोलीबारी थम जाती है। कर्फ्यू में इनकी गाड़ियों को कोई खतरा नहीं रहता। दंगा थम जाता है। इनके साए में अमन चैन महफूज रहता है।
कराची, पेशावर हो चाहे ब्लूचिस्तान हर जगह इनको हर धर्म, जाति के लोग इज्जत बख्शते हैं। पर्दा में सदैव रहने वाली औरतें भी जब इनको देखती हैं तो हाथ मिलाकर इनके हाथों को चूम लेती हैं। वह ऐसा महसूस करती हैं कि इनसे मिलना जैसे अल्लाह का फजल हो। इनकी सादा तबियत और बेनियाजी लोगों को काफी प्रभावित करती है।
पाकिस्तान में दूसरे गांधी के नाम से मशहूर
कोई भी धर्म मानवता से बड़ा नहीं होता। यही संदेश देते हैं पाकिस्तान में दूसरे गांधी के नाम से मशहूर, अब्दुल सत्तार इदी। पाकिस्तान में कहीं भी, कभी भी, कोई भी हादसा हो, इदी का मेडिकल एंबुलेंस सबसे पहले पहुंचता है। यह महज संयोग कहें या मिट्टी का असर, पाकिस्तान के इस गांधी का जन्म स्थान भी गुजरात ही है। गुजरात के बंतावा गांव में इदी का जन्म 1928 में हुआ था।
सन् 1947 में भारत विभाजन के बाद उनका परिवार भारत से पाकिस्तान गया और कराची में बस गया। 1951 में आपने अपनी जमा पूंजी से एक छोटी सी दुकान ख़रीदी और उसी दुकान में इन्होंने एक डाक्टर की मदद से छोटी सी डिस्पेंसरी खोली। इसी जमांपूजी से जो भी कमाते खुद सड़क किनारे अपना बसर कर लेते लेकिन बचे हुए पैसों से गरीबों की मदद किया करते थे।
एक बार करांची में फ्लू की महामारी फैली इदी साहेब ने टेंट लगाया और मरीजों को मुफ्त दवाएं बांटी। इतना ही नहीं मरीजों की इतनी सेवा की कि लोगों ने इनके सेवा भाव को देखते हुए इनको बहुत पैसा दिया। इसके बाद अब्दुल सत्तर इदी ने इदी फाउण्डेशन बनाया। आज इदी फाउन्डेशन पाकिस्तान और दुनिया के करीब 13 देशों में कार्यरत है। गिनीज विश्व कीर्तिमान के अनुसार इदी फाउन्डेशन के पास संसार की सबसे बड़ी निजी एम्बुलेंस सेवा हैं।
इस फाउंडेशन के पास 1800 एंबुलेंस, 3 एयरोप्लेन और एक हेलीकॉप्टर है। पूरे देश में करीब 450 केंद्र हैं। इनकी संस्था अभावग्रस्त को सहारा, अनाथों के लिए अनाथालय, मुफ्त अस्पताल, पुनर्वास करना, विकलांग लोगों के लिए बैसाखी, व्ह्लील चेयर उपलब्ध कराना, प्राकृतिक आपदा से ग्रसित लोगों के लिए हर मदद उपलब्ध कराती हैं। इनकी संस्था लंदन और अमेरिका सहित दुनिया के 13 देशों में समाजहित में कार्य करती हैं।
इस संस्था ने करीब 40 हजार नर्सों को ट्रेनिंग दी है। पाकिस्तान में लोग करुणा का देवदूत और पाक का फ़ादर टेरेसा कहते हैं। इन्होंने लाखों अनजान लोगों का दाह संस्कार किया है। उनकी पत्नी बेगम बिलकिस इदी, बिलकिस इदी फाउन्डेशन की अध्यक्षा हैं। पति-पत्नी को सम्मिलित रूप से सन् 1986 का रमन मैगसेसे पुरस्कार समाज-सेवा के लिये प्रदान किया गया था। इन्हें गांधी शांति पुरस्कार 2007 में भारत सरकार ने दिया था। उन्हे लेनिन शान्ति पुरस्कार और बलजन पुरस्कार भी मिले हैं।
करांची की प्रसिद्ध मनोवैज्ञानिक प्राध्यापिका किरण बशीर अहमद के मुताबिक, पाकिस्तान में अब्दुल सत्तार इदी का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। सादा तबियत और बेनियाजी के धनी इदी को इंसानी खिदमत ने काफी शोहरत दी है।
इदी सड़कों के किनारे पड़े हजारों शव का दाह-संस्कार करने के साथ मानवता के हर घाव पर मरहम लगाते हैं। इदी अनाथों की देखभाल सहित उनकी शादी तक का जिम्मा उठाते हैं। मानवता का यह देवदुत केवल पाकिस्तान में ही नहीं बल्कि दुनिया में कहीं भी प्राकृतिक आपदा आए सेवा में हाजिर रहता है। थोड़े शर्मीले इदी, चकाचौंध से दूर ही रहना पसंद करते हैं। पाकिस्तान के लोग शांति के नोबल प्राइज के लिए योग्य व्यक्ति मानते हैं।
आज इदी खानदान के पास जो कुछ भी है वह दुखी इन्सानों पर लुटाने के लिए ही है। इनकी झूला स्कीम.. ने हजारों मासूम बच्चों की जान बचा ली है। बेसहारा लड़कियों की शादी करते वक्त अब्दुल सत्तार इदी की पत्नी बिलकिस खुद छानबीन करती हैं। जब खुद उनको भरोसा हो जाता है तब अपने संस्था में रह रही अनाथ बच्चियों की शादी करती हैं। शादी के रस्मों रिवाज का खास ख्याल रखा जाता है।
शादी में शरीक होने पर ऐसा लगता है कि इनकी अपनी बेटी की ही शादी हो। सभी बच्चों को खुद अपने बच्चों जैसा प्रेम और भाव रखते हैं। एक बार अब्दुल सत्तार इदी के बेटे फैसल ने साइकिल मांगी। इदी साहब ने मना कर दिया। इसके बाद अपने बेटे को समझाते हुए कहा'' मैं सायकिल तभी दूंगा, जब सभी बच्चों को दे पाउं।''

प्रकाश के महत्व का अहसास तब होता है तब हम अंधेरे में होते हैं। हमारे लिए हल्दी, नीम, धनिया, पुदीना, अश्वगंधा, कालमेघ, ब्राह्मी, वासा, अशोक, भृंगराज, जायफल, दालचीनी, अश्वगंधा, मेथी, प्याज, कमल, तरबूजे, घृतकुंवारी, जीरा, अदरक, लहसून, बबूल, कढी पत्ता, दूधिया, तुलसी, तेजपत्र, तिल, दही, दूब, अरबा चावल का महत्व भले ही ना हों(क्योंकि हमें पश्चिमी ब्रांड लुभाता है, ललचाता है, हम किसी अच्छे ब्रांड की खोज कर नहीं सकते), अगर महत्व भी है तो थोड़ा बहुत। क्योंकि दादी- मां-बुआ-दीदी जाने-अनजाने सब्जी, सांभर, दाल, सलाद, ठंडई, लस्सी, लड्डू, चूरमा आदि में डालकर हम तक पहुंचा देती हैं। मगर, इतनी गुणवत्ता, अच्छाई, औषधीय गुण, इनकी निरापदता, इनकी प्राकृतिक उपलब्धता दुनियाभर के लोगों को आश्चर्य में डाल रही हैं, सिर्फ इसलिए वो इनके गुणों की खोज में दिनरात एक किए हुए हैं, इनके औषधीय गुणों की खोज के लिए अरबों खरबों डॉलर शोध कार्यों पर खर्च कर रहे हैं। स्वाभाविक है कि जब वो इतना खर्च करते हैं, इनपर इतनी मेहनत करते हैं तो इसका व्यावसायिक फायदा भी उठाना चाहेंगे।
हम जीवन में खुशहाली भरने वाले इन घरेलू उपयोग की औषधियों से अंजान हैं और इस हमारे इस अनजानेपन का फायदा विदेशी कंपनियां उठा रही हैं। वो इन औषधियों को पेटेंट कराकर अरबों-खरबों कमा रही हैं। हम पर हुकूमत कर रही हैं। करे भी तो क्यों नहीं, वो उस लायक हैं। उन्होंने खुद को इस लायक बनाया है। और एक हम हैं कि इन स्वदेशी चीजों, स्वदेशी सूत्रों, स्वदेशी मूल्यों को पहचान नहीं रहे हैं।
जब हम स्वदेशी की बात करते हैं तो कई लोगों की त्योरियां चढ़ जाती है। वो हमें कूप मंडूक समझने लगते हैं। स्वदेशी का मतलब सिर्फ इस बात से है कि जो चीज हम नहीं बना सकते हैं, अगर उनका कोई विक्लप हमारे पास मौजूद नहीं हो तो हम उनका आयात करें, काफी पैसा खर्च करके भी। मगर, जो चीजें, जो तकनीक हमारे पास है हम उसका आयात क्यों करें। क्यों नहीं हम अपनी तकनीक, अपने ज्ञान को बढ़ावा दें, नई तकनीक की खोज करें, शोध कार्यों पर खूब खर्च करें। हम अपने को आईटी हब घोषित करने पर कितना ही गर्व क्यों न करें। मगर सच्चाई है कि चीन के मुकाबले आईटी के क्षेत्र में हमारा शोध कार्य दसवां हिस्सा भी नहीं है। अगर चीन विश्वशक्ति होने की बात करता है तो ये उस अभिमान नहीं है, मगर हम विश्वशक्ति या सुपर पावर बनने की बात करें तो हमारा दंभ है।
विषयांतर होने के लिए क्षमा करेंगे। तो हम बात कर रहे थे, स्वदेशी औषधियों की, जिसे विदेशी कंपनियां पेटेंट कराने में जुटी हैं। इन औषघियों में छिपे औषधीय गुणों की खोज में वो लगातार जुटी हुई हैं और हम इसकी महत्ता स्वीकारने तक के लिए तैयार नहीं हैं। जब तक हम इसके महत्व को नहीं समझेंगे हम इसपर शोध कर ही नहीं सकते। छोड़िए शोध की बात। हम कहां फंसते जा रहे हैं। सदियों की गुलामी ने हमें मानसिक स्तर पर गुलाम बना दिया है। हम पूरी तरह नकली हो गए हैं। मगर शोध, अध्ययन, खोज, नवीनता की बात सोच भी नहीं सकते। अपने मूल्यों, अपनी परंपराओं, अपनी मान्यताओं पर स्वाभिमान के बजाय हमें इनपर शर्म आती है। शोध करने के लिए ना हमारे पर समय है और ना ही संसाधन। इसकी मानसिकता और इसके लिए धैर्य की परंपरा तो हम कब का खो चुके हैं।
मगर, देश में अब भी कुछ लोग हैं जिन्हें अपने परंपरागत ग्यान पर गर्व है। वो न सिर्फ इसे बचाना चाहते हैं, बल्कि इसे बचाने के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर लंबी लड़ाई लड़ने से भी बाज नहीं आते। ऐसे ही कुछ लोगों के प्रयास से हमारा परंपरागत ग्यान विदेशी कंपनियों के व्यावसायिक चंगुल से बच सका।
डॉ रघुनाथ अनंत माशेलकर जिन्होंने, हल्दी (अमेरिकी पेटेंट संख्या-USP 5,401,5041)और बासमती चावल (USP 5,663,484) को अमेरिकी पेटेंट के चंगुल से मुक्त कराने के लिए लंबी लड़ाई लड़ी और इसे मुक्त भी कराया, ने परंपरागत ग्यान को औद्योगिक ग्यान के समतुल्य माना।
डॉ माशेलकर ने जब हल्दी को अमेरिकी पटेंट मिलने की बात सुनी तो उनकी प्रतिक्रिया आम भारतीयों जैसी नहीं थी। उन्होंने अपने बचपन के दिनों को याद किया। जब उनकी मां ने एक घायल पक्षी को हल्दी का लेप लगाकर उड़ा दिया। डॉ माशेलकर ने सोचा अगर हल्दी में घाव को ठीक करने का औषधीय गुण नहीं होता तो घायल पक्षी ठीक होकर कैसे उड़ जाती। इसी बात ने उस अमेरिकी पटेंट के प्रति उनकी सोच को एक लंबी लड़ाई में बदल दी।
ये लड़ाई इतनी आसान नहीं थी। आप किसी बड़ी अमेरिकी कंपनी से खिलाफ अमेरिका के ही पेटेंट कार्यालय में लडेंगे, इसकी हिम्मत भी जुटा पाना अपने आप में एक बड़ी बात है। फिर इस बात को साबित करना कि हल्दी में औषधीय गुण है और इसे आप सदियों से जानते हैं और इसका प्रमाण प्रस्तुत कर उस अमेरिकी कंपनी को मात देना सूई से छेद से हाथी गुजरने जैसा है। मगर, हिम्मत-ए-मर्द, मदद-ए-खुदा। यानी ईश्वर उसी की मदद करता है जो अपनी मदद खुद करता है। डॉ माशेलकर की टीम ने ये लड़ाई सालों तक लड़ी और हल्दी और बासमती को अमेरिकी पेटेंट से मुक्त कराया।
उस समय एक-एक पेटेंट को मुक्त कराने के लिए औसतन सात से आठ सालों तक लड़ाई लड़नी पड़ती थी। ऐसे में में जरूरत थी- उपलब्ध प्रामाणिक सामग्रियों के एक समग्र दस्तावेजीकरण की। इस दिशा में प्रयास शुरू हुई और विकसित हुई-टीकेडीएल यानी ट्रैडिशनल नॉलेज डिजीटल लाइब्रेरी यानी परंपरागत ग्यान डिजीटल पुस्तकालय।
जैसा कि नाम से ही अस्पष्ट है। यह पुस्तकालय हमारे परंपरागत ग्यान का पुस्तकालय है। हमारे ग्यान की परंपरा हजारों साल पुरानी है। जब दुनिया के ज्यादातर देश में सभ्यता की नींव भी नहीं पड़ी थी, वहां के लोग अग्यान के अंधकार में भटक रहे थे। उस समय भारत में ग्यान की परंपरा अपने स्वर्ण काल में थी। ग्यान की वो परंपरा चर्मोत्कर्ष पर थी। हमारे यहां भगवान धन्वंतरी, आचार्य चरक, सुश्रुत, वरामिहिर, आचार्य जीवक, चाणक्य, बह्मगुप्त, नागार्जुन, आर्यभट्ट जैसे आचार्यों की एक महान परंपरा रही है। दुर्भाग्यवश, कुछ सौ सालों के विदेशी शासन ने हमें एकबार के लिए अंधकारयुग में धकेल दिया और इस समय पश्चिमी दुनिया के देशों ने औद्योगिक क्रांति देखी और हम पर उन्होंने बढ़त बना ली।
आजादी के बाद एक मौका था, उस अंधकारयुग से निकलने का। लेकिन दुर्भाग्यवश हम नवोदित पश्चिमी विकास परंपरा को विकास और ग्यान का अंतिम आधार मान लिया। हमने परंपरागत ग्यान को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। हमने ग्यान की उस महान परंपरागत को न समझने की कोशिश की और ना उसे आगे बढ़ाने। नतीजा विकास और ग्यान का नये मानदंड गढ़ने वालों ने हमारी उस महान परंपरा को एक एक कर अपने नाम पटेंट कराना शुरू कर दिया। नीम, बासमती, गोमूत्र, हल्दी, लहसून, गुलाब, दालचीनी.. एक के बाद एक पटेंटे कराए जाने लगे। जो चीज हमारी थी, पर उस दूसरे लोगों ने कब्जा करना शुरू कर दिया।
ऐसे संक्रमणकाल में डॉ माशेलकर जैसे विभूतियों ने ग्यान के उस अद्भुत भंडार को बचाने का बीड़ा उठाया। डॉ माशेलकर ने परंपरागत ग्यान को औद्योगिक ग्यान का समानांतर और उसी के बराबर बताया।
टीकेडीएल- यानी परंपरागत ग्यान डिजीटल लाइब्रेरी के जरिए उस महान ग्यान परंपरा के एक अंश को सुरक्षित करने की कोशिश हुई। यह लाइब्रेरी- पांच भाषाओं(दुर्भाग्यवश- इनमें हिंदी शामिल नहीं है) यथा- अंग्रेजी, डच, जापानी, फ्रेंच भाषा में उपलब्ध है। यह लाइब्रेरी करीब साढ़े तीन करोड़ पृष्ठों का है। इसमें भारतीय औधषीय प्रणाली आयुर्वेद, यूनानी, सिद्ध चिकित्सा प्रणाली में प्रयुक्त औषधीय पौधों और योगों का कोष तैयार किया। डीकेडील की शुरुआत २००१ में वैग्यानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद यानी सीएसआईआर और आयुष(आयुर्वेद, योग, प्राकृत, युनानी, सिद्ध और होम्योपैथी विभाग) और स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वाधान में हुई। इस कोष का उद्देश्य परंपराग ग्यान को बायो-पाइरेसी और अनैतिक पेटेंट से बचाना है। साथ ही, ग्यान को इलेक्ट्रॉनिक रूप से दस्तावेजीकरण और वर्गीकरण है। ये लाइब्रेरी आधुनिक शोध के लिए भी उपयोगी है।
वर्ष २०१० तक इसमें १४८ किताबों को इलेक्टॉनिक रूप से अंग्रेजी, स्पेनिश, जापानी, फ्रेंच, जर्मन में दस्तावेजीकृत किया जा चुका है। इसमें अस्सी हजार आयुर्वेदिक, दस लाख यूनानी, बारह हजार सिद्ध योगों को शामिल किया जा चुका है। साथ ही, इसने यूरोपीय पेटेंट ऑफिस, ब्रिटानी ट्रेडमार्क एवं पेटेंट ऑफिस, अमेरिकी पेटेंट ऑफिस से समझौता कर रखा है कि वो बायो-पाइरेसी से बचाने के लिए पेटेंट देने से पहले डाटा बेस की जांच कर लें। २००६ में पेटेंट इन ऑफिसों को इस शर्त पर टीकेडीएल की पहुंच दी गई, कि वो इस जानकारी को किसी के सामने उद्घाटित नहीं करेंगे और परंपरागत ग्यान को अवैध तरीके से पटेंट कराए जाने से रोका जा सकेगा।
एक अन्य प्रयास के तहत योग के १५०० आसनों का इलेक्ट्रॉनिक डाटाबेस बनाने की परियोजना २००८ में शुरू हुई। वो इन आसनों के अवैध पटेंट कराए जाने के लिए प्रत्युत्तर में। २००७ करीब १३१ आसनों के पेटेंट अकेले अमेरिका में कराए जा चुके थे। इस पर संसद में हंगामे के बाद भारत ने ये मुद्दा अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर उठाया। योग शिक्षकों, अधिकारियों और वैग्यानिकों की मदद से सीएसआईआर ने करीब पैंतीस ग्रंथों के आधार पर २००९ में १५०० आसनों का डाटाबेस तैयार किया।
इतने वृहत कार्य को करने में मात्र सात करोड़ रुपये खर्च हुए। ये महज एक शुरुआत थी। आगे क्या करना है, इसपर भी नीति-निर्माताओं को सोचने की जरूरत है।

थलसेना प्रमुख जनरल वीके सिंह का जन्म 1950 में नहीं बल्कि 1951 में हुआ। हालांकि सरकार जनरल का जन्म 1950 में होने का दुष्प्रचार कर रही है। जो दस्तावेज सामने आए हैं। वो साबित करते हैं कि राष्ट्रीय रक्षा अकादमी (एनडीए) में मौजूद दस्तावेजों में यही तारीख दर्ज है।
यूपीए सरकार चाहती है कि जनता इस पर विश्वास करे कि जनरल सिंह अपने जन्म का वर्ष 'बदलवाना' चाहते हैं, क्योंकि वह अपना कार्यकाल एक साल बढ़वाना चाहते हैं। जबकि सच इसके उलट है। एनडीए में अपने शुरुआती दौर में जनरल सिंह ने कैडेट के तौर पर अपनी कहानी लिखी थी। इसका पहला वाक्य है, 'मैं 10 मई 1951 को पैदा हुआ।'
सरकार ने उनकी जन्म तिथि 10 मई 1950 मानी है। वहीं, सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका लगाकर अपनी जन्मतिथि 10 मई 1951 होने का दावा किया है। इससे पहले जनरल सिंह के तत्कालीन अंग्रेजी शिक्षक बीएस भटनागर ने भी कहा था कि उनकी गलती से एनडीए का आवेदन भरते समय सिंह की जन्म तारीख 1950 दर्ज हो गई थी। भटनागर ने ही यह फार्म भरा था।
क्या कहता है रिकॉर्ड
-जनरल सिंह के पिता मेजर जगत सिंह की बटालियन 14 राजपूत रेजिमेंट्स ने तीन अगस्त 1965 को प्रमाणित किया है कि सेना प्रमुख का जन्म 10 मई 1951 को हुआ था। सेना की आधिकारिक रिकॉर्ड कीपर एडजुटेंट जनरल ने भी इसी तारीख का उल्लेख किया है।
- राजस्थान सेकंडरी बोर्ड के स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट में भी जन्म तारीख 10 मई 1951 है।
- एयरफोर्स सिलेक्शन बोर्ड में जनरल सिंह ने 1965 में जब पहली बार आवेदन किया था उसके दस्तावेज में भी जन्म की तारीख 10 मई 1951 है।
-जनरल सिंह के स्कूल के स्कॉलर रजिस्टर में भी जन्म की तारीख 1951 बताई गई है।
कानून मंत्रालय में रक्षा मामलों के कानूनी सलाहकार ने साफ कहा है कि स्कूल लिविंग सर्टिफिकेट उम्र को साबित करने का मजबूत साक्ष्य है।
आखिर सरकार एक राष्ट्रभक्त जनरल को जालसाझ साबित करने में क्यों जुटी है.. ये समझना जरा भी मुश्किल नहीं है। क्योंकि ये भ्रष्टचार एक भी ईमानदार व्यक्ति को किसी भी पद पर देख नहीं सकती। क्योंकि एक-एक ईमानदार व्यक्ति उसकी नींद हराम करने के लिए काफी है।