यह
लेख सुप्रीमकोर्ट के पूर्व
न्यायमूर्ति और भारतीय प्रेस
परिषद के अध्यक्ष जस्टिस
मार्कंडेय काट्जू के उस अभिभाषण
का अनुवाद है,
जो
उन्होंने 27
नवंबर
2011को
काशी हिंदी विश्वविद्यालय,
वाराणसी
में दिया था।
जिस
विश्वविद्याल ने ऐसे ऐसे
विद्वानों को पैदा किया है,
जिनकी
ख्याति दुनियाभर में रही है,
उस
विश्वविद्यालय में अभिभाषण
देने के लिए बुलाया जाना मेरे
लिए सम्मान की बात है। वाराणसी,
जो
हजारों सालों से भारतीय संस्कृति
की महान भूमि रही है,
उस
शहर में बुलाया जाना भी मेरे
लिए सम्मान की बात है।
आज
मैंने जिस विषय को चुना है वो
है-
“संस्कृत
भाषा और भारत में वैज्ञानिक
विकास।”
मैंने
ये विषय इसलिए चुना है कि ये
विज्ञान का युग है और इसमें
विकास करने के लिए हमारी जनता
में वैज्ञानिक सोच जागृत करना
आवश्यक है।
आज,
भारत
बड़ी-बडी
सामाजिक,
आर्थिक
और सांस्कृति समस्याओं का
सामना कर रहा है। मेरे विचार
में इन समस्या का समाधान सिर्फ
विज्ञान के जरिए ही किया जा
सकता है। हमें देश के हर भाग
में वैज्ञानिक सोच जागृत करना
होगा। विज्ञान से मेरा मतलब,
सिर्फ
भौतिकी,
रसायन
और जीवविज्ञान नहीं है,
बल्कि
इसका मतलब संपूर्ण वैज्ञानिक
चिंतन धारा से है। हमें अपने
लोगों को बदलना होगा और उन्हें
अत्याधुनिक सोच वाला बनाना
होगा। आधुनिकता से मेरा मतलब
अच्छे सूट या टाई या खूबसूरत
स्कर्ट या जीन्स पहनने से नहीं
है। ऐसे कपड़े पहनने वाले
व्यक्ति भी पुरातनपंथी हो
सकते हैं। आधुनिकता से मेरा
मतलब,
आधुनिक
चिंतनधारा या सोच से है..
इसका
मतलब तार्कित मस्तिष्क से
है.. एक
जिज्ञासु और वैज्ञानिक मस्तिष्क
से है।
भारतीय
संस्कृति का मूलाधार संस्कृत
भाषा पर आधारित है। संस्कृति
भाषा के बारे में एक गलतफहमी
है कि ये भाषा सिर्फ मंदिरों
और धार्मिक समारोहों में
मंत्रोच्चार के लिए है। हालांकि
संस्कृत भाषा का मात्र पांच
फीसदी हिस्सा मंत्र है। जबकि
नब्बे फीसदी से ज्यादा हिस्से
का मंत्र से कोई लेना देना
नहीं है,
इसके
बदले इसमें दर्शन,
विधि,
विज्ञान,
साहित्य,
व्याकरण,
ध्वनिशास्त्र,
व्याख्या
और विश्लेषण है। वास्तव में
संस्कृत स्वतंत्र विचारकों
की भाषा रही है,
जिन्होंने
हर चीज पर सवाल किया और विभिन्न
विषयों पर विस्तृत और बहु-आयामी
विचार रखे। वास्तव में संस्कृत
प्राचीन भारत में हमारे
वैज्ञानिकों की भाषा रही है।
इसमें कोई संदेह नहीं है कि
आज हम विज्ञान की क्षेत्र में
पश्चिमी देशों से पीछे हैं,
लेकिन
एक वक्त था,
जब
भारत विज्ञान के क्षेत्र में
पूरे विश्व का नेतृत्व कर रहा
था। हमारे पूर्वजों की महान
वैज्ञानिक उपलब्धियों का
ज्ञान और हमारे वैज्ञानिक
धरोहर हमें आधुनिक युग में
विज्ञान के क्षेत्र में एकबार
फिर से अग्रिम पंक्ति हासिल
करने के लिए प्रोत्साहन और
नैतिक मनोबल दे सकते हैं।
संस्कृत
शब्द का अर्थ "तत्पर”,
“शुद्ध”,
“सभ्य”
या “संपूर्ण” होता है। संस्कृत
ऐसे ही नहीं "देववाणी"(देवताओं
की भाषा)
कही
जाती थी। हमारी संस्कृति में
इसका अनुपम स्थान रहा है और
पूरे विश्व में इसकी पहचान
एक दुर्लभ उत्तम भाषा की रही
है। संस्कृत हमारे दार्शनिकों,
हमारे
वैज्ञानिकों,
हमारे
गणितज्ञों,
हमारे
कवियों,
हमारे
नाटककारों,
हमारे
व्याकरणाचार्यों,
हमारे
विधिवेत्ताओं की भाषा रही
है। व्याकरण में पाणिनी और
पतंजलि (अष्टाध्यायी
और महाभाष्य के लेखकों)
की
पूरे विश्व में कोई बराबरी
नहीं है। खगोलशास्त्र और गणित
के क्षेत्र में आर्यभट्ट,
बराहमिहिर
और भास्कराचार्य ने मानवता
के लिए ज्ञान के नए क्षेत्र
खोले। ऐसा ही कार्य चिकित्सा
के क्षेत्र में चरक और सुश्रुत
ने किया। दर्शन में गौतम(न्याय
विधि के संस्थापक),
अश्वघोष(बुद्धचरित
के लेखक),
कपिल(सांख्य
विधि के संस्थापक),
शंकराचार्य
और वृहस्पति ने दुनिया को सबसे
विस्तृत दर्शन तंत्र प्रस्तुत
किया,
इससे
पहले कोई और ऐसा नहीं कर सका।
ये दर्शन गहन धार्मिकता से
प्रबल आस्तिकतावादी हैं।
जैमिनी के मीमांसा सूत्र ने
पुस्तकों के तार्किक विश्लेषण
के एक संपूर्ण तंत्र की आधारशिला
रखी,
जिसका
उपयोग ना सिर्फ धर्म के क्षेत्र
में बल्कि विधि,
दर्शन
और व्याकरण के क्षेत्र में
भी होता था। साहित्य के क्षेत्र
में संस्कृत का स्थान सबसे
ऊपर है। कालिदास(अभिज्ञान
शाकुंतलम,
मेघदूत,
मालविकाअग्निमित्रम,
रघुवंश
आदि),
भवभूति(मालती
माधव,
उत्तर
रामायण आदि),
वाल्मिकी
और व्यास के महाकाव्य पूरे
विश्व में प्रसिद्ध हैं। ये
और ऐसे ऐसे अनगिनत संस्कृत
रचनाओं ने हमारे देश में
आधुनिककाल तक पठन-पाठन
की लौ को प्रज्ज्वलित रखा।
इस
अभिभाषण में मैं संस्कृत
साहित्य के उन्हीं भागों की
चर्चा करूंगा जो विज्ञान से
जुड़े हैं।
जैसा
कि मैं पहले ही कह चुका हूं कि
संस्कृति के बारे में ये महान
भ्रांतियां हैं कि यह धार्मिक
समारोहों और मंदिरों में
उच्चारण होने वाले मंत्रों
की भाषा है। हालांकि यह पूरे
संस्कृत वांग्मय का महज पांच
फीसदी हिस्सा है,
शेष
नब्बे फीसदी का धर्म से कोई
लेना देना नहीं है। वास्तव
में संस्कृत हमारे उन तमाम
महान वैज्ञानिकों की भाषा
है,
जिन्होंने
इस भाषा में अपने महान ग्रंथों
की रचना की।
आगे
बढ़ने से पहले मैं थोड़ा विषय
बदलना चाहूंगा। वास्तव में
चर्चा के दौरान में बार-बार
विषयांतर होऊंगा। शुरू-शुरू
में आपको लगेगा कि इस विषयांतर
का चर्चा के मूल विषय यानी
विज्ञान की भाषा के रूप में
संस्कत,
से
कुछ लेना-देना
नहीं है,
लेकिन
चर्चा के अंत में आप पाएंगे
कि इस विषयांतर भी चर्चा के
मुख्य विषय से जुड़ा हुआ है।
पहला
विषयांतर कि भारत क्या है।
हालांकि हम सभी भारतीय हैं,
लेकिन
हममें से कई लोग ऐसे हैं जो
अपने देश के बारे में नहीं
जानते हैं और इसलिए मैं इसकी
व्याख्या करूंगा।
भारत
मुख्यरूप से आप्रवासियों
यानी परदेशियों का देश रहा
है। उत्तरी अमेरिका,
अमेरिका
और कनाडा नए परदेशियों का देश
है,
जो
पिछले चार से पांच सालों में
मुख्य रूप से यूरोप से आए।
जबकि भारत पुरातन आप्रवासियों
का देश है,
जहां
पिछले दस हजार सालों में लोग
आए। शायद भारत में रह रहे पचानवे
फीसदी लोग आप्रवासियों की
संतान हैं जो मुख्यरूप से
उत्तर पश्चिम और कुछ उत्तरपूर्व
से आए। ये तथ्य अपने देश को
जानने की दृष्टि से ज्यादा
महत्वपूर्ण है,
इसलिए
कुछ विस्तार में जाना समीचीन
होगा।विशेष जानकारी के लिए
केजीएफइंडिया डॉट ओआरजी पर,
कालीदास
गालिब एकेडमी फॉर म्युचुअल
अंडरस्टैंडिंग पढें।
लोग
दुर्गम इलाकों से आराम के लिए
सुगम इलाकों में जाते हैं।
यह स्वाभाविक है क्योंकि हर
कोई आराम से जीना चाहता है।
आधुनिक उद्योगों के शुरू होने
से पहले,
हर जगह
कृषि आधारित व्यवस्था हुआ
करती थीं। भारत इसके लिए स्वर्ग
की तरह था,
क्योंकि
कृषि के लिए समतल जमीन,
ऊपजाऊ
मिट्टी,
सिंचाई
के लिए पानी की प्रचूरता,
सामान्य
मौसम की जरूरत होती है,
जो भारत
में पर्याप्त मात्रा में मौजूद
थी। जब यहां ये सब चीजें मौजूद
थी तो भारत के लोग भला दूसरे
देशों में क्यों जाते। अफगानिस्तान
में जीवन कठिन है,
वहां की
जमीनें पहाड़ी व पथरीली हैं,
ज्यादातर
हिस्सा साल के ज्यादातर समय
तक बर्फ से ढका रहता है। ऐसे
में वहां फसल नहीं उगाए जा
सकते हैं। इसलिए,
तमाम
आप्रवासी और आक्रमणकारी भारत
के बाहर से आए,
इनमें
अपवाद वो भारतीय हैं,
जो अंग्रेजी
शासन के दौरान अनुंबधित होकर
विदेश भेजे गए या वैसे भारतीय
जो काम के नए अवसरों की तलाश
में भारत के विकसित देशों में
गए। इतिहास में भारत द्वारा
दूसरे देशों पर आक्रमण का शायद
एक भी उदाहरण हमारे पास मौजूद
नहीं है।
इस
तरह भारत कृषि आधारित अर्थव्यवस्था
का वास्तविक स्वर्ग था। क्योंकि
यहां की जमीनें समतल और ऊपजाऊ
थी। यह सैकड़ों नदियों और
जंगलों की जमीन रही हैं,
जो प्राकृतिक
संसाधनों से भरपूर है। इसलिए
हजारों सालों से दुनियाभर के
लोग भारत में आकर बसते रहे हैं
क्योंकि उन्होंने यहां प्रकृति
के दिए गए उपहारों के बीच अपने
जीवन को आरामदेह पाया।
उर्दू
के महान शायर फिराक गोरखपुरी
लिखते हैं--
“सर
जमीन-ए-हिंद
पर आवाम-ए-आलम
के फिराक़ क़ाफ़िले गुजरते
गए हिंदुस्तान बनता गया”
यानी,
हिंदुस्तान
की सरजमीं पर दुनियाभर के
लोगों का कारवां आता रहा और
भारत का निर्माण होता रहा।
तब
सवाल उठता है कि भारत के मूल
निवासी कौन हैं?
एक समय
ऐसा माना जाता था कि द्रविड़
यहां के मूल निवासी थे।
भारत
के मूल निवासी कौन थे?
एक
समय ऐसा माना जाता था कि द्रविड़
भारत के मूल निवासी थे। हालांकि
आम तौर पर इस दृष्टिकोण को
स्वीकार कर लिया गया है कि
भारत के मूल निवासी पुरा-द्रविड़
अबोरजीन्स थे,
जिनके
वंशज मुंडा भाषा-भाषी
इस समय छोटा
नागपुर,
छत्तीसगढ़,
झारखंड,
ओडीशा,
पश्चिम
बंगाल आदि जगहों पर रहते हैं।
नीलगिरी के तोरा और दूसरे
आदिवासी भारत के मूल निवासी
हैं। भारत में भारत के मूल
निवासियों की संख्या महज पांच
से सात प्रतिशत है। शेष 95
फीसदी
लोग अप्रवासियों के वंशज हैं,
जो
मूल रूप से उत्तर-पश्चिम
से आए हैं। द्रविड़ भी भारत
के बाहर से आये हुए माने जाते
हैं। जो संभवत:
पाकिस्तान
या अफगानिस्तान से आए हं,
इस
सिद्धांत को समर्थन द्रविड़ों
की एक भाषा ब्राहुई से मिलता
है। पश्चिमी पाकिस्तान में
करीब तीस लाख लोग ब्राहुई भाषा
बाते हैं। कैंब्रिज हिस्ट्री
ऑफ इंडिया,
भाग-1
में
इस बात की जानकारी मिलती है।
चूंकि
भारत अप्रवासियों का देश है,
इसलिए
यहां धर्मों,
जातियों,
भाषाओं,
संस्कृतियों
और नस्लों की संख्या इतनी
ज्यादा है। यही वजह है कि कोई
छोटा है तो कोई बड़ा,
कोई
काला है तो कोई गोरा। कोई
काकेशियाई रूप रंग वाला है
तो कोई मंगोलियाई तो कोई
निग्रोयाई। उनके ड्रेस,
खानपान
और अन्य दूसरी चीजों में भी
व्यापक अंतर है।
हम
भारत की तुलना चीन से कर सकते
हैं। चीन आबादी और क्षेत्रफल
दोनों के मामले में भारत से
बड़ा है। चीन की आबादी 135
करोड़
है तो भारत की आबादी 122
करोड़।
क्षेत्रफल से मामले में चीन
भारत से दुगुना बड़ा है। हालांकि
सभी चीनी मंगोलियाई रूप-रंग
वाले हैं। उनकी एक ही लिपि
मंदारिन चीनी है और नब्बे
प्रतिशत लोग एक ही नस्ल के हैं
और हान चीनी कहलाते हैं। इसलिए
चीन में समरूपता है।
दूसरी
ओर, जैसा
कि ऊपर कहा गया है,
भारत
विविधताओं वाला देश है और
हजारों सालों से ये बड़ी संख्या
में अप्रवासियों और आक्रमणकारियों
के भारत आने की वजह से हुआ है।
अप्रवासी और आक्रमणकारी जो
भारत आए,
अपने
साथ विभिन्न तरह की संस्कृति,
भाषा,
धर्म
आदि लाए,
जिसने
यहां विविधता पैदा हुई।
जैसा
कि पहले ही कहा जा चुका है,
भारत
कृषि के लिए आदर्श देश है,
क्योंकि
यहां कि जमीन समतल और उपजाऊ
है, यहां
सिंचाई के लिए पानी की प्रचूरता
है, साथ
ही तापमान भी सामान्य हैं।
ऐसे ही कृषक समाज संस्कृति,
कला
और विज्ञान का विकास हो सकता
है। शुरुआती शिकारी अवस्था
में इनका विकास नहीं हुआ,
क्योंकि
लोगों के पास भोजन जुटाने के
लिए शिकार करना पड़ता था और
वो उसी में अपना सारा समय दे
देते थे। उनके पास सृजनात्मक
कार्यों के लिए समय नहीं बच
पाता था। अस्तित्व के लिए
संघर्ष ने उन्हें सुबह से शाम
तक संघर्ष में व्यस्त रखा और
चिंतन-मनन
के लिए समय नहीं छोड़ा। जब
कृषि की शुरुआत हुई तो इनके
पास स्वतंत्र चिंतन के लिए
समय बचने लगा। चूकिं भारत कृषि
के लिए उत्तम जगह थी,
इसलिए
यहां के लोगों के पास चिंतन
के लिए पर्याप्त समय था।
प्राचीनकाल में भारत में बहुत
सारी बौद्धिक गतिविधियां
होती थीं। साहित्यों में
शास्त्रार्थो के सैकड़ों
उदाहरण मिलते हैं,
जिनमें
बुद्धिजीवी वर्ग बड़ी-बड़ी
सभाओं में अपने विचारों पर
स्वतंत्र चर्चा करते थे।
संस्कृत में विविध विषयों पर
हजारों किताबें लिखी गईं,
लेकिन
कालक्रम में उनमें केवल दस
प्रतिशत किताबें ही इस वक्त
उपलब्ध हैं।
मेरे
विषयांतर होने का मकसद भारत
की भौगोलिक परिस्थितियों की
ओर इंगित करना था जिसने हमारे
पूर्वजों को विज्ञान और संस्कृति
के क्षेत्र में प्रगति के लिए
सक्षम किया। हमारा देश कृषि
के लिए उत्तम था इसलिए लोगों
के पास स्वतंत्र चिंतन के लिए
समय उपलब्ध था।
खगोलशास्त्र,
गणित,
औषधिविज्ञान,
अभियांत्रिकी
और ज्ञान-विज्ञान
के अन्य क्षेत्रों में अपने
पूर्वजों की उपलब्धियों की
चर्चा करने से पहले यहां यह
उल्लेख करना आवश्यक है कि
प्राचीन भारत में विज्ञान के
क्षेत्र में प्रगति में संस्कृत
भाषा का दो महान योगदान है--
महान
वैयाकरणाचार्य पाणिनी ने
शास्त्रीय संस्कृत भाषा का
निर्माण किया,
जिसने
हमारी वैज्ञानिक सोच को अत्यंत
स्पष्ट,
तार्किक
और सुघड़ता(elegance)
पूर्वक
व्यक्त करने में हमें सक्षम
बनाया। तथ्य ये है कि विज्ञान
के लिए स्पष्टता की जरूरत
होती है। विज्ञान के लिए एक
ऐसी लिखित भाषा की जरूरत होती
है, जो
स्पष्ट और तार्किक हो।
इसमें
कोई संदेह नहीं है कि हरजगह
मनुष्य की पहली भाषा बोली गई
भाषा थी,
लेकिन
इससे आगे चिंतन का विकास एक
ऐसे लिखित भाषा के बगैर नहीं
हो सकता है,
जिसे
स्पष्टता से व्यक्त किया जा
सके। वैज्ञानिक अपने मस्तिष्क
में नए विचारों को सोच सकता
है,
लेकिन
ये विचार दिमाग में भ्रमणशील,
विसरित
और असंगठित ही रह जाएंगे,
जब
तक इन्हें लिखित रूप में दर्ज
नहीं किया जाए। लिखकर हम अपने
विचारों स्पष्टता देते हैं
और उन्हें संगत और तार्किक
क्रम देते हैं। लिखित भाषा
एक गणितीय प्रमेय की तरह होता
है,
जिसका
प्रत्येक तार्किक चरण पिछले
चरण का अनुगामी होता है।
विज्ञान
और वैज्ञानिक विकास को समर्थन
और बढ़ावा देने के लिए,
विज्ञान
की प्रगति के लिए एक दर्शन की
जरूरत होती है।
पहले
विंदु के संदर्भ में विचार
करने लिए मैं थोड़ा और विषयांतर
होना चाहूंगा और थोड़ी गहराई
में जाकर संस्कृत भाषा के
विकास के बारे में थोड़ा बताना
चाहूंगा।
सच्चाई
है कि संस्कृत सिर्फ एक भाषा
नहीं है,
बल्कि
संस्कृत कई हैं। जिसे आज हम
संस्कृत कहते हैं वास्तव में
वो पाणिनी की संस्कृत है और
यह शास्त्रीय संस्कृत या लौकिक
संस्कृत के नाम से जाना जाता
है और जो हमारे स्कूलों और
विश्वविद्यालयों में आजकल
पढ़ाई जाती है और इसी भाषा में
में हमारे वैज्ञानिकों ने
अपनी महान कृतियों की रचना
की। हालांकि इससे पहले भी कई
संस्कृत थीं,
जो
शास्त्रीय संस्कृत से थोड़ी
अलग थीं।
संस्कृत
की सबसे पुरानी कृति ऋग्वेद
है। इसकी रचना शायद ईसापूर्व
2000 साल
पहले हुई थी। हालांकि,
तब
से ये मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी
चलती रही। गुरुकुलों में गुरु
के साथ मंत्रोच्चार और सतत्
अभ्यास के जरिए इसके श्लोकों
को याद रखा जाता था। ऋग्वेद
हिंदुओं का सबसे पवित्र ग्रंथ
है और देवताओं,
इंद्र,
अग्नि,
सूर्य,
सोम,
वरुण
को समर्पित 1028
ऋचाएं
हैं।
भाषा
समय के साथ परिवर्तित होती
रहती है। उदाहरण के लिए शेक्सपीयर
के नाटकों को अच्छी व्याख्याओं
के बगैर समझना मुश्किल है
क्योंकि शेक्सपीयर ने सोलवीं
सदी में इसकी रचना की थी,
तब
से अंग्रेजी भाषा में काफी
बदलाव आया है। बहुत से शब्द
और अभिव्यक्तियां जो उन समय
प्रचलन में थे अब प्रचलन में
नहीं है। इसलिए हम शेक्सपीयर
की रचनाओं को अच्छी व्याख्याओं
के बगैर नहीं समझ सकते हैं।
इसी
तरह पिछले चार हजार सालों में
संस्कृत भाषा में भी बहुत से
बदलाव आए। ईसापूर्व पांचवीं
सदी में महान वैयाकरणाचार्च
पाणिनी,
जो
शायद विश्व के सबसे बड़े
वैयाकरणाचार्य थे,
ने
अष्टाध्यायी(आठ
अध्याय वाली पुस्तक)
की
रचना की थी। इस पुस्तक में
पाणिनी ने संस्कृत के नियमों
को निर्धारित किया। तब से
संस्कृत में ज्यादा बदलाव की
अनुमति नहीं दी गई। कात्यायन
और पतंजलि ने थोड़े से बदलाव
किए। कात्यायन ने वर्तिका
नाम से पुस्तक लिखी और पतंजलि
ने महाभाष्य नाम से अष्टाध्यायी
की व्याख्या लिखी। इन दो बदलावों
को छोड़ दें तो संस्कृत वैसी
ही है,
जैसा
कि पाणिनी की संस्कृत यानी
शास्रीय संस्कृत थी।
पाणिनी
ने उस समय तक उपलब्ध संस्कृत
भाषा की सभी कृतियों को
सावधानीपूर्वक अध्ययन किया
और फिर उन्होंने उनका परिष्करण,
परिमार्जन
और सुसंगठित किया ताकि इस भाषा
को अत्यंत तार्किक,
सुस्पष्ट
और शिष्ट (Logic,
precision and elegance) बनायी
जा सके। इस तरह पाणिनी ने
संस्कृत को अभिव्यक्ति का
अति विकसित और शक्तिशाली वाहन
बना दिया,
जिसमें
वैज्ञानिक सोच और सिद्धांतों
को अत्यंत सुस्पष्टता और
शिष्टता से अभिव्यक्त किया
जा सकता है। इस भाषा को पूरे
भारत में एक जैसा स्वरूप दिया
गया ताकि पूरब,
पश्चिम,
उत्तर
और दक्षिण के विद्वान एक दूसरे
की बात को आसानी से समझ सकें।
मैं
यहां अष्टाध्यायी के बारे
में विस्तार से चर्चा नहीं
करूंगा,
लेकिन
इस संबंध में मैं एक उदाहरण
दूंगा।
अंग्रेजी
भाषा में ए से जेड तक के वर्णों
को (वर्णमाला)
किसी
तार्किक या न्यायसंगत तरीके
से नहीं रखा गया है। इसके पीछे
कोई तर्क नहीं है कि एफ के बाद
जी क्यों आता है या फिर पी के
बाद क्यू को क्यों रखा गया है।
अंग्रेजी के वर्णों को बेतरतीब
तरीके से कहीं का कहीं रख दिया
गया है। वहीं दूसरी ओर पाणिनी
ने अपने पहले पंद्रह सूत्रों
में,
मानव
द्वारा शब्दों के उच्चारण के
ध्वनियों के आधार पर देवनागरी
वर्णों को बहुत ही वैज्ञानिक
और तार्किक ढंग से रखा है।
उदारहण
के लिए,
स्वर
वर्ण,
अ,
आ,
ई,
ई,
उ,
ऊ
ए, ऐ,
ओ,
औ
आदि के उच्चारण के समय मुखाकृतियों
के आधार पर रखा गया है। अं और
आ कंठ से उच्चरित होते हैं,
इ
और ई तालू से,
ओ
और औ ओठ से आदि। इसी तरह व्यंजन
वर्णों को भी वैज्ञानिक तरीके
से सजाया गया है। क-वर्ण
में क,
ख,
ग,
घ
का उच्चारण कंठ से,
च-वर्ण,
च,
छ,
ज,
झ
का उच्चारण तालू से,
त-वर्ग
के वर्णों का उच्चारण मुंह
से और त-वर्ग
के वर्णों का उच्चारण दांत
से और प-वर्ग
के वर्णों का उच्चारण ओष्ठ
से होता है।
मेरे
कहने का मतलब है कि दुनिया की
किसी भी भाषा में वर्णों को
इतने विवेकसंगत और सुसंगठित
तरीके से नहीं रखा गया है।
हमारे पूर्वजों ने वर्ण जैसी
अत्यंत साधारण विषय को इतनी
गंभीरता से लिया है तो आसानी
से समझा जा सकता है कि उन्होंने
और भी उच्चस्तरीय विषयों का
कितनी गंभीरता से अध्ययन किया
होगा।
जैसा
कि पहले ही कहा जा चुका है कि
पाणनी का संस्कृत शास्रीय
संस्कृत कहलाता है यह वैदिक
संस्कृत से अलग है। वैदिक
संस्कृत वो हैं जिनमें वेद
लिखे गए हैं।
यहां
मैं थोड़ा और विषयांतर होना
चाहूंगा और वेद का अर्थ बताऊंगा,
यहां
पाणिनी को समझने के लिए ये
विषयांतर जरूरी है।
वेद
या श्रुति के चार अंग हैं-
संहिता
या मंत्र-
इसके
अंतर्गत चार ग्रंथ ऋग्वेद,
यजुर्वेद,
सामवेद
और अथर्ववेद हैं। संहिता का
मतलब संग्रह है। जैसा कि पहले
ही कहा जा चुका है कि ऋग्वेद
स्तुतियों का संग्रह है।
ऋग्वेद ही प्रधान वेद है।
इसकी रचना पद्य श्लोकों में
हुई है,
जिसे ऋचाएं
कहा जाता है। सामवेद के दो-तिहाई
ऋचाएं ऋग्वेद से ली गई हैं और
ये संगीत का समुच्चय है। कुछ
लोगों का मानना है कि अथर्ववेद
को संहिताओं में बाद में शामिल
किया गया और पहले ऋग्वेद,
युजुर्वेद
और सामवेद मिलकर वेद-त्रयी
कहलाते थे।
ब्राह्मण-
ये ग्रंथ
गद्य हैं,
जिनमें
यज्ञ करने की विधियों का वर्णन
है। प्रत्येक ब्राह्मण कुछ
संहिताओं से जुड़ा हुआ है।
ऐत्रेय ब्राह्मण और कौशितेकी
ब्राह्मण ऋग्वेद से,
तांड्य
ब्राह्मण सामवेद से,
शतपथ
ब्राह्मण और गोपथ ब्राह्मण
यजुर्वेद से जुड़ा हुआ है।
जैसा कि पहले कहा गया है कि
ब्राह्मण ग्रंथ गद्य है,
जबकि
संहिता पद्य हैं।
अरण्यक-
ये वन्य
पुस्तके हैं,
जिसमें
दार्शनिक विचारों का खजाना
छुपा हुआ है,
हालांकि
ये विचार अविकसित रूप में ही
हैं।
उपनिषद-
इन्हें
दार्शनिक चिंतन का विकसित
स्वरूप माना जाता है।
संहिता,
ब्राह्मण,
अरण्यक
और उपनिषदों के समग्र रूप से
वेद या श्रुति कहा जाता है।
ब्राह्मण
ग्रंथों की रचना संहिताओं के
बाद हुई और इसकी भाषा संहिताओं
के कुछ अलग है,
क्योंकि
समयांतर में संस्कृत भाषा
में बदलाव आया। इसी तरह अरण्यक,
ब्राह्मण
ग्रंथों के बाद लिखे गए लिहाजा
इसकी भाषा ब्राह्मण ग्रंथों
से अलग है। इसी तरह उपनिषदों
की भाषा संहिताओं की भाषा से
काफी अलग है। उपनिषद की भाषा
पाणिनी की संस्कृत के काफी
करीब है।
पाणिनी
ने जब अष्टाध्यायी की रचना
की, इसके
बाद संपूर्ण पुरा-वैदिक
साहित्य पाणिनी के व्याकरण
के अनुसार लिखा जाने लगा,
यहां तक
की बहुत से पहले के ग्रंथों
को भी पाणिनी की संस्कृत के
अनुरूप बनाया गया।
वैदिक
साहित्य संपूर्ण संस्कृत
साहित्य का मात्र एक प्रतिशत
है और निन्यानबे प्रतिशत
संस्कृत साहित्य गैर-वैदिक
है। उदाहरण के लिए,
अतिसम्मानीय
ग्रंथ रामायण,
महाभारत,
पुराण और
कालिदास की रचनाएं वैदिक
साहित्य के अंग नहीं हैं। कुछ
शब्दों और संप्रेषणों को छोड़
दें तो आज के सभी गैर-वैदिक
साहित्य पाणिनी के व्याकरण
के अनुरूप हैं। अपवाद स्वरूप
बचे अपभ्रंश साहित्य पाणिनी
के व्याकरण के अनुरूप नहीं
है, इसलिए
उन्हें छोड़ दिया गया।
उदाहरण
के लिए महाभारत का कुछ हिस्सा
पाणिनी से पहले लिखा गया क्योंकि
अष्टाध्यायी में पाणिनी ने
महाभारत का उल्लेख किया।
पाणिनी से पहले लिखे गए महाभारत
के अंशों को भी पाणिनी के
व्याकरण के अनुकूल बनाया गया।
हालांकि
ऋग्वेद की भाषा में किसी तरह
के बदलाव या पाणिनी के व्याकरण
के मुताबिक बनाने की अनुमति
नहीं थी। पाणिनी या कोई और
ऋग्वेद को नहीं छू सके,
क्योंकि
वेद को अपौरूषेय यानी अत्यंत
पवित्र माना जाता है और इसकी
भाषा में किसी तरह के बदलाव
की अनुमति नहीं थी। दरअसल,
शायद
ईसापूर्व 2000
ईस्वी में
जब ऋग्वेद की रचना हुई तब से
इसे कभी नहीं लिखा गया और इसे
गुरू से शिष्यों तक
मौखिक रूप से पीढ़ी-दर-पीढ़ी
आगे बढ़ाया जाता रहा।
इसलिए
वैदिक साहित्य पाणिनी के
व्याकरण के अनुसार नहीं है।
हालांकि शेष 99
प्रतिशत
गैर-वैदिक
संस्कृत साहित्य पाणिनी के
व्याकरण के अनुरूप ही है,
जिनमें
महान वैज्ञानिक कृतियां भी
शामिल हैं। ऐसा मानक बनाने
या एकरूपता कायम करने के लिए
किया गया। इस भाषा को इस तरह
से सुसंगठित किया गया कि विद्वान
अपने विचारों को अत्यंत स्पष्टता
के साथ अभिव्यक्त और संचरित
कर सकें। यह विज्ञान के विकास
के लिए परम आवश्यक था।
इसमें
कोई संदेह नहीं है कि बोलियां
काफी महत्वपूर्ण होती हैं
लेकिन बोलियां हर पचास से सौ
किलोमीटर में बदल जाती है और
उनमें कोई एकरूपता नहीं होती
है। एक लिखित भाषा जैसे शास्त्रीय
संस्कृत में,
विद्वान
अपने विचार को दूसरे विद्वानों
के साथ अत्यंत संक्षेप और
स्पष्टता से अभिव्यक्त और
संचरित कर सकते हैं,
जो
कि विज्ञान के विकास के लिए
परम आवश्यक है और यह पाणिनी
की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
प्राचीन
भारत में विज्ञान के विकास
में पाणिनी के बाद अगर किसी
का सबसे ज्यादा योगदान है तो
वो है वैज्ञानिक दर्शन का।
यहां मैं आपको भारतीय दर्शन
के बारे में कुछ बताना चाहूंगा,
इसलिए
मैं यहां थोड़ा और विषयांतर
होना चाहूंगा।
यह
सर्वमान्य विचार है कि शास्त्रीय
भारतीय दर्शन (शत
दर्शन)
के
छह अंग है और अशास्त्रीय भारतीय
दर्शन के तीन अंग हैं। शास्त्रीय
भारतीय दर्शन के छह अंगों के
नाम न्याय,
वैशेषिक,
सांख्य,
योग,
पूर्व
मीमांसा और उत्तर मीमांसा
(यानी
वेदांत)
हैं
जबकि अशास्त्रीय भारतीय दर्शन
के नाम बौद्ध दर्शन,
जैन
दर्शन और चार्वाक दर्शन हैं।
यहां
शतदर्शन यानी शास्त्रीय भारतीय
दर्शन का उल्लेख संक्षेप में
किया जा रहा है।
न्याय-
यह
वैज्ञानिक दृष्टिकोण प्रस्तुत
करता है। यह इस बात पर जोर देता
है कि ऐसा कुछ भी मान्य नहीं
होना चाहिए जो तर्क और अनुभव
से परे हो।
वैशेषिक-
यह
परमाणु सिद्धांत प्रस्तुत
करता है।
सांख्य-
यह
संभवत:
न्याय
वैशेषिक सिद्धांत की तत्व
मीमांसा करता है। हालांकि
मूल सांख्य दर्शन का बहुत कम
हिस्सा ही इस समय उपलब्ध है।
इसके मूल सिद्धांत पर भी विवाद
है। कुछ लोग इसे द्वैत मानते
हैं जबकि कुछ अद्वैत क्योंकि
इसके दो तत्व हैं-पुरूष
और प्रकृति।
योग-
यह
शारीरिक और मानसिक अनुशासन
को प्रस्तुत करता है।
पूर्व
मीमांसा या संक्षिप्त मीमांसा-
यह
आध्यात्मिक और सांसारिक
लक्ष्यों की प्राप्ति हेतु
यज्ञ की महत्ता पर जोर देता
है। इसलिए वेद के ब्राह्मण
भाग पर निर्भर है।
- उत्तर
मीमांसा(वेदांत)-यह
ब्रह्मयान पर जोर देता और वेद
के उपनिषद हिस्से पर आधारित
है।
दर्शन
के शास्त्रीय और अशास्त्रीय
तंत्र में सिर्फ इतना अंतर
है कि पहला वेद के अस्तित्व
को स्वीकार करता है,
जबकि
दूसरा नहीं। हालांकि गहन
पड़ताल से साबित होता है कि
शास्त्रीय तंत्र का पहले चार
तंत्र भी वेद के अस्तित्व को
स्वीकार नहीं करते हैं जबकि
कुछ तो सिर्फ इसका दावा करते
हैं। सिर्फ पूर्व मीमांसा और
उत्तर मीमांसा वेद पर आधारित
हैं।
यहां
न्याय और वैशेषिक अंगों को
छोड़कर बाकी का उल्लेख जरूरी
नहीं हैं,
क्योंकि
यही वैज्ञानिक दृष्टिकोण को
प्रस्तुत करते हैं। न्याय
दर्शन के मुताबिक,
ऐसा
कुछ भी स्वीकार नहीं किया जाना
चाहिए जो तर्क और अनुभवजन्य
नहीं हो और ये बात वैज्ञानिक
सत्य है। (इस
संबंध में डीपी चटोपाध्याय
की कृति भारतीय दर्शन में क्या
जीवित और क्या मृत ”ह्वाट इज
लीविंग एंड ह्वाट इज डेड इन
इडियन फिलोसॉफी”)
का
अध्ययन उचित होगा। वैशेषिक
परमाणु सिद्धांत प्रस्तुत
करता है,
जो
प्राचीन भारत का भौतिकी विज्ञान
है। मूल रूप से न्याय और वैशेषिक
एक ही दर्शन माने जाते हैं।
चूकि भौतिकी को सभी विज्ञानों
में सबसे ज्यादा मौलिक माना
जाता है इसलिए वैशेषिक दर्शन
को न्याय से अलग कर दिया गया
है और इसे एक अलग दर्शन के रूप
में प्रस्तु किया गया है।
यहां
यह उल्लेखनीय है कि सांख्य
दर्शन न्यायिक दर्शन से भी
पुराना है लेकिन इसपर पर बहुत
ही कम मौलिक साहित्य उपलब्ध
है।(सांख्य
करिका और सांख्य सूत्र और इस
पर कुछ व्याख्याओं को छोड़कर)।
हालांकि हम मानते हैं कि सांख्य
दर्शन ने ही भौतिक दर्शन को
एक आधार प्रदान किया है जिस
पर न्याय और वैशेषिक दर्शन
का वैज्ञानिक आधार निर्मित
हुआ है। इसलिए समग्र रूप से
हम इसे सांख्य-न्याय
और वैशेषिक दर्शन कह सकते हैं।
चूकि हम न्याय और वैशेषिक के
बारे में बहुत कुछ जानते हैं
इसलिए सांख्य को जानने के बारे
में भी दावा कर सकते हैं।
न्याय-वैशेषिक
दर्शन यथार्थवादी और बहुवादी
है। यह शंकराचार्य के अद्वैत
वेदांत के विपरीत है जो संसार
को माया मानता है वहीं वहुवाद
अद्वैत के विपरीत है। अद्वैत
का अर्थ,
संसार
में सिर्फ और सिर्फ बह्म ही
सत्य है बाकी सब मिथ्या यानी
माया है। वहीं,
न्या-वैशेषिक
दर्शन के कहना है कि दुनिया
में कई चीजें जो वास्तविक हैं
और ये दुनिया सिर्फ एक चीज से
नहीं बनी है बल्कि यहां बहुत
सी चीजें हैं। इसलिए न्याय
दर्शन बहुवादी और द्वैत है।
यहां
थोड़ा और विषयांतर होकर दर्शन
के बारे में बताना चाहूंगा।
दर्शन
की दो प्रमुख शाखाएं हैं-
तत्व
मीमांसा और दूसरा ज्ञान मीमांसा।
तत्व मीमांसा अस्तित्व की
चर्चा करता है। तत्व मीमांसा
के अंतर्गत सवाल उठते हैं कि
किसका अस्तित्व है। क्या ईश्वर
का अस्तित्व है। क्या इस संसार
का अस्तित्व है या संसार माया
है। यह वास्तव में है और क्या
नहीं आदि-आदि।
ज्ञानमीमांसा
वास्तविक ज्ञान की चर्चा करता
है। उदारहण के लिए,
हम
किस तरह से जानते हैं कि जो
चीज हमारे सामने हैं वौ वास्तविक
है। इसका उत्तर है कि ये वस्तु
प्रत्यक्ष है। मैं इसे अपनी
आंखों से देख सकता हूं। प्रत्यक्ष
वो ज्ञान है जो पांच ज्ञान
इंद्रियों द्वारा ग्रहित की
जाती हैं। प्रत्यक्ष प्रमाण
को प्रधान प्रमाण के रूप में
स्वीकार किया जाता है। यह सभी
वैध ज्ञान का सबसे मौलिक तत्व
है।

हालांकि
दूसरे प्रमाण भी हैं जैसे
अनुमान(हस्तक्षेप),
शब्द(विशेषज्ञ
या अधिकृत व्यक्ति की उक्ति)
आदि।
इसलिए अधिकतर वैज्ञानिक ज्ञान
अनुमान प्रमाण से संबंध रखता
है। उदाहरण के लिए,
रदरफोर्ड
ने अपनी आंखों से परमाणु को
नहीं देखा,
लेकिन
अल्फा किरणों(
धनात्मक
हिलियम आयन है)
विचलन
का अध्ययन कर अनुमान प्रमाण
के आधार निर्णय किया कि परमाणु
के नाभिक में धनात्मक कण हैं,
जिसके
चारों ओर ऋणात्मक इलेक्ट्रॉन
चक्कर लगाता है। ठीक इसी तरह
प्रत्यक्ष प्रमाण के आधार पर
ब्लैक होल यानी कृष्ण विवर
को भी जाना नहीं जा सकता
है(क्योंकि
इससे प्रकाश नहीं निकलता),
लेकिन
आकाशीय पिंडों पर अदृष्य
पिंडों के गुरुत्वाकर्षण बल
की मौजूदगी के आधार पर हम ब्लैक
होल या कृष्ण विवर की मौजूदगी
का अनुमान लगाते हैं।
न्याय-मीमांसा
के ज्ञान-मीमांसा
में तीसरा प्रमाण है शब्द
प्रमाण। यह किसी भी खास क्षेत्र
में विशेषज्ञ या प्रतिष्ठित
या अधिकृत व्यक्ति का वाक्य
है। हम इनके प्रमाण को नहीं
समझ पाने के बावजूद ऐसे वाक्यों
को सत्य मानते हैं,
क्योंकि
जिसने ऐसा कहा है उसकी उस
क्षेत्र में प्रतिष्ठा है।
उदारहण
के लिए E=MC2
को
बतौर शब्द प्रमाण के रूप में
स्वीकार करते हैं क्योंकि यह
कथन आइँस्टीन का है,
जिन्होंने
सैद्धांति भौतिकीविद् के रूप
में प्रतिष्ठा पाई है। हालांकि
हम अभी ये समझ नहीं पाये हैं
कि वो किस तरह इस समीकरण पर
पहुंचे(इसके
लिए उच्च गणित और भौतिक ज्ञान
की आवश्यकता है जो हमारे पास
नहीं है)।
ठीक इसी तरह हम डॉक्टर की बात
को भी स्वीकारते हैं क्योंकि
वो रोग विशेषज्ञ है।
न्याय-मीमांसा
का अगला प्रमाण उपमा है,
लेकिन
यहां इसके वर्णन की जरूरत नहीं
है।
जैसा
कि पहले ही कहा जा चुका है कि
न्याय-दर्शन
वैज्ञानिक दृष्टिकोण को
प्रस्तुत करता है और यह प्रत्यक्ष
प्रमाण पर ज्यादा जोर देता
है(हालांकि
कभी-कभी
ये भी भ्रमपूर्ण या मृग-मारीचिका
जैसा हो सकता है)
यही
आधार विज्ञान का भी है क्योंकि
विज्ञान में हम निरीक्षण,
परीक्षण
और तार्किक व्याख्या पर जोर
देते हैं।
ये
भी कहा जा सकता है कि यह जरूरी
नहीं है कि प्रत्यक्ष प्रमाण
हर मामले में सत्य का ज्ञान
दे। उदाहरण के लिए हम देखते
हैं कि सुबह में सूर्य पूर्व
से उदित होता है,
दोपहर
में यह हमारे सिर के ऊपर आ जाता
है और शाम में यह पश्चिम में
अस्त हो जाता है। अगर हम सिर्फ
प्रत्यक्ष प्रमाण पर निर्भर
करें तो हमारा निष्कर्ष होगा
कि सूर्य पृथ्वी के चारों ओर
चक्कर लगाता है,
हालांकि
महान वैज्ञानिक और खगोलशास्त्री
आर्यभट्ट ने अपनी पुस्तक
आर्यभट्टियम में लिखा है कि
अगर हम माने कि पृथ्वी अपने
अक्ष पर धूम रही है तो ऐसा ही
दृश्यगत प्रभाव उत्पन्न होगा।
दूसरे शब्दों में अगर पृथ्वी
अपने अक्ष पर घूर्णन कर रही
है तो प्रतीत होगा कि सूर्य
पू्र्व उदित होता है और पश्चिम
में अस्त होता है। इसलिए
प्रत्यक्ष प्रमाण के अलावा
हम तर्कबुद्धि का भी इस्तेमाल
करते हैं क्योंकि अकेले निरीक्षण
हमें सत्य ज्ञान की ओर नहीं
ले जाएगा।
यह
कहा जा सकता है कि न्याय-दर्शन
ने तर्क और विज्ञान के आवश्यक
तार्किक चिंतन को अरस्तु और
अन्य ग्रीक विचारकों से भी
विकसित रूप में प्रस्तुत
किया(देखे
डीपी चट्टोपाध्यय की
पुस्तक)।
इसप्रकार,
प्राचीन
भारत में न्याय दर्शन ने विज्ञान
के विकास को अहम समर्थन और
प्रोत्साहन दिया। यह उल्लेख
किया जा सकता है कि न्याय दर्शन
एक सत दर्शन है यानी भारतीय
दर्शन के छह परंपरागत दर्शनों
में से एक। यह चार्वाक जैसे
गैर-परंपरागत
दर्शन का हिस्सा नहीं है। यही
कारण है कि हमारे महान वैज्ञानिक
परंपरावादियों द्वारा तंग
या परेशान नहीं किए गए क्योंकि
वो कह सकते थे कि वो जो कुछ कर
या कह रहे हैं वो परंपरागत
दर्शन यानी न्याय-दर्शन
पर आधारित है। यह यूरोप के
परंपरावादी चिंतन से बिल्कुल
अलग है,
जहां
महान वैज्ञानिक गैलिलियो को
चर्चों द्वारा परेशान किया
गया क्योंकि उनका चिंतन और
काम बाइबिल से अलग था। भारत
के साथ ऐसा हादसा नहीं हुआ,
यहां
की परंपरावादी सोच ही वैज्ञानकि
विचार,
तर्क
या तर्क विज्ञान का समर्थन
करती है।
प्राचीन
भारत
में हर कहीं वाद-विवाद
या शास्रार्थ होते थे,
जिसमें
बड़ी बड़ी सभाओं में विचारों
पर तर्क-वितर्क,
दूसरे
विचारों की आलोचना और विरोध
की अनुमति थी। विचारों और
अभिव्यक्ति की ऐसी स्वतंत्रता
ने विज्ञान के विकास में अहम
योगदान दिया क्योंकि विज्ञान
के लिए स्वतंत्रता,
चिंतन
की स्वतंत्रता,
अभिव्यक्ति
की स्वंतत्रता और असहमति की
स्वतंत्रता की आवश्यकता होती
है। महान वैज्ञानिक चरक ने
अपनी पुस्तक चरक संहिता में
लिखा है कि विज्ञान के विकास
के लिए वाद-विवाद,
खासकर
समान मानसिक स्तर वालों के
बीच वाद-विवाद
या शास्रार्थ परम आवश्यक
है।
प्राचीन
न्याय शास्रों,
जिनमें
गौतम का न्याय सूत्र में
वाद-विदाद
के कई तरीकों का वर्णन है जैसे,
वद,
जल्प,
वितंड
आदि। गौतम के बाद के न्याय
दर्शन के जानकारों ने इसे और
परिमार्जित किया।
विज्ञान
के प्रगति और विकास को प्रोत्साहित
करने वाले दो कारकों के उल्लेख
के बाद अब हम अपने महान वैज्ञानिकों
द्वारा विज्ञान के विभिन्न
विषयों में योगदान की चर्चा
करते हैं।
गणित
गणित
के क्षेत्र में प्राचीन विश्व
की सबसे महान और क्रांतिकारी
वैज्ञानिक उपलब्धियों में
दाशमिक प्रणाली का नाम सबसे
ऊपर है। यूरोपीय लोगों द्वारा
दाशमिक अंक प्रणाली को अरबी
अंक प्रणाली नाम दिया गया,
लेकिन
अरबी विद्वान इसे हिंदू अंक
प्रणाली मानते हैं। क्या ये
अरबी अंक प्रणाली है या हिंदू।
इस संदर्भ में यह उल्लेख करना
आवश्यक है कि ऊर्दू,
फारसी
और अरबी भाषाएं दायीं से बायीं
ओर लिखी जाती है,
लेकिन
अगर आप इन भाषायों को बोलने
वाले लोगों से कोई संख्या,
मान
लीजिए 257
लिखने
के लिए कहिए तो इस संख्या को
बायीं से दायीं ओर ही लिखेंगे।
यह दिखाता है कि ये संख्याएं
उस भाषा से ली गई है जो बायीं
से दायीं ओर लिखी जाती है। अब
यह मान्य हो चुका है कि ये
संख्याएं भारत से आई हैं और
अरबों ने हमसे इसका नकल किया
है।
अब
मैं
दाशमिक
प्रणाली के क्रांतिकारी महत्व
का जिक्र करूंगा। जैसा कि हम
सभी जानते हैं कि प्राचीन रोम,
जार
और अगस्तस की सभ्यता निस्संदेह
एक महान सभ्यता थी,
मगर
आप अगर किसी प्राचीन रोमन से
एक मिलियन लिखने के लिए कहेंगे
तो वो पागल हो जाएगा,
क्योंकि
एक मिलियन लिखने के लिए उसे
एक मिलेनियम या एक हजार(इसका
प्रतीक M)
उसे
एक हजार बार लिखना पड़ेगा।
रोमन अंक प्रणाली में एक हजार
यानी M
से
बड़ा अंक नहीं होता है। उसे
दो हजार लिखने के लिए दो बार
MM
लिखना
पड़ेगा। तीन हजार लिखने के
लिए तीन बार MMM
लिखना
पड़ेगा। इसी तरह एक मिलियन
यानी दस लाख लिखने के लिए एक
हजार बार M
लिखना
पड़ेगा।
दूसरी
ओर,
हमारी
दाशमिक प्रणाली में एक एक
मिलियन यानी दस लाख लिखने के
लिए एक के बाद छह शून्य 1000000
ळिखना
पड़ेगा। रोमन अंक प्रणाली
में शून्य नहीं है। शून्य भारत
की खोज है और इसकी खोज के बगैर
प्रगति संभव नहीं है।
हम
यहां अपने महान गणितज्ञों
जैसे आर्यभट्ट,
ब्रह्मगुप्त,
भास्कर,
बराहमिहिर
जैसे अनगिनत वैज्ञानिकों के
महान योगदानों की विस्तृत
चर्चा नहीं करने जा रहे हैं,
इनके
बारे में आप गूगल में सर्च कर
सकते हैं। हालांकि इस सिलसिले
में हम यहां सिर्फ दो उदाहरण
देंगे।


भारतीय
दाशमिक प्रणाली में संख्या
1,00,000
एक
लाख कहते हैं। 100
लाख
एक करोड़ कहता है। 100
करोड़
एक अरब,
100 अरब
एक खरब,
100 खरब
एक नील,
100 नील
एक पद्म,
100 पद्म
एक शंख और 100
शंख
एक महाशंख कहलाता है। इस प्रकार
एक महाशंख लिखने के लिए एक पर
उन्नीस शून्य लिखा जाता
है(ज्यादा
जानकारी के लिए गूगल पर मौजूद
वीएस आप्टे की संस्कृत-इंगलिश
डिक्शनरी देख सकते हैं)
दूसरी
ओर,
प्राचीन
रोम के लोग एक हजार से ज्यादा
की संख्या एम को बार-बार
और बहुत बार दुहराए बगैर नहीं
लिख सकते हैं।
एक
दूसरा
उदारहण लीजिए,
अग्नि
पुराण के मुताबिक,
कलियुग,
जिसमें
हम रहते हैं,
चार
लाख बत्तीस हजार वर्षों का
का है। इससे पहले का युग द्वापर
कलियुग से दुगुने काल का था,
द्वापर
से पहले का त्रेता युग कलियुग
से तीन गुना और इससे पहले का
सतयुग कलियुग से चार गुना काल
का था। चार युग मिलाकर कुल
तैंतालिस लाख बीस हजार वर्षों
का है। छप्पन चतुर्युग मिलकर
एक मन्वंतर कहलाता है। चौदह
मन्वंतर एक कल्प,
बारह
कल्प एक बह्म कहलाता है। इस
तरह ब्रह्म अरबों और खरबों
वर्ष का होगा।
भारत
के परंपरावादी लोग जब प्रतिदिन
संकल्प करते हैं तो उन्हें
अपने का युग,
कलियुग,
द्वापर,
त्रेता,
सतयुग
के साथ चतुर्युगी,
मन्वंतर,
कल्प,
बह्म
के ठीक वही दिन,
महीना,
और साल,
जिसमें
वो रहते हैं का जिक्र करना
होता है। ऐसा कहा जाता
है कि हम वर्तमान मन्वंतर के
28वें
चतुर्युगी में जी रहे हैं।
ये भी कहा जाता है कि कल्प का
आधा मन्वंतर समाप्त हो चुका
है, जबकि
आधा मन्वंतर बाकी है। इस समय
हम वैवश्वत मन्वंतर में जी
रहे हैं।
भले
ही कोई हमारी व्यवस्था में
विश्वास नहीं करे,
लेकिन
हमारे पूर्वजों की संकल्पना
की उड़ानों से आश्चर्यचकित
हुए बगैर नहीं रह सकता है,
जिन्होंने
इतिहास के अरबों और खरबों
वर्षों की कल्पना की।
आर्यभट्ट
ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक
आर्यभट्टियम में बीजगणित,
अंकगणित,
त्रिकोणमिति,
द्विघात
समीकरण और साइन तालिका के बारे
में लिखा। उन्होंने पाई का
मान 3.1416
ज्ञात
किया जो पाई के वास्तविक मान
के अत्यंत निकट है। आर्यभट्ट
के कार्यों को पहले ग्रीक और
बाद में अरबों ने ग्रहण किया।
हम
यहां ब्रह्मगुप्त,
भास्कराचार्य,
वराहमिहिर
के योगदानों की चर्चा नहीं
करेंगे,
क्योंकि
इसमें काफी समय लग जाएगा।
खगोलशास्त्र
प्राचीन
भारत में,
आर्यभट्ट
ने अपनी पुस्तक आर्यभट्टीय
में एक गणितीय प्रणाली को
प्रस्तुत किया,
जिसमें
संकल्पना की गई कि पृथ्वी अपने
अक्ष पर घूमती है। उन्होंने
सूर्य के परिप्रेक्ष्य में
ग्रहों की गति के बारे में भी
विचार किया (दूसरे
शब्दों में,
आर्यभट्ट
की गणितीय प्रणाली में कॉर्पर्निकस
के हेलियोसेंट्रिक सिद्धांत
के संकेत थे,
हालांकि
इस पर विवाद की गुंजाइश है)।
दूसरे प्रसिद्ध खगोलशास्त्री
थे,
ब्रह्मगुप्त,
जो
उज्जैन के खगोलीय वेधशाला के
प्रमुख थे और खगोलशास्र पर
एक प्रसिद्ध पुस्तक लिखी,
और
भास्कराचार्य भी उज्जैन के
वैधशाला के प्रमुख थे,
वराहमिहिर
ने गुरुत्वाकर्षण का सिद्धांत
प्रस्तुत किया जो बताया है
कि एक बल है जिसके कारण कोई
वस्तु पृथ्वी की ओर आकर्षित
होती है और जो आकाशीय पिंडों
को अपने निश्चित स्थान पर बना
रखता है।
मैं
यहां इन महान खगोलशास्त्रियों
के सिद्धांतों को विस्तार से
प्रस्तुत नहीं करने जा रहा
हूँ,
लेकिन
इतना निश्चयपूर्वक कहूंगा
कि हजारों साल पहले भारत के
महान खगोलशास्त्रियों द्वारा
की गई गणना के आधार पर आज भी
सूर्य और चंद्र ग्रहणों के
समय और तिथि की भविष्यवाणी
की जा सकती है। ये गणनाएं उस
समय की गई,
जब
दूरदर्शी जैसे आधुनिक यंत्र
नहीं थे और खुली आंखों से
निरीक्षण करना होता था।
चिकित्सा
प्राचीन
भारतीय चिकित्सा जगत में
सुश्रुत और चरक के नाम सबसे
प्रसिद्ध हैं। सुश्रुत शल्य
चिकित्सा के जनक माने जाते
हैं और उन्होंने मोतियाबिंद
की सर्जरी और प्लास्टिक सर्जरी
आदि की खोज की,
ये
आधुनिक सर्जरी की खोज से सदियों
पहले हुई थी। सुश्रुत की पुस्तक
सुश्रुत संहिता में चिकित्सा
और सर्जरी के बारे में विस्तार
के बताया गया है,
इनमें
सर्जरी में प्रयोग होने वाले
दर्जनों औजार शामिल है,
जिन्हें
गूगल में इंटरनेटपर आसानी से
ढूंढा जा सकता है। सुश्रुत
अच्छे सर्जन माने जाते थे,
क्योंकि
इन्हें शरीर के आंतरिकी का
बहुत अच्छा ज्ञान था। चरक ने
आंतरिक चिकित्सा पर चरक संहिता
नामक आयुर्वेदिक ग्रंथ की
रचना की,
जो
आधुनिक आयुर्वेदिक चिकित्सा
का केंद्र है। चरक संहिता और
सुश्रुत संहिता दोनों ही ग्रंथ
संस्कृत में लिखे गए,
जिन्हें
गूगल में इंटरनेट पर विस्तारपूर्वक
देखा जा सकता है। यह उल्लेखनीय
है कि लंदन साइंस म्यूजियम
के प्रथम तल पर चिकित्सा से
जुड़ी हैं,
जहां
चिकित्सा के क्षेत्र में
सुश्रुत के यंत्रों सहित
प्राचीन भारत की उपलब्धियों
का भी जिक्र है।
इससे
जाहिर है कि प्राचीन काल में
भारत चिकित्सा के क्षेत्र
में दुनिया के सभी देशों से
काफी आगे था।
अभियांत्रिकी
दक्षिण
भारत के तंजौर,
त्रिची
मंदिरों और खजुराहो और ओडीशा
के मंदिर इस बात के गवाह है कि
अभियांत्रिकी के क्षेत्र में
भी हम काफी आगे थे। कहा जाता
है कि छठी शताब्दी में कर्नाटक
के ऐहोल में एक संस्थान था
जहां संरचनागत मैकेनिक्स का
विकास हुआ था। इस संस्थान में
विकसित ढालुआं छत का उपयोग
केरल,
पूर्वी
आंध्रप्रदेश और तमिलनाडु में
संरचनाओं को बनाने में हुआ।
यहां
आगे का विषय समझने के लिए थोड़ा
और विषयांतर होना पड़ेगा।
भारतीय
संस्कृति के प्रति अंग्रेज
शासकों का रवैया
भारतीय
संस्कृति के प्रति अंग्रेजी
शासकों के व्यवहार तीन ऐतिहासिक
चरणों से होकर गुजरा। पहला
चरण 1600
ईस्वी
है,
जब
अंग्रेज भारत आए थे और व्यापारी
के रूप में बांबे,
मद्रास
और कलकत्ता में अपनी बस्तियां
बसाई थी। यह चरण 1757
तक
चला जब उन्होंने पलासी की
लड़ाई लड़ी। इस काल में भारतीय
संस्कृति के प्रति अंग्रेजों
का व्यवहार बिल्कुल अगर था
क्योंकि वो व्यापारी के रूप
में भारत पैसा कमाने के लिए
आए थे,
इसलिए
उन्हें भारतीय संस्कृति में
रूचि नहीं थी।
दूसरा
चरण 1757
से
1857
ईस्वी
यानी भारत के प्रथम स्वतंत्रता
संग्राम,
जिसे
सिपाही विद्रोह भी कहा जाता
है,
तक
चला। पलासी की लड़ाई 1757
में
लड़ी गई और इसके बाद बंगाल की
दीवानी मुगल शासकों ने अंग्रेजों
को दे दी। उस वक्त बंगाल में
बिहार और उड़ीसा भी शामिल था।
पूरा बंगाल अंग्रेजों की
हुकूमत के अंदर आ गया। 1757
से
1857
तक
अंग्रेजों ने भारतीय संस्कृति
को गंभीरता से अध्ययन किया
और कुछ अहम योगदान भी दिया,
खासकर
भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान को
पश्चिमी देशों में फैलाने
में।
तीसरा
चरण 1857
के
सिपाही विद्रोह और इसे ब्रिटिश
शासकों द्वारा क्रूरता पूर्वक
कुचलने के बाद से शुरू हुआ।
1857
के
बाद तो अंग्रजों ने निश्चिय
कर लिया कि वो शासन के प्रति
ऐसा विद्रोह दोबारा नहीं होने
देंगे। इसके लिए उन्होंने दो
काम किए-(1)
भारत
में उन्होंने भारतीय सेना
में सैनिकों,
खासकर
अंग्रेजी सैनिकों की संख्या
बढ़ाई,
शस्त्र
भंडारों को यूरोपीय सैनिकों
के हाथों में सौंप दिया। (2)
अंग्रेजों
ने जानबूझकर भारतीय लोगों को
हतोत्साहित और अपमानित करना
शुरू कर दिया। इसके लिए उन्होंने
इस तरह का दुष्प्रचार फैलाना
शुरू कर दिया कि अंग्रेजों
के आने से पहले भारतीय लोग
सिर्फ मुर्खों और गुलामों की
प्रजाति के थे। उनकी संस्कृति
मुर्खों और गुलामों की रही
है और भारतीय संस्कृति में
कुछ भी अच्छा नहीं है। ये सब
जानबूझकर किया गया ताकि भारतीय
लोगों को लगने लगे कि वो हीनतर
प्रजाति से हैं और अंग्रेज
उनके स्वामी है। अंग्रेजों
के शासन के तीसरे चरण का नतीजा
है कि हम अपने महान पूर्वजों
के योगदान,
खासकर
विज्ञान के क्षेत्र में योगदान
को भूल गए। दूसरे चरण
में तो अंग्रेजों को भारती
संस्कृति में थोड़ी रुचि थी
और उन्होंने इसका अध्ययन किया।
ऐसे
ही अंग्रेजों में सबसे पहले
नाम आता है सर विलियम जोन्स
का,
जो
1783
में
कलकत्ता सुप्रीमकोर्ट के जज
के रूप में भारत आए। वह बचपन
से ही अत्यंत विलक्षण प्रतिभा
के धनी थे,
जिन्होंने
छोटी उम्र में ही,
ग्रीक,
लैटिन,
पर्सियन,
अरबी,
हिब्रू
जैसी भाषाओं पर एकाधिकार हासिल
कर लिया। उन्होंने ऑक्सफोर्ड
विश्वविद्यालय में पढ़ाई की
और एक वकील बनने के लिहाज से
बार परीक्षा पास की। जब वो
भारत आए तो उन्होंने सुना कि
भारत में भी एक प्राचीन भाषा
संस्कृत है,
इसमें
उनकी रुचि जगी और उन्होंने
इसके अध्ययन का फैसला किया।
नतीजा हुआ कि वो एक शिक्षक की
तलाश में जुट गए। आखिरकार
कलकत्ता के भीड़भाड़ वाले
इलाके में एक धुप्प अंधेरे
कमरे में रहने वाले बंगाली
ब्राह्मण रामलोचन कवि भूषण
उन्हें शिक्षक के रूप में मिल
गए। सर विलियम जोन्स अपने
शिक्षक के पास संस्कृत सीखने
के लिए व्यक्तिगत रूप से जाने
लगे। सर जोन्स ने अपने संस्मरण
में लिखा कि जब उनकी पढ़ाई
पूरी होती तो वो देखते थे कि
उनके शिक्षक रामलोचन उस जगह
की सफाई करते,
जहां
जोन्स बैठते थे,
ऐसा
इसलिए कि रामलोचन उन्हें
मलेच्छ मानते थे। हालाकि सर
जोन्स ने इसे अपना अपमान नहीं
माना और विचार किया कि उन्हें
अपने शिक्षक के रीति-रिवाजों
को मानना चाहिए।
संस्कृत
भाषा में दक्षता हासिल करने
के बाद सर विलियम जो्स ने कलकता
में एशियाटिक सोसायटी की
स्थापना की और कालिदास के
अभिज्ञान शाकुंतलम सहित दूसरे
कई संस्कृत ग्रंथों का अंग्रेजी
में अनुवाद किया। उनका ये
अनुवाद जर्मनी के महान विद्वान
गोथे को बेहद अच्छी लगी और
उन्होंने इसकी बेहद प्रशंसा
की। सर जोन्स ने साबित किया
कि संस्कृत भाषा ग्रीक और
लैटिन के बेदह करीब है। वास्तव
में संस्कृत लैटिन से ज्यादा
ग्रीक के करीब है क्योंकि
संस्कृत में तीन वचन होते हैं,
एकवचन,
द्विवचन
और बहुवचन। ग्रीक में भी जैसा
ही होता है,
जबकि
लैटिन में दो वचन ही होते हैं
जैसा कि अंग्रेजी,
हिंदी
और दूसरी कई भाषाओं में।
इस
प्रकार सर विलियम जोन्स ने
बताया कि संस्कृत,
ग्रीक
और लैटिन समान भाषा से पैदा
हुए हैं और वो भाषा के तुलनात्मक
अध्ययन के जनक माने जाने लगे।
दूसरे
ब्रिटिश विद्वानों ने भी
भारतीय संस्कृति पर शोध किया,
यहां
सबके बारे में विस्तार से
बताने की जरूरत नहीं है,
क्योंकि
इसमें काफी समय लगेगा।
यहां
यह उल्लेखनीय है कि भारतीय
विद्वानों की महान उपलब्धियों,
जिनका
जिक्र संस्कृत भाषा में है,
से
ये पश्चिमी विद्वान हतप्रभ
थे।
आधुनिक
भारत में विज्ञान की स्थिति-
जैसा
कि ऊपर कहा गया है कि एक समय
था जब भारत विज्ञान के क्षेत्र
में विश्व में अग्रणी था। अरब
और चीन के विद्वान छात्र बनकर
नालंदा,
तक्षशिला,
विक्रमशिला,
उज्जैन
विश्वविद्यालयों में हमसे
सीखने के लिए भारत आते थे,
लेकिन
बड़ा ही दुखद है कि आज हम आधुनिक
विज्ञान में पश्चिमी दुनिया
से बहुत ही पीछे हैं। इसमें
संदेह नहीं है कि हमारी मातृभूमि
ने सीवी रमन,
चंद्रशेखर,
रामानुजन,
सतेंद्रनाथ
बोस,
जगदीशचंद्र
बोस,
मेघनाद
साहा जैसे महान वैज्ञानिकों
और गणितज्ञों को पैदा किया,
लेकिन
ये बीते जमाने की बात है।
हालांकि
ऐसा नहीं है कि हममें वंशानुगत
दोष पैदा हो गया है,
बल्कि
कुछ ऐतिहासिक कारणों के चलते
ऐसा हुआ है। वास्तव में
कैलिफोर्निया के सिलिकन वैली
में भारतीय वैज्ञानिकों का
दबदबा है। अमेरिका के ज्यादा
विश्वविद्यालयों में विज्ञान
और गणित के शिक्षक भारतीय हैं।
इसलिए आधुनिक विज्ञान और तकनीक
के क्षेत्र में भारत के पिछड़ेपन
का कारण वंशानुगत दोष नहीं
है,
बल्कि
कुछ अन्य वजह है। हमारे पास
वैज्ञानिक विरासत और ज्ञान
की बहुत बड़ी पूंजी है जो आधुनिक
युग में विज्ञान के क्षेत्र
में झंडा गाड़ने के लिए हमें
नैतिक साहस और ताकत दे सकती
है।
अब एक
सवाल उठता है कि जब हम प्राचीन
काल में विज्ञान और तकनीक के
क्षेत्र में विश्वभर में
अग्रणी थे तो आधुनिक काल में
हम इस क्षेत्र में पश्चिमी
देशों से पीछे क्यों रह गए।
यह प्रश्न नीधाम प्रश्न भी
कहलाता है। इंग्लैंड के प्रोफेसर
नीधाम मेधावी बायोकेमिस्ट
थे जिन्होंने बाद में चीनी
संस्कृति का अध्ययन किया और
चीन में विज्ञान के ऐतिहासिक
विकास पर उन्होंने कई भागों
में पुस्तकें लिखी। एक पुस्तक
में उन्होंने सवाल उठाया कि
एक समय चीन विज्ञान में पश्चिमी
देशों के काफी आगे था,
उसने
गन-पाउडर,
प्रिटिंग,
पेपर
जैसी चीजों का आविष्कार किया,
बाद
में वो पीछे क्यों रह गया और
यहां औद्योगिक क्रांति क्यों
नहीं हुए। यही सवाल भारत के
लिए भी उठाए जा रहे हैं।
मेरे
विचार में इस सवाल का जवाब है-
आवश्यकता
ही आविष्कार की जननी है। हम
वैज्ञानिक विकास के एक निश्चित
स्तर तक पहुंच गए थे,
इसके
बाद हमारे अस्तित्व के लिए
और ज्यादा शोध की आवश्यकता
नहीं थी। दूसरी ओर,
यूरोप
की भौगोलिक परिस्थियों ने
उसके अस्तित्व के लिए उसे
विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति
के लिए मजबूर किया। जो यूरोपीय
लोग एक वक्त विज्ञान के क्षेत्र
में भारत(आधारभूत
विज्ञान के क्षेत्र में भारत
आगे था)
और
चीन(अनुप्रयोग
विज्ञान में चीन आगे था)
से
काफी पीछे थे,
ने
इन विज्ञानों को सीखा और
अस्तित्व के लिए प्रगति की।
भारत
में अपेक्षाकृत समशीतोष्ण
मौसम रहता था,
यहां
न सिर्फ खरीफ बल्कि रबी फसलें
भी होंती है..
जबकि
यूरोप का मौसम ठंडा और दु्स्सह
है। वहां जीवन अत्यंत कठिन
है। चार पांच महीने धरती बर्फ
से ढकी रहती है और यहां खरीफ
फसलें नहीं हो सकती है,
इसलिए
जब यहां की जनसंख्या बढ़ी तो
अस्तित्व बनाये रखने के लिए
विज्ञान के क्षेत्र में प्रगति
करना उनके लिए आवश्यक हो गया
था। शायद यही वजह है कि वो इस
क्षेत्र में आगे बढ़े और हम
पीछे रह गए। हालांकि ये हमारा
विचाराधीन दृष्टिकोण है और
मैं दूसरे विचारों का स्वागत
करूंगा।
आज हमें
अपनी बहुत सी समस्या के हल के
लिए पश्चिम के विज्ञान का तेजी
से अनुसरण करना होगा,
इसी
विज्ञान की मदद से हम गरीबी,
बेरोजगारी
जैसी समस्या हल कर सकते हैं।
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