बाबा, भगवा और भभूत

बाबाओं में जंग छिड़ा हुआ है. बाबागण नाराज हैं. कई बाबाओं ने मिलकर बाबा रामदेव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. मुद्दा एक नहीं, अनेकों हैं. मसलन, बाबा रामदेव मुसलमानों के सम्मेलन में क्यों जाते हैं(सच्चाई यही है, बहाना ये कि जिस सम्मेलन में वंदे मातरम के खिलाफ फतवा जारी होता है बाबा रामदेव क्यों जाते हैं). बाबा राम देव योग का कैप्सूल कोर्स क्यों चलाते हैं. चलाते हैं तो कैप्सूल का पैसा क्यों लेते हैं. पैसा ही लेते हैं तो भगवा धारण करके क्यों लेते हैं. लेना ही है तो भगवा फेंकों फिर जो मन आते करते रहो. swami-ramdev  Baba-Ramdev-Yoga-1

आखिर बाबा रामदेव को क्यों नहीं मालूम है कि भभूत लगाने वाले बाबाओं ने बहुत पहले ही भगवा का पेटेंट करा रखा है. इतना नहीं इन बाबाओं ने हिंदू धर्म पर कुछ बोलने और कुछ कहने का भी पेटेंट करा रखा है. इसलिए बाबा रामदेव को बचना चाहिए, हिंदू धर्म और हिंदू दर्शन और हिंदू संस्कृति पर टिप्पणी करने से.

आखिर भभूत रमाने वाले बाबाओं ने आदिगुरू शंकराचार्य के एक सिद्धांत पर टिप्पणी कर कर दी. शंकराचार्य के मुताबिक, बह्म सत्य है और जगत मिथ्या है माने संसार झूठा है. बाबा रामदेव ने शंकराचार्य के इस सिद्धांत पर टिप्पणी कर दी. बस भभूत वाले बाबा भड़क उठे हैं. बाबा रामदेव कितने ही बड़बोले हों, विरोध के सामने तुरंत झुक जाते हैं और माफी मांग लेते हैं तो उन्होंने इन बाबाओं से क्षमा याचना कर ली.

नया मामला देवबंदियों के सम्मेलन में बाबा रामदेव के पहुंचने का है. बहाना ये कि जिस सभा में वंदे मातरम के फतवा जारी होता हो वहां बाबा रामदेव क्यों गए. बात यहीं नहीं रूकी, बाबाओं ने रामदेव के योग कैप्सूल कोर्स पर भी सवाल खड़ा किया. योग के बदले पैसा लेने पर भी सवाल खड़ा किया, भगवा वस्त्र पहनने पर भी सवाल खड़ा किया.

बाबा रामदेव के बारे में जगजाहिर है कि वे दुनियादारी वाले लोग हैं, उन्हें पैसे से परहेज नहीं है, वे बड़ेबोले हैं. स्वाभाविक है कि ऐसा व्यक्ति ब्रह्म को भले ही सत्य मान ले, लेकिन संसार को कभी मिथ्या नहीं मान सकता. रामदेव के लिए ब्रह्म की तरह संसार भी सत्य है. रामदेव जैसे आम आदमी के लिए संसार उतना ही बह्म.

हम जैसे लोगों के लिए तो संसार, कहीं ब्रह्म से भी ज्यादा सत्य है. बात जो भी हो, आखिर बाबा लोग किसी की सोच पर प्रतिबंध लगाने वाले कौन है. क्या अब हिंदू धर्म भी इन बाबाओं के फतवे पर चलेगा. मेरा मानना है कि हिंदू धर्म आज तक न किसी फतवे पर चला है और न चलेगा. लोग सोचने और दर्शन को मानने और विश्वास करने के लिए स्वतंत्र हैं और रहेंगे.

अगर ऐसा नहीं होता तो वेद के बाद पुराण, स्मृति, उपनिषद, रामायण, महाभारत क्यों लिखे जाते. भोगवादी दर्शन के जनक चार्वाक महर्षि क्यों बन जाते. क्या सोच को कुंठित बनाकर हम इतने विविधतापूर्ण समाज की रचना कर सकते हैं. नहीं, न? तो ये बाबा लोग क्यों किसी की सोच पर लगाम लगाते हैं.

कहीं ये तो नहीं कि ये लोग बाबा रामदेव की लोकप्रियता से जल रहे हैं. संस्कृति, विद्या, दर्शन, योग को तिजौरी में बंद रखने वाले लोगों को रामदेव क्यों पचे. रामदेव पैसा जो कमाता है, वो भी बिना भभूत लगाए. झाड़-फूक किए. हाथ-पैर फैलाकर, लोगों को सांस लेना सिखाकर. क्या विरोध करने वाले भभूती बाबा भी ऐसा कर सकते हैं. आखिर इन्होंने समाज को दिया क्या. मठ पर बैठकर मठाधीश बनने के सिवा. रामदेव ने हर रोज हजारों, लाखों लोगों का सानिध्य पाया. कुछ उनको सिखाया, कुछ उनसे सीखा. कुछ बांटा, कुछ जमा किया. क्या ये करना पाप है.  मैं ऐसा नहीं सोचता. मैं ऐसा नहीं मानता.

कार्यफल जानिए- रामश्लाका प्रश्नावली से

सु

प्र

बि

हो

मु

सु

नु

बि

धि

रु

सि

सि

रहिं

बस

हि

मं

अं

सुज

सो

सु

कु

धा

बे

नो

त्य

कु

जो

रि

की

हो

सं

रा

पु

सु

सी

जे

सं

रे

हो

नि

हुं

चि

हिं

तु

का

मि

मी

म्हा

जा

हू

हीं

ता

रा

रे

री

हृ

का

खा

जू

रा

पू

नि

को

जो

गो

मु

जि

यँ

ने

मनि

हि

रा

मि

री

न्मु

खि

जि

जं

सिं

नु

को

मि

निज

र्क

धु

सु

का

गु

रि

नि

ढ़

ती

ना

पु

तु

नु

वै

सि

हुं

सु

म्ह

रा

ला

धी

री

हू

हीं

खा

जू

रा



रे



श्री रामश्लाका प्रश्नावली वर्ण महिमा का अद्वितीय उदाहरण है. गोस्वामी तुलसीदास का सानिध्य पाकर इन शब्दों की गरिमा और भी बढ़ गई है. इसकी महिमा स्वयंसिद्ध है.  आप किसी कार्य के बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं उसके परिणाम को लेकर मन में उधेरबुन है तो इस रामश्लाका प्रश्नावली से इस उधेरबुन को दूर सकते हैं. इस प्रश्नावली के किसी एक बक्से के अक्षर या अक्षरों या मात्रा(बक्से में जो कुछ हो) को पुस्तिका पर लिख लें. फिर जैसे मैंने चुना, फ(दूसरी पंक्ति में रेखांकित) अब इस फ को छोड़कर, उसके नवें अक्षर या अक्षरों या मात्रा का चुनिये. जैसे मेरे चुने हुए ये अक्षर ल आया. फिर ल को छोड़कर, उसका नौवा अक्षर. इसी तरह आगे तब तक बढ़ें जब सबसे पहले चुने अक्षर पर न पहुंच जाएं.  चुने हुए अक्षरों या मात्रा को लिखते जाए. इससे एक चौपाई बनती है. बस यही चौपाई आपके प्रश्न का उत्तर है.
जैसे मेरे चुने हुए फ से जो चौपाइ बनी-
सु फ ल म नो र थ हो हुं तु म्हा रे  रा मु ल ख नु सु नि भ ए सु खा रे
इस प्रश्नश्लाका से कुल नौ चौपाइयां बनती हैं जो इस प्रकार फलाफल देती हैं-
1. सुनु सिए सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।।
फल- ये प्रसंग श्री सीताजी के गौरी पूजन के दौरान आया है और गौरी जी ने सीता माता को आशार्वाद दिया है कि तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा. यानी प्रश्नकर्ता का प्रश्न उत्तम है और अभीष्टकार्य सिद्ध होगा.
2. प्रबिसि नगर कीजे से काजा। हृदय राखि कौसलपुर राजा।।
फल- प्रसंग हनुमान जी के लंका में प्रवेश के समय आया है. प्रश्नकर्ता भगवान का नाम लेकर कार्य शुरू करे, कार्य सिद्ध होगा.
3. उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू।।
फल- प्रसंग बालकांड के सत्संग वर्णन प्रसंग में है. प्रश्नकर्ता जाने कि इस कार्य में भलाई नहीं है और कार्य की सफलता में संदेह है.
4. बिधि बस सुजन कुसंग परहीं। फनि मनि सम निज सुन अनुसरहीं.
फल- प्रसंग बालकांड में है. प्रश्नकर्ता से आग्रह है कि वे खोटे मनुष्य का साथ छोड़ दे और कार्य पूरा होने में संदेह है.
5. मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।।
फल- प्रश्न उत्तम है और कार्य सिद्ध होगा.
6. गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
फल- प्रश्न श्रेष्ठ है और कार्य सिद्ध होगा.
7. बरुन कुबेर सुरेश समीरा। रन सन्मुख धरि काहुं न धीरा।।
फल- कार्य पूर्ण होने में संदेह है
8. सुफल मनोरथ होहुं तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे।।
फल- प्रश्न उत्तम है. कार्य सिद्ध होगा.
9. होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ाबै साखा.
फल- कार्य होने में संदेह है, इसे भगवान पर छोड़ देना अच्छा है.

जय हिंदी जय भारत

जीवन विद्या का चौदहवां राष्ट्रीय सम्मेलन


जीवन विद्या का 14वां राष्ट्रीय सम्मेलन हैदराबाद में सम्पन्न
डॉ देवकुमार पुखराज
अमरकंटक से आरंभ हुआ जीवनविद्या का कारवां दक्षिण भारत तक पहुंच गया है. अक्टूबर माह के पहले सप्ताह में इसका एक विहंगम नजारा हैदराबाद में देखने को मिला. जहां जीवन विद्या से जुड़े देशभर के २३ केन्द्रों से लगभग २५० लोग एकत्र हुए. दक्षिण भारत में जीवन विद्या का ये पहला और 14 वां राष्ट्रीय अधिवेशन था. हैदराबाद से सटे तुपरान कसबे के अभ्यासा स्कूल में आयोजित यह सम्मेलन कई मामलों में दूसरे सम्मेलनों से भिन्न रहा. आजकल के सम्मेलनों के उलट न तो इसके प्रचार-प्रसार के लिए बैनर- पोस्टर लगे थे और नहीं कहीं होर्डिंग्स.यहां तक की मीडिया वालों को भी आमंत्रण नहीं था. शायद यहीं इस अभियान की खासियत भी है .इसके शिल्पी प्रचार-प्रसिद्धी से दूर रहते हुए शिक्षा के जरिये जन मानस में समझदारी विकसित करने के काम में तन्मयता से जुटे हैं. सम्मेलन में वे लोग हीं अपेक्षित थे जो जीवनविद्या के प्रबोधन, लोकव्यापीकरण और प्रचार में लगे हैं. ऐसे हीं तकरीबन ढाई सौ लोग तुपरान में जुटे जिसमें दक्षिण भारत के लगभग सभी प्रमुख शहरों के प्रतिभागी भी थे. जीवन विद्या के प्रणेता बाबा ए नागराज पूरे चार दिनों तक यहां रहे और प्रतिभागियों का मार्गदर्शन किया.
पहले दिन उदघाटन सत्र में बाबा नागराज ने अनुसन्धान की आवश्यकता पर प्रकाश डाला. उन्होंने कहा कि पृथ्वी पर मानव ज्ञानी, विज्ञानी और अज्ञानी के रूप में है. मानव ने जाने- अनजाने पृथ्वी को ना रहने लायक बना दिया है. पृथ्वी को रहने योग्य बनाना ही इस अनुसन्धान का उद्देश है. धरती पर उष्मा बढने के कारण ही धरती बीमार होती जा रही है. इस पर शोध अनुसन्धान जरुरी है. इसके लिए मानव को न्याय पूर्वक जीना होगा और स्वयं में समझ कर जीना होगा, यही समस्याओं का समाधान है. उत्पादन कार्य में संतुलन और संवेदनाओं में नियंत्रण से ही अपराध में अंकुश लग सकता है. प्रयोजन के सम्बन्ध में उन्होंने कहा कि कल्पनाशीलता और कर्म स्वतंत्रता हर मानव के पास हैं. इसके आधार पर हर मानव समझदार हो सकता है और व्यवस्था में जी सकता है. उन्होंने नर-नारी में समानता और गरीबी-अमीरी में संतुलन पर जोर दिया. इसी दिन दुसरे सत्र में मुंबई, भोपाल, इंदौर और पुणे के प्रतिनिधियो ने जीवन विद्या आधारित अभियान की समीक्षा और भावी दिशा पर विचार व्यक्त किये. मुंबई से आये डॉ. सुरेन्द्र पाठक ने मुंबई में जीवन विद्या की गतिविधियों पर विस्तार से प्रकाश डाला. उन्होंने बताया कि मुम्बई के सोमैया विद्या विहार के विभिन्न कालेजों में शिक्षको छात्रों के बीच शिविर आयोजित हो रहे हैं. ऐसे ६०० शिक्षकों के २४ छः दिवसीय शिविर विगत दो वर्षों में संपन्न हुए हैं तथा मुंबई विश्वविद्यालय के एक पाठ्यक्रम में जीवन विद्या की एक यूनिट शामिल की गई है. मुंबई के आसपास के शहरों में भी परिचय शिविर आयोजित किये जा रहे है. भोपाल से आई श्रीमती आतिषी ने मानवस्थली केंद्र की गतिविधियों से प्रतिनिधियों को अवगत कराया. इंदौर के श्री अजय दाहिमा और पुणे के श्रीराम नर्सिम्हम ने अपने इलाके में चल रही गतिविधियों की जानकारी दी. यह भी बताया गया कि उत्तरप्रदेश तकनीकी विश्वविद्यालय ने अपने सभी ५१२ कालेजो में 'वेल्यु एजूकेशन एंड प्रोफेशनल एथिक्स' जीवन विद्या आधारित फाउनडेशन कोर्से लागु किया है जिसकी टेक्स्ट बुक भी छप गई है. और विद्यार्थियों के लिए वेबसाईट बनाकर भी पाठ्य सामग्री उपलब्ध करा दी गई है. अगले सत्र में रायपुर, ग्वालियर, बस्तर, दिल्ली, बांदा, चित्रकूट आदि केंद्र ने अपनी प्रगति से अवगत कराया. रायपुर से आये श्री अंजनी भाई ने बताया की अभ्युदय संस्थान में छत्तीसगड़ राज्य के १०० शिक्षको का छः महीने का अध्ययन शिविर चल रहा है ये शिक्षक २० दिन प्रशिक्षण लेते है और १० दिन अपने-अपने क्षेत्रों में शिविर लेते हैं. राज्य में दस हजार से भी ज्यादा शिक्षको के शिविर हो चुके है. गत २९ सितम्बर को राज्य के मुख्यमंत्री श्री रमन सिंह ने अभ्भुदय संस्थान का अवलोकन किया और पूज्य बाबा नागराज जी से अभियान पर चर्चा की. वहां उन्होंने प्रशिक्षण ले रहे शिक्षको को संबोधित किया तथा प्रशिक्षण के दौरान हुए उनके अनुभवों को भी सुना. मुख्यमंत्री रमन सिंह ने घोषणा कर दी कि राज्य के आईएएस, आईपीएस और आईएफएस आधिकारियो को भी एक हफ्ते के प्रशिक्षण के लिए अभ्भुदय संस्थान भेजा जायेगा.

दूसरे दिन मानवीय शिक्षा संस्कार व्यवस्था, लोक शिक्षा योजना, शिक्षा संस्कार योजना पर बाबा नागराज जी विचार रखे .उन्होंने कहा कि हर आदमी हर आयु में समझदार होने की क्षमता रखता है. वर्त्तमान प्रणाली में पैसा बनाना ही समझदारी मान लिया गया है. मानव चेतना को सही तरीके से ना पहचाने के कारण यह गलती हुई हैं. इसके लिए उन्होंने मध्यस्थ दर्शन के आलोक में निकाले गए निष्कर्षों के बारे में बताया. इसमें मानव व्यवहार दर्शन, मानव कर्म दर्शन, अभ्यास दर्शन और अनुभव दर्शन की व्याख्या की. साथ साथ उन्होंने कहा कि चारों अवस्थाओं में संतुलन से जीने की समझ ही विचार है . यहाँ पर उन्होंने भोगोन्मादी समाजशास्त्र की जगह व्यवहारवादी समाजशात्र, लाभोंमादी अर्थशास्त्र की जगह पर आवर्तनशील अर्थशास्त्र और कमोंमादी मनोविज्ञान के स्थान पर संचेतनावादी मनोविज्ञान को, शिक्षा की वस्तु बनाये जाने की आवश्यकता को निरुपित किया. दूसरे दिन ही बिजनौर, कानपुर, जयपुर, हैदराबाद, बंगलोर, चेन्नै, कोचीन, हरिद्वार आदि केन्द्रों के प्रतिनिधियों ने अपने क्षेत्रो में चल रही गतिविधियों से वृत प्रस्तुत किया. इसी दिन एक सत्र श्री साधन भट्टाचार्य जी के संयोजकत्व में परिवार

- 2-


मूलक स्वराज व्यवस्था पर हुआ जिसमें प्रवीण सिंह, अजय दायमा, डॉ. प्रदीप रामचराल्ला ने विचार रखे . दूसरा सत्र डॉ. नव ज्योति सिंह के संयोजकत्व में शोध, अनुसन्धान, अवर्तानशील कृषि पर हुआ जिसमें बांदा के श्री प्रेम सिंह, आइआइआइटी के शोधार्थी हर्ष सत्या, मृदु आदि ने अपने विचार व्यक्त किये.

तीसरे दिन बाबा नागराज जी ने कहा कि अस्तित्व में व्यापक वस्तु ही ऊर्जा हैं. पदार्थावस्था में भौतिक-रासायनिक
क्रियायें ऊर्जा सम्पनता के कारण से हैं. ज्ञान सम्पनता होना ही सहस्तित्व में जीना है. अभी तक आहार, आवास, अलंकार, दूरगमन, दूरदर्शन, दूरश्रवण पर हीं अध्ययन हुआ है. सहस्तित्व को पकडा नहीं है, इसलिए मानव का अध्ययन नहीं हुआ. सहस्तित्व को समझने और उस में जीने से एकरूपता बनती है. बाबा कहते गये,जीवन एक गठन
पूर्ण परमाणु है, उसमे दस क्रियाएँ होती हैं. अभी तक मनुष्य साढ़े चार क्रियाओं पर हीं जीता रहा है. इसी से व्यक्तिवाद और समुदायवाद का जन्म हुआ. और इसी से संघर्ष और शोषण युद्ध होता है. उन्होंने कहा कि मानवीय समस्यओं का समाधान सहस्तित्व विधि से ही होगा. सहस्तित्व का ज्ञान होना ही लक्ष्य है. इसका ज्ञान हमें जीवन का अध्ययन , मानवीय आचरण का अध्ययन और अस्तित्व के अध्ययन से ही पूरा होगा. बाबा ने समझ के रूप में शरीर पोषण-संरक्षण के लिए आहार, आवास, अलंकार, दूरगमन, दूरदर्शन, दूरश्रवण छह आकांक्षाओं को बताया है.


जीवन के सम्बन्ध में न्याय, धर्म, सत्य को समझना जरुरी है. प्रकृति के संबंध में नियम, नियंत्रण, संतुलन के रूप में जीना समझना जरुरी है. सार रूप में सार्वाभोम व्यवस्था के लिए प्रकृति की चारों अवस्थाओं में सहस्तित्व, परस्पर पूरकता और संतुलन को समझना जरुरी है. इसी दिन के एक सत्र में श्री रणसिंह आर्य ने जन अभियान के सन्दर्भ में समाधान के लिए प्रयास पर अपने विचार व्यक्त किये. एक अन्य सत्र में आईआईआईटी ,हैदराबाद के निदेशक डॉ. राजीव सांगल, श्री सोम देव त्यागी, मृदु , सुनीता पाठक, भानुप्रताप आदि ने लोक शिक्षा और शिक्षा संस्कार व्यवस्था पर चर्चा को आगे बढाया. श्री सोम देव त्यागी ने रायपुर में हो रहे प्रयोगों पर विस्तार से प्रकाश डाला.
चौथे दिन सार्वभोम व्यवस्था पर अपने विचार व्यक्त करते बाबा नागराज ने कहा कि अध्ययन पूर्वक न्याय और व्यवस्था को समझा जा सकता है. और समझकर प्रमाणित किया जा सकता हैं. सार्वभोम व्यवस्था की समझ से ही मानव, जीव चेतना से मानव चेतना में संक्रमित होकर व्यवस्था में भागीदारी का निर्वाह जिम्मेदारी पूर्वक कर सकता है. अभी तक मानव कार्य कलाप सुविधा-संग्रह तक ही है. मानव न्याय सत्य को प्रमाणित करने में असफल रहा है. समझदारीपूर्वक जीते हु्ए मानव सुखी व भय मुक्त हो सकता है ,इसके लिए धरती पर मानव मानसिकता से संपन्न व प्रमाणित व्यतियों द्वारा शिक्षा संस्कार के द्वारा मानव मानसिता से संपन्न पीड़ी तैयार हो सकती है. जो व्यवस्था पूर्वक जीकर मानवीयता व सहस्तित्व को प्रमाणित करेगी. चौथे और अंतिम दिन आज की दशा एवं समाधान की दिशा सत्र में डॉ. प्रदीप रामचर्ल्ला, अभ्यासा स्कूल के संस्थापक विनायक कल्लेतला, राजुल अस्थाना, श्री सोमदेव, प्रोफेसर राजीव सांगल ने अपने-अपने विचार व्यक्त किये. सम्मेलन के दूसरे कई सत्रों को आई आई आई टी,हैदराबाद निदेशक डॉ राजीव सांगल, डॉ. प्रदीप रामचर्ल्ला, प्रोफेसर गणेश बागडिया, रणसिंह आर्य, श्री साधन भट्टाचार्य , श्री सोम देव, श्रीराम नरसिम्हन, सुमन, विनायक आदि ने संबोधित किया..

सम्मेलन में प्रतिनिधियो के ठहरने और खाने की व्यवस्था स्कूल प्रबंधन ने की थी. इसकी दिनचर्या भी सधी हुई थी. सुबह योग -प्राणायाम का छोटा सत्र चलता फिर नास्ते के बाद प्रतिभागी जीवनविद्या अभियान की समीक्षा और भावी योजनाओं पर चर्चा में जुट जाते. यहां तक की बाबा नागराज भी संबोधन के बाद प्रश्नोत्तरी के लिए समय देते. आपसी संवाद और समन्वय का अनोखा नजारा चार दिनों तक दिखा. अगले साल उत्तरप्रदेश के बांदा में फिर मिलने की घोषणा के साथ राष्ट्रीय सम्मेलन का समापन हो गया.
-------------------------------------






बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर सवाल

एकबार फिर देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों की बुद्धि पर सवाल उठ रहे हैं. ऐसा पहलीबार नहीं है कि देश के बुद्धिजीवियों पर सवाल खड़े किए जा रहे हों. देश के तथाकथित बुद्धिजीवियों पर सवाल पहले भी उठते रहे हैं. लेकिन पहले इन सवालों को खारिज कर दिया जाता था. लेकिन इसबार सवाल उठाने वाला मंच ही ऐसा है जिस
जय हिंदी जय भारत

कार्य से पहले कार्य का अभीष्ट फल जानिए, शंका दूर करिए- श्रीरामश्लाका प्रश्नावली से

सु

प्र

बि

हो

मु

सु

नु

बि

धि

रु

सि

सि

रहिं

बस

हि

मं

अं

सुज

सो

सु

कु

धा

बे

नो

त्य

कु

जो

रि

की

हो

सं

रा

पु

सु

सी

जे

सं

रे

हो

नि

हुं

चि

हिं

तु

का

मि

मी

म्हा

जा

हू

हीं

ता

रा

रे

री

हृ

का

खा

जू

रा

पू

नि

को

जो

गो

मु

जि

यँ

ने

मनि

हि

रा

मि

री

न्मु

खि

जि

जं

सिं

नु

को

मि

निज

र्क

धु

सु

का

गु

रि

नि

ढ़

ती

ना

पु

तु

नु

वै

सि

हुं

सु

म्ह

रा

ला

धी

री

हू

हीं

खा

जू

रा


रे



श्री रामश्लाका प्रश्नावली वर्ण महिमा का अद्वितीय उदाहरण है. गोस्वामी तुलसीदास का सानिध्य पाकर इन शब्दों की गरिमा और भी बढ़ गई है. इसकी महिमा स्वयंसिद्ध है.  आप किसी कार्य के बारे में जानने के लिए उत्सुक हैं उसके परिणाम को लेकर मन में उधेरबुन है तो इस रामश्लाका प्रश्नावली से इस उधेरबुन को दूर सकते हैं. इस प्रश्नावली के किसी एक बक्से के अक्षर या अक्षरों या मात्रा(बक्से में जो कुछ हो) को पुस्तिका पर लिख लें. फिर जैसे मैंने चुना, फ(दूसरी पंक्ति में रेखांकित) अब इस फ को छोड़कर, उसके नवें अक्षर या अक्षरों या मात्रा का चुनिये. जैसे मेरे चुने हुए ये अक्षर ल आया. फिर ल को छोड़कर, उसका नौवा अक्षर. इसी तरह आगे तब तक बढ़ें जब सबसे पहले चुने अक्षर पर न पहुंच जाएं.  चुने हुए अक्षरों या मात्रा को लिखते जाए. इससे एक चौपाई बनती है. बस यही चौपाई आपके प्रश्न का उत्तर है.
जैसे मेरे चुने हुए फ से जो चौपाइ बनी-
सु फ ल म नो र थ हो हुं तु म्हा रे  रा मु ल ख नु सु नि भ ए सु खा रे
इस प्रश्नश्लाका से कुल नौ चौपाइयां बनती हैं जो इस प्रकार फलाफल देती हैं-
1. सुनु सिए सत्य असीस हमारी। पूजिहि मन कामना तुम्हारी।।
फल- ये प्रसंग श्री सीताजी के गौरी पूजन के दौरान आया है और गौरी जी ने सीता माता को आशार्वाद दिया है कि तुम्हारा मनोरथ पूरा होगा. यानी प्रश्नकर्ता का प्रश्न उत्तम है और अभीष्टकार्य सिद्ध होगा.
2. प्रबिसि नगर कीजे से काजा। हृदय राखि कौसलपुर राजा।।
फल- प्रसंग हनुमान जी के लंका में प्रवेश के समय आया है. प्रश्नकर्ता भगवान का नाम लेकर कार्य शुरू करे, कार्य सिद्ध होगा.
3. उघरहिं अंत न होइ निबाहू। कालनेमि जिमि रावन राहू।।
फल- प्रसंग बालकांड के सत्संग वर्णन प्रसंग में है. प्रश्नकर्ता जाने कि इस कार्य में भलाई नहीं है और कार्य की सफलता में संदेह है.
4. बिधि बस सुजन कुसंग परहीं। फनि मनि सम निज सुन अनुसरहीं.
फल- प्रसंग बालकांड में है. प्रश्नकर्ता से आग्रह है कि वे खोटे मनुष्य का साथ छोड़ दे और कार्य पूरा होने में संदेह है.
5. मुद मंगलमय संत समाजू। जो जग जंगम तीरथराजू।।
फल- प्रश्न उत्तम है और कार्य सिद्ध होगा.
6. गरल सुधा रिपु करहिं मिताई। गोपद सिंधु अनल सितलाई।।
फल- प्रश्न श्रेष्ठ है और कार्य सिद्ध होगा.
7. बरुन कुबेर सुरेश समीरा। रन सन्मुख धरि काहुं न धीरा।।
फल- कार्य पूर्ण होने में संदेह है
8. सुफल मनोरथ होहुं तुम्हारे। रामु लखनु सुनि भए सुखारे।।
फल- प्रश्न उत्तम है. कार्य सिद्ध होगा.
9. होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ाबै साखा.
फल- कार्य होने में संदेह है, इसे भगवान पर छोड़ देना अच्छा है.

इंदिरा गांधी को याद करवाया जा रहा है

न्यूज चैनलों पर चल रहे है इंदिरा स्मरण एपिसोड को देखकर आसानी से समझता जा सकता है कि कुछ लोग इस देश को कैसे चला रहा है.images
प्रेमचंद ने ठीक ही कहा था कि गवर्नमेंट कुछ पढ़े लिखे लोगों(निहायत ही चालाक) द्वारा गरीबों को दबाने के लिए बनाया गया संगठन है.
टेलीविजन चैनलों पर चला रहे इंदिरा एपिसोड का अर्थ ये बिल्कुल नहीं लगाया जाना चाहिए कि अचानक टेलीविजन चैनलों को इंदिरा प्रेम उत्पन्न हो गया है या वे इंदिरा गांधी के कथित योगदान को याद कर रहे हैं.  दरअसल ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है. बल्कि टेलीविजन चैनलों को उनकी हैसियत के हिसाब से पैसे दिए गए, उसी के अनुसार उसे वीडियो फुटेज मुहैया कराए गए और कांग्रेसी भक्तों द्वारा प्रत्येक एपीसोड की पटकथा तैयार की गई-
चैनलों पर चल रहे कुछ कार्यक्रमों की बानगी-
इंदिरा बिन इंडिया-
कतरा-कतरा हिंदुस्तान.. आदि
इंदिरा स्मरण एपिसोड में जनता के टैक्स के पैसे पानी की तरह बहाए जा रहे हैं. चैनलों को लाखों-करोड़ों रुपये दिए जा रहे हैं. चुनाव प्रसार के तर्ज पर.
ये सब ऐसे समय में हो रहा है, जबकि पूरे देश के लोग उत्तरप्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती द्वारा उत्तरप्रदेश में बनाए जा रहे स्मारकों पर सवालिया निशान खड़े रहे हैं. मायावती पर जनता के पैसे के दुरुपयोग का आरोप लग रहा है. आखिर, कोई केंद्र सरकार से पूरे कि इंदिरा संस्मरण एपिसोड पर खर्च किए जा रहे ये पैसे क्या जनता के नहीं हैं और क्या इनका सदुपयोग हो रहा है. 
जनता को इमोशनली(भावनात्मक रूप से) ब्लैकमेल करने का हथकंडा अगर कांग्रेस अपना सकती है तो मायावती क्यों नहीं. आखिर इंदिरा गांधी ने सत्तर के दशक में देश के गरीबी हटा दी थी. फिर आज राहुल बाबा क्यों चिल्ला रहे हैं कि ये गरीबों का देश है. आखिर क्यों(राहुल के ही शब्दों में) सरकारी पैसा जनता तक नहीं पहुंचती है. आखिर किसने भ्रष्टाचार को बढ़ाया. आखिर किसने भ्रष्टाचारियों को संरक्षण दिया. राहुल बाबा ने आखिर क्वात्रोकी ड्रामें में वे विद्रूप क्यों बने रहे.

पीडीएफ पुस्तक प्रकाशन- तथ्य और विमर्श

पीडीएफ पुस्तक प्रकाशन पर मेरी पोस्ट पर कुछ प्रतिक्रियाएं मिली. पीएन सुब्रह्मण्यन जी ने कहा कि इस विषय पर थोड़ा और विस्तार से बताया जाए. उन्हीं को समर्पित है मेरी ये पोस्ट-
दरअसल, हमारा हिंदी ब्लॉग जगत समृद्ध होता जा रहा है. कुराफातों  हो या व्यक्तिगत टिप्पणियां. ये सब मिलकर हिंदी ब्लॉग जगत को समृद्ध कर रहा है. सैंकड़ों ऐसे ब्लॉग हैं जिनपर स्तरीय हीं नहीं, उच्चस्तरीय लेख मौजूद हैं.  शब्दावली को ही लीजिए, यहां मौजूद पोस्ट हिंदी भाषा विज्ञान की धरोहर हैं. मैंने नॉर्मन लेविस की वर्ड पावर मेड ईजी पढ़ी थी. उन्होंने अंग्रेजी भाषा के शब्दों को याद रखना और समझना आसान बना दिया था. ऐसा ही कार्य अजीत वडनेरकर जी कर रहे हैं. इससे हिंदी भाषा को बहुत फायदा मिलेगा. उनकी रचना ब्लॉग पोस्ट को रूप में है. अगर उस ब्लॉग के सभी पोस्ट को एक जगह समेट कर पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया जाता है तो उससे लाखों लोग लाभान्वित होंगे.  
इसी तरह आपके ब्लॉग का विषय जो हो, आप उसे इकट्ठा कर पीडीएफ पुस्तक के रूप में प्रकाशित कर सकते हैं.
उदाहरण के लिए मैंने विकीपीडिया पर निर्वाचित लेखों को ओपेन ऑफिस में ज्यों का त्यों चिपका दिया. फिर इसे सेव एज पीडीएफ फाइल के रूप में सेव कर लिया. और पुस्तक के रूप में प्रकाशित किया.
देखिए, विकीपीडिया के चौदह निर्वाचित लेखों की ये पुस्तक-

कई कारणों से किताब हटा दिया गया है.
अब आप भी अपने ब्लॉग पोस्ट को ओपेन ऑफिस में चिपकाइये और फिर पीडीएफ बनाकर प्रकाशित करिए.

अपना पीडीएफ पुस्तक कैसे प्रकाशित करें

1. सबसे पहले इम्बेडइट साइट पर जाकरपीडीएफ किताब अपलोड करें, लॉग इन करने की जरूरत नहीं है.
(नोट- अपनी पीडीएफ किताब बनाने के लिए, अपनी विषय-वस्तु ओपन ओफिस में चिपकाएं और एक्सपोर्ट एज पीडीएफ फाइल के रूप में सेव कर लें. इम्बेडइट में सीधे आपके कंप्यूटर से पीडीएफ फाइल अपलोड की जा सकती है.)
2. फाइड अपलोड करने के बाद पूछेगा आप गूगल, ट्विटर आदि में से कहां साइन-इन करना चाहते हैं तो आप गूगल चुन लीजिए, हां दूसरा भी चुन सकते हैं.
3. लॉग इन करते ही आपको इम्बेड कोड मिलेगा. उसे आप अपने ब्लॉग के न्यू पोस्ट में जाकर एचटीएमएल में चिपका दीजिए.
3. हां सेव करते वक्त थोड़ी आपत्ति दिखाएगा, उसे स्टॉप शोइंग इरर बॉक्स में क्लिक करे समस्या को दूर सकते हैं. बस चंद सैकेंडों में आपकी किताब प्रकाशित हो गई.
यहां प्रस्तुत है शेखर एक जीवनी का पहला भाग

कई कारणों से किताब हटा दिया गया है.

ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है

हर इक जिस्म घायल
हर इक रूह प्यासी
निगाहों में उलझन
दिलों में उदासी
ये दुनिया है या
आलमे बद-हवासी
ये दुनिया अगर मिल भी जाए तो क्या है..
फिल्म- प्यारा का ये गाना प्रस्तुत है आपकी सेवा में-



जय हिंदी जय भारत

बीते हुए लम्हों की कसक

बीआर चोपड़ा की सामाजिक उद्देश्यपरक फिल्म निकाह का गीत बीते हुए लम्हों की कसक साथ तो होगी सुनिए-




जय हिंदी जय भारत